भगत सिंह पर किताब और लेख की वजह से आदिवासी युवक पर चला ‘नक्सल केस’, अब कोर्ट ने किया बरी

दरअसल 3 मार्च 2012 को पिता-पुत्र को इस आरोप में गिरफ्तार किया गया था कि वे जंगलों में छिपे 5 नक्सलियों की मदद कर रहे हैं. पिता और पुत्र पर आईपीसी के तहत आपराधिक साजिश और देशद्रोह और गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत आतंकवाद का आरोप लगाया गया था.

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दक्षिण कन्नड़ जिले के कुद्रेमुख राष्ट्रीय उद्यान की सीमा से लगे एक दूरदराज के गांव के एक आदिवासी युवक को साल 2012 में नक्सली लिंक के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. उस वक्त वह पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहा था. 23 साल की उम्र में गिरफ्तार हुए शख्स को अब जिला अदालत ने बरी कर दिया है. पुलिस उस आदिवासी युवक का कोई भी नक्सल लिंक प्रमाणित करने में सफल नहीं हुई.

युवक के साथ उसके पिता को भी गिरफ्तार किया गया था. कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के 32 वर्षीय वित्ताला मालेकुडिया और उनके पिता लिंगप्पा मालेकुडिया (60 साल) को नक्सली लिंक के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. लेकिन कोर्ट ने देखा कि उनके खिलाफ जो सबूत दिए जा रहे हैं वे सिर्फ एक लेख से संबंधित हैं.

वित्ताला के हॉस्टल से भगत सिंह के ऊपर लिखी गई एक किताब भी बरामद की गई थी जिसे पुलिस सबूत बनाने की कोशिश कर रही थी. इस किताब में कहा गया था कि जब तक गांव में सभी सुविधाएं नहीं उपलब्ध होतीं संसदीय चुनाव का बहिष्कार कर देना चाहिए. इसके अलावा कई अखबारों के टुकड़े और लेख भी वित्ताला के हॉस्टल रूम से मिले थे.

इस मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि न तो इस तरह की पुस्तकें पढ़ने पर कोई कानूनी रोक है और न ही अखबार पढ़ना प्रतिबंधित है. ऐसे में इन पर आरोप साबित नहीं होते हैं.

दरअसल 3 मार्च 2012 को पिता-पुत्र को इस आरोप में गिरफ्तार किया गया था कि वे जंगलों में छिपे 5 नक्सलियों की मदद कर रहे हैं. पिता और पुत्र पर आईपीसी के तहत आपराधिक साजिश और देशद्रोह और गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत आतंकवाद का आरोप लगाया गया था.

जिन पांच नक्सलियों पर केस दर्ज किया गया था उनमें विक्रम गौड़ा, प्रदीपा, जॉन, प्रभा और सुंदरी शामिल थे. हालांकि इन्हें कभी गिरफ्तार नहीं किया जा सका. कोर्ट में सुनवाई की शुरुआत में ही इन पांचों के केस को मालकुडिया से अलग कर दिया गया था.

बरी होने के बाद वित्ताला ने कहा, “मैं इस मामले में बरी होने से बहुत खुश हूं. हमने नौ साल तक संघर्ष किया और बरी होने के लिए कड़ा संघर्ष किया. हमें नक्सली चरमपंथी के रूप में फंसाया गया था लेकिन आरोप पत्र में इन आरोपों को इंगित करने के लिए कोई बिंदु नहीं थे. हमारी बेगुनाही साबित हो गई है.”

वित्ताला ने कहा कि हम अदालत की हर सुनवाई में शामिल हुए. कोविड के दौरान भी हम कुछ दिन कोर्ट के बाहर खड़े रहते थे. सुनवाई के लिए अपने गांव से मैंगलोर जाना हमारे लिए बहुत मुश्किल था. हमें सुबह 11 बजे से पहले अदालत में पहुंचना था और हमारे गांव के पास से कोई बस नहीं थी.

कोविड के दौरान कई सुनवाई में मालकुडिया ने अपने वकील दिनेश हेगड़े उलेपदी की मदद से व्हाट्सऐप वीडियो कॉल के माध्यम से भाग लिया. मालकुडिया आदिवासी समुदाय राष्ट्रीय उद्यान के आसपास के जंगलों में रहता है और वन उपज बेचकर और थोड़ी-बहुत खेती करके गुजारा करते हैं.

जब उन्हें गिरफ्तार किया गया तब वित्ताला मैंगलोर विश्वविद्यालय में पत्रकारिता के स्नातकोत्तर कार्यक्रम के दूसरे सेमेस्टर में थे. वो मार्च से जून के बीच जेल में थे और उहें 2012 में अपनी सेमेस्टर परीक्षा लिखने के लिए विशेष अनुमति प्राप्त करने के लिए पुत्तूर और बेलथांगडी में अदालतों के बीच भागना पड़ा.

वित्ताला ने कहा, “मुझे परीक्षा में हथकड़ी में ले जाया गया था और इसने उस समय एक विवाद पैदा कर दिया था.”

पुलिस द्वारा 90 दिनों की न्यायिक हिरासत खत्म होने पर आरोप पत्र दाखिल करने में विफल रहने के बाद पिता और पुत्र को जून 2012 में तकनीकी जमानत दी गई थी. वित्ताला ने 2016 में अपना कोर्स पूरा किया और उन्हें 2018 में एक स्थानीय समाचार पत्र में नौकरी मिल गई.

वकील उलेपडी ने कहा, “मुझे यह साबित करने में बहुत संतुष्टि महसूस होती है कि वे निर्दोष थे. पुलिस ने खुद स्वीकार किया कि जब्त की गई सामग्री घरेलू सामान थी.”

दक्षिण कन्नड़ के तीसरे अतिरिक्त जिला न्यायाधीश बी बी जकाती ने उन्हें बरी करते समय जिन प्रमुख कारकों की ओर इशारा किया उनमें से एक यह है कि पुलिस जब्त की गई सामग्री में से तीन मोबाइल फोन से कथित नक्सल लिंक का कोई सबूत देने में विफल रही.

अदालत ने कहा, “इन मोबाइलों का सीडीआर तैयार नहीं किया गया है. मुकदमे के दौरान भी अभियोजन पक्ष ने जब्त किए गए मूल मोबाइलों में उपलब्ध आपत्तिजनक सबूत नहीं दिखाए हैं. सिर्फ अभियुक्तों की हिरासत से या उनके कहने पर मोबाइलों को जब्त करने से अभियोजन पक्ष के मामले में किसी भी तरह से मदद नहीं मिलेगी.”

वित्ताला के कमरे में मिले पत्र पर अदालत ने कहा, “ऐसा प्रतीत होता है कि पत्रकारिता के छात्र होने के नाते आरोपी नंबर 6 ने लोकसभा उपचुनाव का बहिष्कार करने के लिए ऐसा पत्र लिखा था. क्योंकि नेताओं ने कुथलूर गांव के आदिवासियों की लंबे समय से चली आ रही मांगों को पूरा नहीं किया है. पढ़ने के बाद यह आसानी से कहा जा सकता है कि इस तरह के पत्रों में स्थानीय लोगों की मांगें होती हैं.”

अदालत ने यह भी देखा है कि गांव के कम से कम दस लोगों, जिन्हें अभियोजन पक्ष के 23 गवाहों में शामिल किया गया था ने पुलिस के मामले का समर्थन नहीं किया था.

अदालत ने कहा कि किसी भी गवाह ने यह नहीं कहा है कि आरोपी नंबर 6 और 7 ने देशद्रोह का अपराध किया है. यह दिखाने के लिए रिकॉर्ड में कोई सबूत नहीं है कि आरोपी नंबर 6 या 7 ने अपने शब्दों या संकेतों या दृश्य अभ्यावेदन द्वारा घृणा या अवमानना ​​​किया या उत्तेजित किया या सरकार के प्रति असंतोष को उत्तेजित करने की कोशिश की.

(Photo Credit: The Indian Express)

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