विकास की सबसे बड़ी क़ीमत आदिवासी औरतों ने चुकाई है

जबरन प्रवास और विस्थापन साथ ही आदिवासी क्षेत्रों में हिंदुत्व के अधिक आक्रामक प्रसार ने समुदाय और विशेष रूप से महिलाओं की आज़ादी को छीन लिया है. उन्हें "अच्छी, विनम्र हिंदू महिला" बनने के लिए मजबूर किया जाता है.

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आदिवासी कुल भारतीय जनसंख्या (2011 की जनगणना) के करीब 8.6 फीसदी हैं और ग्रामीण आबादी का 12 फीसदी. वहीं देशभर में 705 से अधिक आदिवासी समूह फैले हुए हैं. हालांकि वे बड़े पैमाने पर देश के उत्तरपूर्वी हिस्सों में केंद्रित हैं.

आदिवासियों को संबोधित करने के लिए अलग-अलग नामावली का प्रयोग किया जाता है. उन्हें स्वदेशी, वनवासी, आदिवासी, आदम जाति और कई अन्य नामों से जाना जाता है.

ऐसे में इम्पैक्ट एंड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट (IMPRI) में जेंडर इम्पैक्ट स्टडीज सेंटर (GISC), जेनदेव सेंटर फॉर रिसर्च एंड इनोवेशन और दिल्ली पोस्ट न्यूज ने ‘आदिवासी महिलाओं: वन, भूमि और आजीविका’ के मुद्दों पर सेवानिवृत्त प्रोफेसर इंद्र मुंशी के साथ एक संयुक्त वार्ता का आयोजन किया है.

(प्रतिकात्मक फोटो)

इंद्र मुंशी मुंबई विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे. उन्होंने आदिवासी समुदायों को मुख्यधारा से बाहर करने पर चिंता जताई. प्रोफेसर मुंशी ने आदिवासियों के 200 साल पुराने इतिहास पर प्रकाश डाला है, जिसमें वन विभाग की स्थापना और वन नीति की शुरुआत शामिल थी.

दरअसल कई आदिवासी अलग-अलग जगहों पर रहते हैं और जंगलों में शिफ्टिंग खेती करते हैं. उन्होंने जीवित रहने के लिए लकड़ी, जलाऊ लकड़ी, घास, छोटे जानवर, सब्जियां, नट, फल और बांस की जड़ें जैसी जीवन की अन्य आवश्यकताएं एकत्र कीं.

प्रोफेसर मुंशी ने कहा, “क़ानून का इस्तेमाल कर वन विभाग ने उनके अधिकारों को विशेषाधिकारों में और फिर रियायतों में बदल दिया.”

आदिवासी महिलाओं की स्थिति

सबसे ज्यादा नुकसान आदिवासी महिलाओं को हुआ है. उनकी जिम्मेदारियों में उनके घर चलाने के लिए जंगल से सब कुछ इकट्ठा करना शामिल है और इसलिए उन्होंने जंगल को एक आदिवासी महिला का “मातृ घर” कहा.

जंगल ऐसे स्थान हैं जहां वे बाहर निकलते हैं, खुले में समय बिताते हैं और आनंद लेते हैं. औपनिवेशिक काल के दौरान वनों के साथ-साथ भूमि के तेजी से व्यावसायीकरण ने साहूकारों, जमींदारों, दुकानदारों और सरकारी अधिकारियों के रूप में नई व्यवस्थाओं को जन्म दिया.

(प्रतीकात्मक फोटो)

IMPRI के मुताबिक कई आदिवासी समुदायों ने कहा कि उनकी महिलाओं को प्रमुख समूहों द्वारा संपत्ति के रूप में माना जाता था. प्रोफेसर मुंशी ने तर्क दिया कि ज्यादातर आदिवासी समुदायों में अनुष्ठान, निर्णय लेने और शिकार के क्षेत्र में लैंगिक असमानता मौजूद थी. लेकिन महिलाओं को अपने गैर-आदिवासी समकक्षों की तुलना में अपने जीवन के प्रमुख क्षेत्रों में अपेक्षाकृत समान स्वतंत्रता का आनंद मिला.

यह आजादी उनकी बॉडी लैंग्वेज में भी देखने को मिली. लेकिन यह निश्चित रूप से उनके बेदखल होने और एक औपनिवेशिक प्रकार के पूंजीवाद में शामिल होने के साथ बदल गया है. इसलिए वे पितृसत्ता के सबसे खराब रूपों के अधीन हो गए.

जबरन प्रवास और विस्थापन साथ ही आदिवासी क्षेत्रों में हिंदुत्व के अधिक आक्रामक प्रसार ने समुदाय और विशेष रूप से महिलाओं की आज़ादी को छीन लिया है. उन्हें “अच्छी, विनम्र हिंदू महिला” बनने के लिए मजबूर किया जाता है.

(प्रतीकात्मक फोटो)

कुल मिलाकर नवउदारवादी आर्थिक नीति और तेजी से निजीकरण ने इन समृद्ध प्राकृतिक क्षेत्रों को उद्योग के काम के लिए कॉरपोरेट्स के लिए खोल दिया है. पूंजीवाद निर्माण और खनन के जरिए प्राकृतिक संसाधनों का ह्रास कर रहा है. डेविड हार्वे के मुताबिक, “ये पूंजीवाद की दो आक्रामक गतिविधियां हैं.”

पूंजीवाद की मानवीय लागत

पूंजीवाद की लागत में एक पर्यावरण और एक मानवीय लागत शामिल है. मानव लागत में पूरे परिवारों का प्रवास या पुरुषों और महिलाओं का शहरों में मौसमी प्रवास शामिल है. शहरों में उनकी नौकरियों में निर्माण स्थलों पर काम करना शामिल है. खासकर ईंट भट्टों में, विनिर्माण क्षेत्रों में, जहां उन्हें पुरुषों की तुलना में कम भुगतान किया जाता है.

वे अस्थायी आश्रयों में रहते हैं. इन आश्रयों में न सिर्फ पानी, ईंधन और स्वच्छता सुविधाओं की कमी है बल्कि कम जगह में गुजर बसर करना पड़ता है. उन्हें अपने बच्चों की देखभाल करनी पड़ती है, परिवार के लिए खाना बनाना पड़ता है और घर के दूसरे काम भी सीमित जगह में ही करने पड़ते हैं.

सबसे बुरी बात यह है कि उन्हें कभी-कभी अपने ठेकेदारों और पर्यवेक्षकों से यौन उत्पीड़न का भी सामना करना पड़ता है. इसके बावजूद वे अपनी आय से अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं क्योंकि वन उत्पादों की बिक्री में गिरावट आई है. इसके अलावा सहकारी समितियों के अभाव में व्यापारियों द्वारा उनका शोषण भी किया जाता है.

(प्रतिकात्मक फोटो)

वहीं कोरोना महामारी से आदिवासी महिलाओं को जिन मुश्किलों का सामना करना पड़ा है उसने उनके जीवन स्तर को पहले से और खराब कर दिया है. उदाहरण के लिए ओडिशा में लोग लॉकडाउन से पहले पत्तों का एक गुच्छा 20 रुपए में बेचते थे, जबकि लॉकडाउन के बाद यह घटकर 5 रुपए रह गया है.

ऐसे में मजबूरन उन्हें अपनी उपज बहुत ही कम दामों पर बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है. इसी तरह आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के आदिवासियों को भी ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ा है. इतना ही नहीं कोरोना वायरस फैलने के डर से महिलाओं को वन्यजीव अभयारण्यों तक पहुंचने से प्रतिबंधित कर दिया गया है.

वन विभाग द्वारा वनों में आवाजाही के संबंध में कई सारे नियमों के लागू होने के चलते यहां तक कि जीवन की मूलभूत आवश्यकताएं जैसे सब्जियां और फल भी उनसे छीन लिए गए थे.

खानाबदोश आदिवासियों के बारे में क्या?

महाराष्ट्र में जमीन के कुछ टुकड़े पर कृषि उत्पाद बोए गए थे जो सरकार द्वारा राजस्व उत्पन्न करने के लिए खरीदे गए थे. इसने खानाबदोश और अर्ध-घुमंतू जनजातियों पर प्रतिकूल प्रभाव डाला क्योंकि उन्हें पहले इन भूमि की देखभाल के लिए एक कमीशन दिया गया था.

ये खानाबदोश जनजाति न सिर्फ स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित हैं बल्कि उन्हें निजता और यहां तक कि अपने घर बुलाने की जगह से भी वंचित रखा गया है. पहचान पत्र होने के बावजूद उन्हें बुनियादी जरूरतें और मानवीय सुविधाएं नहीं दी जाती हैं. इसके चलते कुछ खानाबदोश महिलाएं भीख मांगने लगी हैं.

प्रोफेसर मुंशी ने तीन बिंदुओं पर बात करके अपना व्याख्यान समाप्त किया जिन पर हमें ध्यान देना चाहिए…

1.आदिवासी समुदायों विशेषकर इन समुदायों की महिलाओं के अस्तित्व का सम्मान करने की जरूरत है. वे देश में वन प्रबंधन प्रणाली का नेतृत्व कर सकते हैं जो भागीदारी और लोकतांत्रिक दोनों होगी.

2.आदिवासी महिलाओं के जीवन कौशल को संरक्षित किया जाना चाहिए और दूसरों को भी सिखाया जाना चाहिए.

3. हमें न सिर्फ आदिवासी लोगों के कौशल और ज्ञान को गंभीरता से लेने की जरूरत है बल्कि उन्हें अपनी वन प्रबंधन प्रणाली में शामिल करने की भी जरूरत है.

व्याख्यान के बाद प्रोफेसर वर्जिनियस ज़ाक्सा (Virginius Xaxa) ने कहा कि औपनिवेशिक इतिहास ने आदिवासियों पर उनकी वन नीतियों सहित प्रतिकूल प्रभाव डाला है. आजादी के बाद भी यह सिलसिला जारी रहा.

हालांकि औपनिवेशिक भारत में वन अधिकारों में बदलाव आया है लेकिन आज़ादी के बाद की अवधि में यह बदतर था.

उदाहरण के लिए 1952 की वन नीति में यह अनिवार्य किया गया था कि 33 फीसदी भूमि वनों से ढ़का हो लेकिन भूमि की कमी के चलते सरकार ने आदिवासियों की भूमि पर अतिक्रमण करना शुरू कर दिया.

कुछ संगठनों (जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) के विचारों को समाज में प्रसारित किया जा रहा है, जिससे महिलाओं को अधीनता और वर्चस्व की ओर अग्रसर किया जा रहा है.

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि गैर-आदिवासी आबादी राज्य और राजनीतिक अर्थव्यवस्था के बीच संबंधों की पहचान करने की आवश्यकता है.

आदिवासी लोगों के इतिहास के बारे में बात करते हुए प्रोफेसर ज़ाक्सा कहते हैं कि औपनिवेशिक काल के दौरान आदिवासी लोगों को एक अलग अज्ञात धर्म का पालन करने वाला माना जाता था. लेकिन उत्तर-औपनिवेशिक काल के दौरान आदिवासी लोग अवशिष्ट श्रेणी में आ गए और उन्हें हिंदू माना जाने लगा.

समसामयिक काल में आगे बढ़ते हुए आदिवासी न सिर्फ शिक्षित हैं बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में फैले हुए हैं. उन्होंने छात्र संघ भी बनाए हैं. लेकिन आदिवासी लोगों का विकास, विशेषकर पांचवीं अनुसूची के क्षेत्रों में बेदखली और विस्थापन के कारण नहीं हो पाया है, जिसने उनके जीवन को तबाह कर दिया है.

उन्होंने कहा कि राजनीतिक अर्थव्यवस्था तब तक मदद नहीं करेगी जब तक कि उनके विकास की प्रक्रिया में आदिवासी लोगों की भागीदारी न हो. यहां तक कि सकारात्मक कार्रवाई कार्यक्रमों ने भी बहुत अच्छा काम नहीं किया है. जैसा कि झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में गरीबी के उच्च स्तर से समझा जा सकता है, जहां अन्य सामाजिक-आर्थिक संकेतक और भी खराब हैं.

पूर्वोत्तर भारत के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि गैर-आदिवासी राज्यों की उपस्थिति के बावजूद आदिवासी लोगों द्वारा नियंत्रित भूमि के बड़े हिस्से हैं. पूर्वोत्तर में अल्पसंख्यक बहुत मजबूत हैं और इस प्रकार सामाजिक संकेतकों पर उच्च रैंक, जैसा कि आंकड़ों में स्पष्ट है जहां पूर्वोत्तर राज्यों का औसत भारतीय औसत से ऊपर है.

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