हाटी समुदाय के विरोध में दलित संगठन क्यों आंदोलन कर रहे हैं

साल 1995 और 2006 में रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया ने हाटी समुदाय से जुड़े प्रस्ताव पर कई सवाल उठाए थे. 

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हिमाचल प्रदेश (Himachal News)के सिरमौर ज़िले के गिरि पार इलाक़े में हाटी समुदाय (Hatee Community) के नेताओं की धड़कने  बढ़ी हुई हैं. इस समुदाय के लोग लंबे समय से अनुसूचित जनजाति का दर्जा (Status of Scheduled Tribe) माँग रहे हैं. राज्य सरकार और केन्द्र दोनों ने ही इस तरह के संकेत दिए हैं कि जल्दी ही उनकी यह माँग अब पूरी हो जाएगी.

लेकिन हाटी समुदाय को एसटी का दर्जा दिए जाने के विरोध में दलित समुदाय के लोग सड़कों पर उतर आए हैं. दलित समुदाय के नेताओं का कहना है कि अगर हाटी समुदाय को एसटी का दर्जा मिल जाएगा तो ना सिर्फ़ उन्हें आरक्षण मिलेगा, बल्कि दलितों पर हाटी समुदाय का अत्याचार बढ़ जाएगा.

उनका कहना है कि अगर हाटी समुदाय को अनुसूचित जनजाति मान लिया जाएगा तो फिर उनके ख़िलाफ़ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक क़ानून) क़ानून 1989 लागू नहीं होगा. 

भारत के महा रजिस्ट्रार कार्यालय (Office of Registrar General of India) ने गिरि पार इलाके की 154 पंचायतों के लोगों को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. यह मंजूरी अप्रैल महीने में ही दे दी गई थी.

शिमला ट्राइबल रिसर्च इंस्टिट्यूट के अध्ययन के आधार पर यह मंज़ूरी दी गई है. अब केन्द्रीय मंत्रिमंडल को इस प्रस्ताव को पास करना है. साल 1995 और 2006 में रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया ने हाटी समुदाय से जुड़े प्रस्ताव पर कई सवाल उठाए थे. 

उस समय रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय की तरफ़ से कहा गया था कि हाटी समुदाय अपने आप में किसी ख़ास समुदाय या समूह की पहचान नहीं है. इस पहचान के साथ कई जातियों के लोग पाए जाते हैं. 

यह भी कहा गया था कि हाटी समुदाय किसी आदिवासी समुदाय या समूह का नाम नहीं है. हाटी समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की माँग के प्रस्ताव पर विचार करते हुए तब रजिस्ट्रार जनरल ने कहा था कि हाटी समुदाय कोई जातीय पहचान से जुड़ा नाम नहीं है. 

तब यह भी बताया गया था कि जब तक कोई पहचान किसी ख़ास जातीय समूह से जुड़ी नहीं होती है उसे अनुसूचित जनजाति की सूचि में शामिल नहीं किया जा सकता है. 

हाटी समुदाय और उतराखंड के जौनसारी या जौनसार बावर में कुछ समानताएँ मिलती हैं. लेकिन उसके बावजूद यह माना गया था कि हाटी समुदाय अनुसूचित जनजाति में शामिल करने कि शर्तों को पूरा नहीं करता है. 

रजिस्ट्रार जनरल ने यह भी नोट किया था कि हाटी पहचान के साथ रह रही कोली, ढाकी, डोम, चानल और लोहार जातियां पहले से ही अनुसूचित जाति में शामिल हैं. इसलिए हाटी समुदाय को आदिवासी मान कर अनुसूचित जनजाति में शामिल करना संभव नहीं होगा. 

दलित शोषण मुक्ति मंच से जुड़े एक कार्यकर्ता आशीष कुमार ने इस आधार पर हाटी समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने का विरोध किया है. वे पूछते हैं कि जब रजिस्ट्रार जनरल पहले दो बार कुछ सवालों पर इस तरह का प्रस्ताव ख़ारिज कर चुका है तो अब यह प्रस्ताव स्वीकार कैसे कर लिया गया है.

राज्य में बीजेपी की सरकार हाटी समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने को तैयार है. सरकार का कहना है कि शिमला के ट्राइबल रिसर्च इंस्टिट्यूट की रिपोर्ट यह स्पष्ट कहती है कि इस समुदाय को आदिवासी ही माना जाना चाहिए.

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हाटी समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिया जाना एक राजनीतिक मसला है. यह मसला चुनाव से भी जुड़ा है. बीजेपी ने हाटी समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने का वादा अपने चुनाव घोषणा पत्र में भी शामिल किया था.

गिरि पार के हाटी समुदाय ने यह घोषणा की थी कि अगर उसे अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं दिया जाता है तो उसके लोग चुनावों का बहिष्कार करेंगे. बीजेपी के लिए यह घाटे का सौदा रहेगा. 

लेकिन सिरमौर में दलित आबादी भी क़रीब 40 प्रतिशत बताई जाती है. अगर दलित हाटी समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने के विरोध को तेज़ करते हैं तो बीजेपी के लिए बड़ी दुविधा पैदा हो जाएगी. 

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