#SaveBuxwahaForest: एनजीटी ने हीरों के खनन के लिए पेड़ों की कटाई पर लगाई रोक

एक अनुमान के अनुसार इस हीरा खनन परियोजना के लिए 382 ​​हेक्टेयर इलाक़े में जड़ी-बूटियों के पौधों सहित पेड़ों की कई किस्मों को काटा जाएगा. साथ ही जंगल में और आसपास रहने वाले 20 गावों के 8,000 आदिवासी भी प्रभावित होंगे.

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नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की सेंट्रल ज़ोन बेंच ने बक्सवाहा प्रोजेक्ट के लिए पेड़ों की कटाई पर अगले आदेश तक रोक लगा दी है.

इस प्रोजेक्ट के तहत हरे-भरे बक्सवाहा जंगल में हीरों के खनन के लिए एक निजी कंपनी को अनुमति मिली है. सरकारी अनुमानों के अनुसार हीरों की माइनिंग के लिए जंगल में करीब 2.15 लाख पेड़ काटे जाने हैं. हालांकि पर्यावरण विशेषज्ञ और कार्यकर्ताओं का दावा है कि यह संख्या इससे बहुत बड़ी है.

एक अनुमान के अनुसार इस हीरा खनन परियोजना के लिए 382 ​​हेक्टेयर इलाक़े में जड़ी-बूटियों के पौधों सहित पेड़ों की कई किस्मों को काटा जाएगा. साथ ही जंगल में और आसपास रहने वाले 20 गावों के 8,000 आदिवासी भी प्रभावित होंगे.

एनजीटी ने अपने आदेश में प्रधान मुख्य वन संरक्षक (Principal Chief Conservator of Forest (PCCF) को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि कोई पेड़ न काटा जाए. साथ ही वन संरक्षण अधिनियम के प्रावधानों के तहत विशेषज्ञ पैनल के गठन का भी निर्देश दिया गया है.

ट्रिब्यूनल ने केंद्र, राज्य सरकार, वन विभाग और निजी खनन कंपनी को चार हफ़्तों के अंदर जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया है. इसके अलावा याचिकाकर्ताओं को सभी दस्तावेज़ और याचिका की प्रतियां प्रतिवादियों को सौंपने का भी आदेश दिया. मामले की अगली सुनवाई 27 अगस्त को होगी.

जबलपुर के एक स्वयंसेवी संगठन नागरिक उपभोक्ता मंच, और गुना के निवासी डॉ पुष्पप्राग और उज्जवल शर्मा ने बक्सवाहा जंगल में पेड़ों की कटाई को लेकर एनजीटी के सामने याचिकाएं दायर की थीं. याचिकाकर्ताओं ने जंगल में हीरा परियोजना के लिए दी गई मंजूरी को भी चुनौती दी थी.

जंगल के अंदर प्राचीनकाल की रॉक पेंटिंग के पाए जाने का दावा करते हुए याचिकाकर्ताओं ने 21 जून को ट्रिब्यूनल से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India) को मामले में एक रिपोर्ट देने के निर्देश देने की भी अपील की थी.

खनन का कॉन्ट्रैक्ट पाने वाली निजी कंपनी ने दावा किया कि मामला पहले से ही हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. उनका यह भी आरोप है कि कंपनी को बेवजह परेशान किया जा रहा है.

कंपनी ने एनजीटी को बताया गया कि जंगल के दस किलोमीटर की परिधि में कोई वन्यजीव अभयारण्य या आरक्षित वन क्षेत्र नहीं है, और ना ही इस क्षेत्र में कोई संरक्षित जंगली जानवर है.

इसके अलावा उनका दावा है कि काटे जाने वाले 2.15 लाख पेड़ों के मुकाबले इलाक़े में 3.80 लाख पेड़ लगाए जाएंगे.

पर्यावरणविद् मानते हैं कि पेड़ों के कटने से बुंदेलखंड इलाक़े में पानी की उपलब्धता पर भी बुरा असर पड़ेगा. छतरपुर के अलावा सागर, दामोह और पन्ना के निवासियों ने भी इस प्रोजेक्ट के खिलाफ़ आवाज़ उठाई है.

छतरपुर में 24 से 26 जुलाई तक इस मामले पर जनजागरुकता अभियान चलाने का प्रस्ताव है. इसमें जंगल का निरीक्षण, ग्रामीणों के साथ बैठक, ज़िला प्रशासन व जनप्रतिनिधियों को ज्ञापन सौंपना शामिल है.

इसके अलावा सोशल मीडिया पर #SaveBuxwahaForest का हैशटैग भी चर्चा में है.

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