आदिवासियों के खिलाफ अत्याचार के मामले में यूएस नगर टॉप पर – ST आयोग की रिपोर्ट

संयोग से रुद्रप्रयाग से 2016-17 से 2020-21 तक एक भी मामला दर्ज नहीं किया गया. जबकि बागेश्वर और अल्मोड़ा में एक-एक और टिहरी, उत्तरकाशी और चंपावत में दो-दो मामले दर्ज किए गए.

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उत्तराखंड अनुसूचित जनजाति आयोग के 2020-21 के रिपोर्ट के मुताबिक, आदिवासी समुदाय के खिलाफ अत्याचार की उच्चतम दर यूएस (उधम सिंह) नगर जिले (54) में दर्ज की गई, इसके बाद देहरादून (30) में दर्ज की गई. जबकि इससे पहले 2019-20 में देहरादून (62) शीर्ष पर रहा, जबकि यूएस नगर (56) दूसरे स्थान पर रहा था.

2020-21 में रिपोर्ट किए गए कुल मामले 103 थे, जो पिछले दो सालों की तुलना में एक महत्वपूर्ण गिरावट को दर्शाता है. जब 2019-20 में 140 और 2018-19 में 160 मामले आदिवासी आयोग में दर्ज किए गए थे.

रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि 2016-17 से 2020-21 तक कुल 509 मामले आयोग को रिपोर्ट किए गए. इनमें से 250 मामले लंबित हैं.

2016-17 से 2020-21 तक जिले के अनुसार यूएस नगर से आदिवासी समुदाय के खिलाफ अत्याचार के कुल 212 मामले सामने आए. इसके बाद देहरादून से 150, पिथौरागढ़ से 69, हरिद्वार से 21 और पौड़ी से 17 मामले सामने हैं.

संयोग से रुद्रप्रयाग से 2016-17 से 2020-21 तक एक भी मामला दर्ज नहीं किया गया. जबकि बागेश्वर और अल्मोड़ा में एक-एक और टिहरी, उत्तरकाशी और चंपावत में दो-दो मामले दर्ज किए गए.

2020-21 में 5 जिलों – रुद्रप्रयाग, अल्मोड़ा, चंपावत, बागेश्वर और पौड़ी – ने आदिवासी समुदाय के खिलाफ अत्याचार के शून्य मामले दर्ज किए.

उत्तराखंड अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष मूरत राम शर्मा ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि उन्हें सबसे ज्यादा शिकायतें जमीन से संबंधित मिली थीं.

मूरत शर्मा का कहना है कि यहां गैर-आदिवासियों द्वारा औने-पौने दामों पर आदिवासी भूमि खरीदे जाने का मुद्दा है. यह गलत प्रथा है. न तो आदिवासियों और न ही गैर-आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति समुदाय के लिए निर्दिष्ट भूमि खरीदने की अनुमति है. यूएस नगर में यह समस्या आम है.

हालांकि देहरादून के जौनसार बावर क्षेत्र में भूमि का एक विशाल विस्तार है, वहां से ऐसे मामले सामने नहीं आते हैं क्योंकि इस क्षेत्र में यूएस नगर के विपरीत अनुसूचित जनजातियों की एक बड़ी आबादी है.

उन्होंने कहा कि हमारे पास आने वाली शिकायतें ज्यादातर मुआवजे को लेकर होती हैं. आदिवासियों को अपनी जमीन पर राजमार्ग बनाने के लिए सरकार द्वारा बकाया राशि का भुगतान न करने का अफसोस है. फिर कुछ ऐसे भी हैं जो कर्ज नहीं चुका पा रहे हैं और बैंकों द्वारा अपनी जमीन नीलाम करने की शिकायत कर रहे हैं.

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