20 प्रकार की फ़सल पैदा करने वाले आदिवासी की भूख मिटाने का इंतज़ाम नहीं है

एक सर्वे में दवा किया गया है कि झारखंड और ओडिशा में सभी आदिवासी परिवारों को अभी तक दो वक्त के पेट भर खाने की सुरक्षा तक हासिल नहीं है. इस सर्वे की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि झारखंड में तो हालात बेहद ख़राब है. रिपोर्ट दावा करती है कि झारखंड के एक चौथाई आदिवासी को दो वक्त का भरपेट खाना मिल जाएगा, इस बात की गारंटी नहीं है.

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ओडिशा और झारखंड में किए गए एक सर्वे में दावा किया गया है कि झारखंड में आदिवासी की कुल आबादी का एक चौथाई यानि 25 प्रतिशत को खाद्य सुरक्षा हासिल नहीं है. यानि क़रीब 25 प्रतिशत आबादी ऐसी है जिसे दो वक्त का खाना मिलने की गारंटी भी नहीं होती है.

ओडिशा के बारे में यह सर्वे दावा करता है कि कम से कम 12 प्रतिशत आदिवासी परिवार ऐसे हैं जिन्हें दो वक्त का खाना नसीब हो जाए, यह ज़रूरी नहीं है. 

इस सर्वे में यह दावा भी किया गया ह२ कि ओडिशा में आदिवासी परिवार की सालना औसत आमदनी 75378 रूपये है जबकि झारखंड में एक आदिवासी परिवार की सालना औसत आय मात्र 61263 रुपये है. 

यह सर्वे ‘प्रधान’ नाम के एक संगठन ने किया है. इस सर्वे में जमा किये गए आंकडों के विश्लेषण के आधार पर तैयार रिपोर्ट को आदिवासी मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा की उपस्थिति में जारी किया गया.

इस सर्वे की विधि और दायरे के बारे में संगठन ने बताया है कि 254 गांवों को इस सर्वे में शामिल किया गया था. इसके अलावा यह भी बताया गया है कि कम से कम 28 गांवों में आदिवासियों के साथ विशेष चर्चा आयोजित की गई थीं. 

इस सर्वे को करने वाले संगठन ने बताया है कि इसमें कुल 4994 परिवारों को शामिल किया गया था. इसके लिए कम से कम 40 आदिवासी स्कॉलर और सामाजिक कार्यकर्ताओं का इंटरव्यू भी किया गया. 

इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि आदिवासी इलाकों में फ़सलों के बारे में देश के किसी भी इलाके या समुदाय की तुलना में विविधता ज़्यादा मिलती है.

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि आदिवासी इलाकों में कम से कम 20 तरह की फसलें उगाने का विकल्प रहता है. रिपोर्ट दावा करती है कि बारिश के भरोसे होने वाली खेती में भी विविधता मिलता है. 

इस रिपोर्ट के तथ्यों और आंकड़ों के विश्लेषण के बारे में आदिवासी मामलों के मंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा कि यह जानकारी नीति बनाने में मददगार होगी.

अर्जुन मुंडा ने कहा कि आदिवासी समुदाय जंगल में प्रकृति के करीब रहता है. आदिवासी समुदायों में काफीड संभावनाएं हैं बश्रते उनके ज्ञान पर भरोसा किया जाए. इसके साथ ही उन्हें अवसर दिए जाने की ज़रूत है और फिर उन्हें उचित बाजार उपलबध करवाना भी ज़रूरी है. 

इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पक्की सड़कों, स्कूल-कॉलेज, स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में आदिवासी इलाके बेहद पिछड़े हुए हैं. एक उदाहरण देते हुए इस रिपोर्ट में यह कहा गया है कि भारत के ग्रामीण इलाकों में 90 प्रतिशत में मोबाइल कनेक्टिविटी है, लेकिन आदिवासी गांवों में अभी मोबाइल कनेक्टिविटी 70 प्रतिशत है. 

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