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हिमाचल के किन्नौर में आदिवासी महिलाएं सदियों पुराने कानून को खत्म करने की उम्मीद में राष्ट्रपति से मिलेंगी

दिसंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से आदिवासी महिलाओं को पारिवारिक संपत्ति के समान अधिकार से वंचित करने वाले कानून में संशोधन पर विचार करने के लिए कहा. जस्टिस एमआर शाह की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा था,“जब एक गैर-आदिवासी की बेटी पिता की संपत्ति में समान हिस्से की हकदार होती है तो आदिवासी समुदाय की बेटी को इस तरह के अधिकार से वंचित करने का कोई कारण नहीं है. महिला आदिवासी बिना वसीयत उत्तराधिकार में पुरुष आदिवासी के साथ समानता की हकदार है.“

हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले की 42 वर्षीय एक आदिवासी महिला 2011 में अपने पिता और 2015 में अपने पति की मौत के बाद से ही अपने चाचा की “दया” पर रह रही है. वैसे तो पिता की मृत्यु के बाद नियम से तो उनकी सारी संपत्ति उसकी होनी चाहिए थी लेकिन इसके बजाय उसके चाचा के पास चली गई.

नाम न छापने की शर्त पर महिला ने कहा, “किसी भी दूसरी किन्नौरी महिला की तरह मेरे लिए भी यह सामान्य था. लेकिन जब मैंने अपने पति को खोया तो मैंने सब कुछ खो दिया. मेरे पास कोई सहारा नहीं था. अगर मेरे पास कुछ जमीन होती तो मैं अपनी आजीविका कमा सकती थी लेकिन मैं अपने चाचा की दया पर थी.”

उनकी तरह, किन्नौर में हजारों महिलाएं एक सदियों पुराने परंपरागत कानून ‘वाजिब उल उर्ज’ के कारण पीड़ित हैं. यह परंपरागत कानून पति की पैतृक संपत्ति में पत्नी और पिता की संपत्ति में बेटी को किसी भी हिस्से से वंचित करती है.

सिस्टम से परेशान होकर ये महिलाएं अब आदिवासी समुदाय से आने वाली भारत की पहली राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू पर अपनी उम्मीदें लगा रही हैं जो कि 18 से 21 अप्रैल तक राज्य की तीन दिवसीय यात्रा पर जाने वाली हैं.

सुप्रीम कोर्ट के 2020 और दिसंबर 2022 के फ़ैसलों के बावजूद महिला कार्यकर्ताओं ने उन्हें इस मुद्दे से अवगत कराने के लिए राष्ट्रपति से मिलने का समय मांगा है, जिसमें कहा गया है कि महिलाओं को विरासत में समान अधिकार है और आदिवासी महिलाओं को उनके पिता या जीवनसाथी की संपत्ति न मिलना अनुचित है.

महिला अधिकार समूह महिला कल्याण परिषद की संस्थापक रतन मंजरी (70) के मुताबिक, संविधान से लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक सब कुछ महिलाओं के पक्ष में है, लेकिन “सिर्फ भगवान ही जानता है कि आदिवासी महिलाओं को उनके अधिकारों को पाने से क्या रोक रहा है”.

तीन दशकों से अधिक समय से महिलाओं के समान अधिकारों के लिए लड़ने वाली मंजरी ने दिप्रिंट को बताया, “अब हमें राष्ट्रपति से उम्मीदें हैं. वह एक आदिवासी महिला हैं और वह जरूर हमारी दुर्दशा को समझेंगी.”

यह दावा करते हुए कि मिलने का समय लेने के लिए उन्होंने राष्ट्रपति कार्यालय से संपर्क किया है. उन्होंने कहा, “हम शिमला जाएंगे. मुझे यकीन है कि वह हमारी बात सुनेंगी. अगर शिमला में नहीं तो हम उनसे मिलने दिल्ली जाएंगे.”

वाजिब उल उर्ज के बारे में पूछे जाने पर मंजरी ने साफ तौर पर कहा कि “इसे हटना होगा.”

एक पूर्व सैनिक की बेटी और इस कानून की शिकार मंजरी ने कहा, “जब देश का कानून पुरुषों और महिलाओं के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करता है तो ऐसे कानून क्यों मौजूद हैं.”

वाजिब उल उर्ज, जिसका अर्थ है “अधिकारों का रिकॉर्ड”, 1926 में अस्तित्व में आया और संसद द्वारा हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 पर हस्ताक्षर किए जाने के बावजूद जिसने पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार दिए, हिमाचल प्रदेश के आदिवासी जिलों में अभी भी मनाया जाता है.

हालांकि, मंजरी के विपरीत कुछ लोगों के लिए ये परंपरागत कानून गहरे अर्थ रखते हैं.

नाम न बताने की शर्त पर एक सेवानिवृत्त सिविल सेवक ने कहा, “उद्देश्य, आदिवासी भूमि और संस्कृति की रक्षा करने का था. राजस्व से संबंधित हर कानून में आदिवासी क्षेत्रों के संबंध में विशेष प्रावधान हैं. हम परंपरागत कानूनों को एक सिरे से खारिज नहीं कर सकते. यहां तक कि आदिवासी महिलाएं भी ऐसा नहीं चाहेंगी.”

मध्यम दृष्टिकोण की वकालत करते हुए उन्होंने कहा कि जहां तक विरासत के अधिकारों का संबंध है, “कोई भी कस्टमरी लॉ के कारण पीड़ित लोगों के खिलाफ नहीं है. सरकार को एक सिस्टम के साथ आना चाहिए ताकि न तो हमारी महिलाएं पीड़ित हों और न ही आदिवासी भूमि और संस्कृति पर अतिक्रमण हो.”

लंबी कानूनी खींचतान

दिसंबर 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से आदिवासी महिलाओं को पारिवारिक संपत्ति के समान अधिकार से वंचित करने वाले कानून में संशोधन पर विचार करने के लिए कहा. जस्टिस एमआर शाह की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा था,“जब एक गैर-आदिवासी की बेटी पिता की संपत्ति में समान हिस्से की हकदार होती है तो आदिवासी समुदाय की बेटी को इस तरह के अधिकार से वंचित करने का कोई कारण नहीं है. महिला आदिवासी बिना वसीयत उत्तराधिकार में पुरुष आदिवासी के साथ समानता की हकदार है.“

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने अगस्त 2020 के फैसले में कहा था कि बेटियों को हिंदू अविभाजित पारिवारिक संपत्तियों में समान अधिकार प्राप्त होंगे, भले ही पिता 9 सितंबर, 2005 को जीवित थे या नहीं.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी फैसला सुनाया कि 1956 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 के तहत दिया गया अधिकार जन्म से प्राप्त होता है. जस्टिस अरुण मिश्रा, एस. अब्दुल नज़ीर और एमआर शाह की पीठ ने 2020 में कहा था, “हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 6 में निहित प्रावधान संशोधन से पहले या बाद में पैदा हुई बेटी को बेटे के समान ही कोपार्सनर का दर्जा प्रदान करते हैं.”

हिमाचल प्रदेश के चंबा में एक जिला अदालत ने 2002 में आदिवासी महिलाओं के पक्ष में फैसला सुनाया लेकिन इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई, जिसने 2015 में जिला अदालत के आदेश को बरकरार रखा.

इस फैसले ने आदिवासी महिलाओं के लिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के अनुसार पारिवारिक संपत्ति में हिस्सा पाने का मार्ग प्रशस्त किया.

अदालत ने फैसला सुनाया था, “आदिवासी क्षेत्रों में बेटियों को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अनुसार संपत्ति विरासत में मिलेगी न कि रीति-रिवाजों के अनुसार. यह महिलाओं को सामाजिक अन्याय और सभी प्रकार के शोषण का सामना करने से रोकने के लिए है.”

आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता दिलीप नेगी के मुताबिक, लाहौल और स्पीति के याचिकाकर्ताओं ने फरवरी 2016 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “यह मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित है. लेकिन आदिवासी महिलाओं की पीड़ा और दुर्दशा को खत्म करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है. यह पुराना मामला है.”

‘जष्टांग और कोंचांग’

किन्नौर की आदिवासी महिलाओं ने जोर देकर कहा कि उनके समुदाय के पुरुष उन्हें संपत्ति का अधिकार दिलाने के पक्ष में नहीं हैं. किन्नौर की हंगरंग घाटी की निवासी डोलमा नेगी ने कहा, “वे (पुरुष) सोचते हैं अगर किसी महिला को संपत्ति का अधिकार मिल जाता है और फिर वह गैर-आदिवासी पुरुष से शादी करना चुनती है तो संपत्ति पति के पास होगी.”

उन्होंने कहा कि आदिवासी भूमि और संस्कृति को हमारे (महिलाओं के) अधिकार की कीमत पर नहीं बचाया जा सकता है.

मंजरी के मुताबिक, यह सुनिश्चित करने के लिए क्लॉज़ बनाए जा सकते हैं कि विरासत के अधिकारों का दुरुपयोग न हो. “आप एक विधवा से पूछिए जिसका कोई सहारा नहीं है और उसका अपने पिता की संपत्ति पर भी कोई अधिकार नहीं है. क्या यह अनुचित नहीं है? बस उस जमीन को गैर आदिवासियों को हस्तांतरित नहीं किया जाना चाहिए इस डर के चलते क्या यह हमारी बेटियों और बहनों के साथ अन्याय नहीं है?”

वह जो सवाल उठाती है, वह “जष्टांग” और “कोंचांग” को देखते हुए और भी महत्वपूर्ण हो जाता है.

जष्टांग का अर्थ है सबसे बड़े पुत्र का “अधिकार”, जबकि कोंचांग का अर्थ है सबसे छोटे का “अधिकार”. किन्नौर के निवासी प्रेम नेगी ने बताया कि सबसे बड़े बेटे को सबसे अच्छी कृषि भूमि मिलती है और बाकी संपत्ति दूसरों के बीच बांट दी जाती है, जबकि सबसे छोटे बेटे को पैतृक घर मिलता है.

जनजातीय कानूनों के मुताबिक, अगर किसी पुरुष उत्तराधिकारी के बिना पिता की मृत्यु हो जाती है तो उसकी संपत्ति उसकी अविवाहित बेटी को विरासत में मिलती है, जिसे संपत्ति बेचने, उपहार देने या विभाजित करने की अनुमति नहीं होती है. यह संपत्ति तब पैतृक पुरुष उत्तराधिकारी के पास जाती है जब बेटी की शादी हो जाती है.

इससे पहले 2015 में कांग्रेस नेता स्वर्गीय उर्मिला सिंह ने आदिवासी महिलाओं के संपत्ति अधिकारों की प्राप्ति की वकालत की थी. हिमचाल प्रदेश की गवर्नर रहते हुए जब उनके सामने यह मुद्दा आया तब उन्होंने कहा था, “मैं उनके लिए कुछ करना चाहूंगी. राजनीतिक दलों को इस मुद्दे पर एक साथ आना चाहिए.”

आदिवासी समुदायों को बहस से भागना नहीं चाहिए

हिमाचल प्रदेश में आदिवासी महिलाओं ने अपने अधिकार के लिए राष्ट्रपति से मिलने का फैसला किया है. लेकिन यह मसला सिर्फ हिमाचल प्रदेश तक सीमित नहीं है. बल्कि यह मसला हर उस राज्य में मौजूद हैं जहां जहां आदिवासी समुदाय रहते हैं.

पूर्वोत्तर के राज्यों के बारे में यह धारणा मजबूत है कि वहां पर महिला प्रधान समुदाय हैं. लेकिन उन समुदायों में भी महिलाओं को संपत्ति में हिस्सा नहीं दिया जाता है. इस मसले पर अलग अलग राज्यों में आदिवासी महिलाएं बोल रही हैं. लेकिन आदिवासी समाज का नेतृत्व अभी भी इस मुद्दे से नज़रें चुरा रहा है.

(Photo Credit: The Print)

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