मालदा का यह अराजनैतिक मंच, क्षेत्र की राजनीति तय कर सकता है

आदिवासियों के बारे में यह एक बड़ी चुनौती है कि एक वर्ग या समुदाय के तौर पर राजनीति में वो एक दबाव समूह नहीं बन पाये हैं. इसलिए राष्ट्रीय राजनीति में उन्हें वह हिस्सेदारी नहीं मिलती है जिसके वे हकदार हैं. देश के राजनीतिक विमर्श में आदिवासियों की चर्चा आमतौर पर माओवादी हिंसा के संदर्भ में ही होती रही है.

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पश्चिम बगाल के मालदा ज़िले में आदिवासियों के कुछ संगठनों ने मिल कर विश्व आदिवासी दिवस पर एक कार्यक्रम किया. विश्व आदिवासी दिवस पर देश के लगभग सभी आदिवासी इलाकों में कुछ ना कुछ कार्यक्रम ज़रूर होते हैं. लेकिन मालदा में हुए इस कार्यक्रम के बड़े सियासी मायने निकाले जा रहे हैं. 

इस कार्यक्रम में शामिल संगठनों को एक नए राजनीतिक ताकत के तौर पर देखा जा रहा है. मज़े की बात यह आदिवासी संगठनों का यह मंच खुद को एक ग़ैर राजनीतिक मंच बता रहा है. लेकिन राजनीति के जानकार और राजनीतिक दलों से जुड़े लोग भी यह मानते हैं कि फिलहाल बेशक आदिवासी संगठनों का यह फ्रंट ग़ैर राजनीतिक होने का दावा कर रहा है, लेकिन इसकी बनावट और लक्ष्य दोनों ही राजनीतिक है. 

आदिवासी एकता हुलसाय नाम के इस संगठन का गठन जून के महीने में किया गया था. इस मंच में राष्ट्रीय आदिवासी एकता परिषद, आदिवासी सेंगेल अभियान, भारतीय जकात माझी परगना महल, मालदा ज़िला समाज कमेटी और आदिवासी जमी रक्षा कमेटी शामिल हैं. 

आदिवासियों की कई कर्मचारी, अध्यापक और प्रोफेसर यूनियन भी इस संगठन का समर्थन कर रहे हैं. इस संगठन के एक नेता निर्मल सोरेन के अनुसार इस मंच का गठन बहुत सोच-विचार के बाद किया गया है. निर्मल सोरेन कहते हैं कि अगर समुदाय ग़ैर राजनीतिक मसलों पर एक साथ आते हैं तो फिर उस इलाके में राजनीति के मायने भी बदल सकते हैं. 

फिलहाल यह मंच जिन मुद्दों को उठा रहा है उन्हें सामाजिक मुद्दे ही बताया जा रहा है. मसलन संताली भाषा में पढ़ाई लिखाई और इस भाषा की स्क्रिप्ट इस मंच के बड़े मुद्दों में से एक है. इसके अलावा ग़ैर कानूनी तरीके से आदिवासियों की ज़मीन की बिक्री भी इस संगठन के चुने हुए मुद्दों में शामिल है. 

बेशक आदिवासी संगठनों का यह गठबंधन इन मुद्दों को ग़ैर राजनीतिक कह रहा है. लेकिन अंतत ये मुद्दे भी आदिवासी आबादी के लिए राजनीतिक मुद्दे ही हैं. ख़ासतौर से संताली भाषा में पढ़ाई का मामला एक प्रभावी मुद्दा माना जाता है. 

इस मंच के कॉर्डिनेटर सोरेन कहते हैं कि बेशक यह मंच ग़ैर राजनीतिक है. लेकिन यह मंच राजनीतिक मसलों और फ़ैसलों को भी प्रभावित करेगा. 

आदिवासी सुशील शिक्षा समाज से जुड़ी सुप्रिया हेम्ब्रम का कहना था, “अभी भी कई संताल इलाकों के कई कॉलेजों में संताली भाषा में पढ़ाई नहीं होती है.” 

वो कहती हैं कि इस मंच के नेता और कार्यकर्ता आदिवासी बहुल ब्लॉक और जिलों में अधिकारियों से मिल रहे हैं. इन मुलाकातों में ग़ैर कानूनी तरीके से आदिवासी ज़मीन हड़पने के मामले उठाये जा रहे हैं. 

मंच से जुड़े बाबूराम किस्कू का कहना था, “आदिवासी की ज़मीन क़ानून किसी ग़ैर आदिवासी को बेची नहीं जा सकती है. लेकन ज़मीनों पर घात लगाए ठेकेदार जोड़ तोड़ से आदिवासी ज़मीन हड़प रहे हैं. भोले और अनपढ़ आदिवासियों को धोखा दे कर उनकी ज़मीन हड़प ली जाती है.”

इस इलाके की राजनीति को समझने वाले लोग कहते हैं कि बेशक यह मंच ग़ैर राजनीतिक है और फिलहाल यह संगठन चुनाव में उतरने की योजना नहीं बना रहा है. लेकिन इसके बावजूद इस इलाके में चुनवा में उसकी अहम भूमिका होगी. जो भी राजनीतिक दल यहां पर उम्मीदवार उतारेगा, इस संगठन से आशिर्ववाद लेना चाहेगा. 

जिला प्रशासन भी इस मंच को गंभीरता से ले रहा है. जब से इस मंच के गठन के बाद अधिकारियों से कई दौर की बैठक मंच के नेताओं की हुई हैं.

इन बैठकों के बाद प्रशासन ने अपने सभी अधिकारियों और कार्यालयों को सख़्त निर्देश दिए हैं कि आदिवासियों की ज़मीन के लेन-देन में सभी कानूनी प्रावधानों का पालन किया जाए.

इसके साथ ही गैर कानूनी तरीके से आदिवासियों की ज़मीन को कब्जा करने की कोशिशों पर भी लगाम लगाने के आदेश जारी हुए हैं.

आदिवासियों के बारे में यह एक बड़ी चुनौती है कि एक वर्ग या समुदाय के तौर पर राजनीति में वो एक दबाव समूह नहीं बन पाये हैं. इसलिए राष्ट्रीय राजनीति में उन्हें वह हिस्सेदारी नहीं मिलती है जिसके वे हकदार हैं. देश के राजनीतिक विमर्श में आदिवासियों की चर्चा आमतौर पर माओवादी हिंसा के संदर्भ में ही होती रही है.

लेकिन इस तरह के संगठन बनने निश्चित ही आदिवासी समाज के लिए एक बेहतर पहल है. 

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