एक आदिवासी पार्टी ने बीजेपी शासित राज्य की राजनीति में उथल-पुथल कर दी

बीजेपी को चुनाव जीतने वाली मशीन माना जाता है. इसके अलावा पार्टी जहां चुनाव नहीं जीत पाती है, वहाँ पिछले दरवाज़े से सत्ता हासिल करने में माहिर हो चुकी है. लेकिन देश का एक राज्य ऐसा भी है जहां बीजेपी पहली बार बड़ी जीत हासिल करके सत्ता में आई थी, लेकिन एक आदिवासी संगठन ने उसकी नींद उड़ा दी है. अगला विधान सभा चुनाव कुछ महीने दूर है और बीजेपी समझ नहीं पा रही है कि जीत के लिए करे तो करे क्या ?

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त्रिपुरा में अगले साल यानि 2023 के मार्च महीने तक विधान सभा के चुनाव हैं. फ़िलहाल राज्य में बीजेपी की सरकार है. बीजेपी ने चुनाव से 7-8 महीने पहले राज्य में मुख्यमंत्री बदल दिया है. 

बीजेपी ने बिप्लब कुमार देब को मुख्यमंत्री के पद से हटा कर माणिक साह को राज्य की बागडोर सौंपी है. इस बदलाव से बीजेपी को उम्मीद है कि पार्टी के प्रति मतदाता की नाराज़गी कम हो सकती है. 

त्रिपुरा में बीजेपी पहली बार 2018 में बड़ी धूमधाम से सत्ता में आई थी. बीजेपी त्रिपुरा में यह बड़ी जीत आदिवासी समर्थन के दम पर हासिल हुई थी. 2018 के विधान सभा चुनाव में आईपीएफटी (Indigenous People’s Front of Tripura) के साथ बीजेपी का गठबंधन था.

इस गठबंधन ने राज्य में माणिक सरकार के नेतृत्व में चल रही सीपीएम की सरकार को उखाड़ फेंका था. लेकिन इतनी बड़ी जीत हासिल करने वाली बीजेपी को चुनाव से कुछ ही महीने पहले मुख्यमंत्री को बदलना पड़ा है. 

दरअसल बीजेपी को त्रिपुरा में सत्ता हाथ से फिसलती हुई नज़र आ रही है. बीजेपी की भरपूर कोशिश है कि 2023 के विधानसभा चुनाव में कम अंतर से ही सही पर सत्ता में लौटा जाए.

लेकिन उसको एक आदिवासी पार्टी से ज़बरदस्त चुनौती मिल रही है. इस पार्टी का नाम है टिपरा मोथा और इसके नेता प्रद्योत देबबर्मन हैं. बीजेपी के साथ गठबंधन करने वाली IPFT का वजूद लगभग ख़त्म हो चुका है. उसके सारे बड़े नेता और कार्यकर्ता टिपरा मोथा में शामिल हो चुके हैं. 

टिपरा मोथा के नेता प्रद्योत देबबर्मन

त्रिपुरा में 60 विधान सभा सीटों में से कम से कम 20 सीटें आदिवासी इलाक़े में हैं. इस राज्य में आदिवासी जिस पर मेहरबान हो जाए उसका सत्ता में आना तय माना जाता है. 

राज्य में बन रहे नए समीकरणों पर त्रिपुरा में आज की तारीख़ में सबसे चर्चित और टिपरा मोथा के अध्यक्ष प्रद्योत देबबर्मन से लंबी बातचीत की. इस बातचीत में प्रद्योत देबबर्मन का कहना था, “त्रिपुरा के अगले विधान सभा चुनवा के बाद कोई भी पार्टी हमारे समर्थन के बिना सत्ता में नहीं आ सकती है. हमने तय किया है कि हम टिपरालैंड की माँग पर क़ायम रहेंगे और किसी भी सरकार को बाहर से ही समर्थन देंगे.”

वो आगे कहते हैं, “ IPFT अब ख़त्म हो चुकी है. उस पार्टी में जो बचे हुए नेता या कार्यकर्ता हैं वो भी चुनाव से पहले हमारे साथ आ चुके होंगे. या फिर वो अपने दम पर चुनाव लड़ कर बीजेपी विरोधी वोट को बाँटने की कोशिश करेंगे.”

प्रद्योत देबबर्मन कहते हैं कि राज्य में मुख्यमंत्री का चेहरा बदलने से बीजेपी को फ़ायदा नहीं होगा. वो कहते हैं कि आज राज्य में सभी जानते हैं कि बीजेपी को आदिवासी वोट नहीं मिलेगा. इसलिए उनका जीतना भी संभव नहीं होगा.

1998 से 2018 तक त्रिपुरा के मुख्यमंत्री रहे माणिक सरकार ने MBB से बातचीत करते हुए कहा कि बीजेपी का राज्य में चुनाव से कुछ समय पहले ही मुख्यमंत्री बदलना यह बताता है कि उनकी सरकार का प्रदर्शन बहुत ख़राब रहा है. वो कहते हैं कि बीजेपी की सरकार की उपलब्धियाँ राज्य में ज़ीरो रही हैं.

राज्य के अगले विधानसभा चुनाव से पहले के बनते समीकरण पर माणिक सरकार कहते हैं कि यह देखना होगा कि अंततः ये समीकरण कैसा रूप लेते हैं. अभी शायद इस मामले पर कोई फ़ाइनल फ़ैसला देना जल्दबाजी होगी.

हालाँकि MBB से बात करते हुए त्रिपुरा में सीपीएम के एक वरिष्ठ नेता ने यह माना कि टिपरा मोथा के साथ जिसका गठबंधन बनेगा सत्ता उसकी ही होगी. यह आदिवासी नेता खुद आदिवासी समुदाय से आते हैं. उन्होंने हमें यह भी बताया कि सीपीएम टीपरा मोथा के साथ चुनाव में तालमेल बैठाने पर बातचीत कर रही है.

हालाँकि पार्टी अभी इस मामले में किसी तरह की डीटेल देने से बच रही है.

त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साह

त्रिपुरा की राजनीति की बारीकियों को समझने वाले वरिष्ठ पत्रकार समीरन रॉय कहते हैं कि आदिवासी इलाक़े की 20 सीटों के अलावा भी कई सीटों पर आदिवासी मतदाता महत्व रखता है.

इसलिए यह तो स्पष्ट है कि आदिवासियों के बिना त्रिपुरा में सत्ता हासिल करना किसी भी पार्टी के लिए संभव नहीं है. वो कहते हैं, “ बीजेपी के साथ IPFT टूट रहा है और बीजेपी उसके साथ गठबंधन का साथी है. इसलिए बीजेपी को आदिवासी इलाक़ों में भारी नुक़सान होगा. क्योंकि अब आदिवासी टिपरा मोथा के साथ हैं.”

उनका कहना है कि आदिवासी इलाक़ों में बीजेपी के लिए एक-दो सीट जीतना भी संभव नहीं होगा क्योंकि उसका गठबंधन सहयोगी पूरी तरह से बिखर चुका है और आदिवासी इलाक़ों में बीजेपी के पास संगठन नहीं है.

इसके अलावा वो इस बारे में कहते हैं कि बीजेपी राज्य की सत्ता में पहली बार आई थी. यहाँ के लोगों को उनसे बहुत उम्मीदें थीं. लेकिन बीजेपी की सरकार कुछ ख़ास नहीं कर पाई. 

इसलिए बीजेपी के लिए मुश्किलें कई मोर्चों पर होगी.

टिपरा मोथा के नेता प्रद्योत भी कहते हैं कि त्रिपुरा में 20 आदिवासी सीटों के अलावा कम से कम 12 सीटों पर आदिवासी मतदाता प्रभाव रखता है. वो दावा करते हैं कि अगले चुनाव में बीजेपी को बड़ी हार मिल रही है. 

त्रिपुरा के एक और वरिष्ठ पत्रकार सुजीत चक्रवर्ती कहते हैं, “बीजेपी को मुख्यमंत्री बदलने से कोई ख़ास फ़ायदा नहीं होगा. आदिवासी इलाक़ों में तो बिलकुल भी फ़ायदा होने की संभावना नहीं है. क्योंकि नए मुख्यमंत्री का आदिवासियों में काम करने का कोई अनुभव ही नहीं है.”

टिपरा मोथा और IPFT के मसले पर वो कहते हैं कि आज की तारीख़ में टिपरा मोथा बहुत बड़ा और ताक़तवर संगठन है जबकि IPFT बिखर गया है. इसलिए टिपरा मोथा ही अगले चुनाव में बड़ी ताक़त बन सकता है. 

वो कहते हैं कि इस संगठन ने बीजेपी ही नहीं बल्कि सीपीएम और कांग्रेस के लिए भी मुश्किल स्थिति बना दी है. 

बीजेपी को चुनाव जीतने वाली मशीन माना जाता है. इसके अलावा पार्टी जहां चुनाव नहीं जीत पाती है, वहाँ पिछले दरवाज़े से सत्ता हासिल करने में माहिर हो चुकी है. लेकिन देश का एक राज्य ऐसा भी है जहां बीजेपी पहली बार बड़ी जीत हासिल करके सत्ता में आई थी, लेकिन एक आदिवासी संगठन ने उसकी नींद उड़ा दी है.

अगला विधान सभा चुनाव कुछ महीने दूर है और बीजेपी समझ नहीं पा रही है कि जीत के लिए करे तो करे क्या ? क्योंकि राज्य की राजनीति के जानकार मानते हैं कि टिपरा मोथा ने अलग राज्य की जो माँग उठाई है वो ऐसी माँग है जिस पर बीजेपी उसके साथ नहीं जा सकती है.

टिपरा मोथा ने इस मसले पर जो पोजिशन ली है वह बीजेपी के लिहाज़ से काफ़ी मुश्किल स्थिति है. क्योंकि टिपरा मोथा का कहना है कि वो किसी सरकार में हिस्सेदारी नहीं करेगी. बल्कि उसका लक्ष्य अलग राज्य की स्थापना ही रहेगा.

राजनीति में स्थिति बहुत तेज़ी से बदलती है और निश्चित तौर पर कोई घोषणा नहीं की जानी चाहिए. लेकिन आज के हालात में बीजेपी का त्रिपुरा क़िला ढह रहा है और एक आदिवासी पार्टी यह काम कर रही है.

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