धरियावाद को दशकों से विकास का इंतजार, युवाओं ने मांगा आदिवासी आरक्षण

पहाड़ी इलाकों और जंगलों से घिरे इस निर्वाचन क्षेत्र में 80 से 82 फीसदी आदिवासी आबादी है. फिर भी गैर-आदिवासी, जो बमुश्किल 20 फीसदी हैं, वो सरकारी नौकरियों में 50 फीसदी कोटा का आनंद लेते हैं.

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एक बाहरी व्यक्ति भी बता सकता है कि राजस्थान के धरियावाद जिला पिछले एक दशक से अधिक समय में थोड़ा नहीं बदला है. इसकी सड़कें अभी भी टूटी हुई हैं, यहां के घरों और बाजारों में आधुनिकीकरण का कोई निशान नहीं है और ग्रामीण परिधानों में लोग इत्मीनान से घूमते हैं, वो कोई रोमांचक भविष्य देखने में विफल रहते हैं.

धारियावाद पुराने बस स्टैंड पर एक हाथ से खींची जाने वाली गाड़ी के पास चाय की चुस्की लेते हुए गुजरात के एक व्यापारी राजेश कुमार कहते हैं, “मैं करीब 12 साल बाद यहां आया हूं लेकिन इस शहर में कोई बदलाव नहीं आया है.”

थावरचंद डामोर, जो पास के एक प्याज की दुकान पर काम करते है वो भी इस बात से सहमत है. राजनेताओं द्वारा किए गए वादों पर हंसते हुए उन्होंने कहा, “अलग-अलग पार्टी की सरकारें बनी और गिरीं लेकिन धारियावाद ने कोई विकास नहीं देखा. हमारे पास अभी भी कॉलेज में टीचिंग स्टाफ, स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टरों और शहर की स्वच्छता की देखभाल के लिए एक नगर पालिका की भी कमी है.”

समस्या का एक हिस्सा नौकरशाही की उदासीनता के कारण हो सकता है. 2008 में बनाया गया धारियावाद शायद राजस्थान का एकमात्र विधानसभा क्षेत्र है जो दो जिलों प्रतापगढ़ और उदयपुर में फैला हुआ है. इसलिए ये जिला दो कलेक्टरों और दो पुलिस अधीक्षकों द्वारा शासित है. स्थानीय लोग लापता प्रशासनिक समन्वय की ओर इशारा करते हैं.

अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र में एक बार फिर चुनाव हो रहे हैं क्योंकि पिछले साल कोविड-19 के कारण मौजूदा विधायक गौतम लाल मीणा के निधन के कारण उपचुनाव की आवश्यकता थी जो 30 अक्टूबर को निर्धारित है.

इसके लिए सात उम्मीदवार मैदान में हैं. लेकिन लड़ाई मुख्य रूप से कांग्रेस के पूर्व विधायक नागराज मीणा, बीजेपी के खेत सिंह मीणा, भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) के गणेश लाल मीणा और बीटीपी के बागी थावरचंद डामोर के बीच है.

प्रासंगिक रूप से नई पार्टी बीटीपी ने आदिवासी आरक्षण के मामले में ग्रामीण युवाओं को आकर्षित करके कांग्रेस और बीजेपी के लिए कठिन बना दिया है क्योंकि बेरोजगारी यहां मुख्य चुनावी मुद्दा बनी हुई है.

पहाड़ी इलाकों और जंगलों से घिरे इस निर्वाचन क्षेत्र में 80 से 82 फीसदी आदिवासी आबादी है. फिर भी गैर-आदिवासी, जो बमुश्किल 20 फीसदी हैं, वो सरकारी नौकरियों में 50 फीसदी कोटा का आनंद लेते हैं.

बीटीपी विधायक राजकुमार रोत कहते हैं, “2013 से हम आदिवासी उप-योजना क्षेत्रों में 100 फीसदी आदिवासी कोटा के लिए लड़ रहे हैं जैसा कि संविधान की अनुसूची V में परिकल्पित है लेकिन लगातार कांग्रेस-बीजेपी सरकारों ने हमारी उपेक्षा की है.”

व्यवसाय निर्वाचन क्षेत्र में गैर-आदिवासी निवासियों द्वारा नियंत्रित किया जाता है. सैकड़ों आदिवासी पुरुष और महिलाएं नियमित रूप से धारियावाद सहकारी समिति भवन के बाहर खेतों में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम पर रखने के लिए इकट्ठा होते हैं.

गैर-कृषि मौसमों के दौरान वे या तो निर्माण मजदूर के रूप में काम करते हैं या आजीविका की तलाश में पास के गुजरात चले जाते हैं. शायद इसलिए सुदूर इलाके में बढ़ती महंगाई के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चहेते हैं.

भले ही बीटीपी ग्रामीण युवाओं को प्रभावित कर सकता है लेकिन कांग्रेस और बीजेपी की जड़ें धारियावाद में गहरी हैं. जिसमें तीन पंचायत समिति क्षेत्र शामिल हैं- धारियावाद, लसड़िया और झालारा. लसड़िया में बीजेपी की मजबूत पकड़ है जो दिवंगत विधायक गौतम लाल मीणा का घर था. जबकि लसड़िया में कांग्रेस की भी पकड़ है. धारियावाद जिसमें इस निर्वाचन क्षेत्र के सबसे अधिक मतदाता हैं, अप्रत्याशित हो गया है क्योंकि यह कांग्रेस, बीजेपी और बीटीपी उम्मीदवारों का घर है.

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