आंध्र प्रदेश: पहले आदिवासियों की ज़मीन छीनी, फिर फ़सल, कोई सुनवाई नहीं

कोंडारेड्डी आदिवासी 2001 में कोव्वड़ा जलाशय की वजह से विस्थापित हुए थे, और फिर उनका रेड्डीगुडम में पुनर्वास किया गया था.

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आंध्र प्रदेश के पश्चिम गोदावरी ज़िले के रेड्डीगुडम गांव में रहने वाले आदिवासिंयों का आरोप है कि ग़ैर-आदिवासी समुदाय के लोग उन्हें उनकी ज़मीन से बेदख़ल करने की कोशिश कर रहे हैं. रेड्डीगुडम में रहने वाले कोंडारेड्डी आदिवासी पीवीटीजी यानि आदिम जनजाति की श्रेणी में आते हैं. कोंडारेड्डी आदिवासी 2001 में कोव्वड़ा जलाशय की वजह से विस्थापित हुए थे, और फिर उनका रेड्डीगुडम में पुनर्वास किया गया था.

कोंडारेड्डी आदिवासियों का कहना है कि सरकारी अधिकारियों की उदासीनता की वजह से वह फ़ॉरेस्ट राइट्स एक्ट के तहत सुनिश्चित किए गए वन भूमि अधिकारों से वंचित हैं. इनका कहना है कि पिछले एक दशक से इनके अधिकारों को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है. दरअसल, मुद्दा 2011 का है, जब 83 आदिवासी परिवारों ने कोव्वड़ा जंगल में स्थित 156.83 एकड़ वन भूमि पर एफ़एआरए के तहत टाइटल डीड के लिए व्यक्तिगत दावे दायर किए थे. ग्राम सभा ने दावों को मंजूरी भी दे दी थी, और सब-डिविजनल लेवल कमेटी (एसडीएलसी) के पास भेज दिया था.

लेकिन 2012 में एसडीएलसी ने उनके दावों को यह कहकर खारिज कर दिया कि ज़मीन राजनगरम में वन समृद्धि समिति (वीएसएस) के पास है. वीएसएस पर वनों के संरक्षण और विकास का ज़िम्मा है, और यह सुनिश्चित करती है कि वनों से कोई तस्करी न हो.

2013 में सरकार के विशेष मुख्य सचिव ने आदेश दिया कि राज्य में वीएसएस को दिए गए टाइटल को जनजातीय मामलों के मंत्रालय के निर्देशों के अनुसार वापस ले लिया जाए. इसके पीछे की वजह थी कि सामुदायिक अधिकारों के लिए टाइटल केवल ग्राम सभाओं को जारी किए जा सकते हैं, इसलिए वीएसएस को टाइटल जारी करना ग़ैरकानूनी था. इस आदेश में यह भी साफ़ कहा गया था कि रेड्डीगुडम के आदिवासियों को ज़मीन का टाइटल दे दिया जाए.

आदिवासी दावेदारों ने 2013 में ज़िला कलेक्टर की अध्यक्षता वाली ज़िला स्तरीय समिति में अपील दायर की थी, लेकिन उनकी अपील पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है. आदिवासी यह भी कहते हैं कि ग़ैर-आदिवासियों ने मई 2020 में उच्च न्यायालय से एक अंतरिम आदेश प्राप्त किया, जिससे उनके वन भूमि में प्रवेश करने पर रोक लग गई, और उनकी काजू की फ़सल छिन गई. उच्च न्यायालय ने इस साल जुलाई में एफ़आरए के तहत वन भूमि पर गैर-आदिवासियों के दावे के निर्धारण के लिए केस का निपटारा कर दिया.

आदिवासी 2008 के एक सरकारी आदेश का भी हवाला देते हैं, जो ग़ैर-आदिवासियों का वन भूमि पर अधिकार पूरी तरह से ख़त्म कर देता है. अब आदिवासियों की मांग है कि एफ़आरए के तहत उनकी ज़मीनों के टाइटल उन्हें जल्द दिए जाएं.

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