भारतीय जनता पार्टी (BJP) दशहरा के बाद गुजरात की अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित 27 विधानसभा सीटों पर 72 घंटे का जनसंपर्क अभियान चलाने की योजना बना रही है.
इसमें सांसद, विधायक और मंत्री गांवों में कैंप करेंगे, ग्राम सभाएं करेंगे और स्कूलों, आंगनवाड़ियों का दौरा करेंगे.
गुजरात बीजेपी से मिली जानकारी के अनुसार इस अभियान का मकसद पार्टी के विकास के एजेंडे को सीधे आदिवासी वोटरों तक पहुंचाना है. इसके साथ ही नेताओं को स्थानीय मुद्दों और संगठन की कमियों को करीब से समझने का मौका देना है.
बीजेपी की ओर से बांटी गई एक “गोपनीय” बुकलेट में आदिवासी इलाकों के हर तालुका के लिए कार्यक्रम की रूपरेखा दी गई है.
इस अभियान का मकसद है उत्तर में अंबाजी से लेकर दक्षिण में उमरगाम तक फैले आदिवासी इलाके – जिसे आम तौर पर “पूर्वी पट्टी” कहा जाता है, उसमें BJP के “विकसित भारत” के नैरेटिव को पूरी तरह फैलाना और विपक्ष का मुकाबला करना.
बीजेपी पकड़ मजबूत बनाए रखने की कोशिश में
2017 तक इस इलाके के बड़े हिस्से पर कांग्रेस का दबदबा था, जब उसने 27 एसटी सीटों में से 17 जीती थीं. वहीं उसकी सहयोगी भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) ने दो और BJP ने आठ सीटें जीती थीं.
हालांकि, 2022 में BJP ने 23 सीटें जीतीं, जिससे कांग्रेस तीन सीटों पर सिमट गई, जबकि AAP ने एक सीट जीती.
AAP ने इस इलाके में तब एंट्री की जब नर्मदा जिले की डेडियापाडा सीट से चैतर वसावा ने अपने चुनावी डेब्यू में भारी जीत हासिल की.
गुजरात की सभी चार एसटी आरक्षित लोकसभा सीटें अभी BJP के पास हैं.
यह संपर्क अभियान ऐसे समय में हो रहा है जब पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम (PESA), ज़मीन के अधिकारों और आदिवासी पहचान को लागू करने को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं.
वहीं प्रस्तावित गुजरात यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC), जिसे 2027 के चुनाव से पहले लागू किए जाने की उम्मीद है, उसमें अनुसूचित जनजाति के साथ-साथ उन लोगों और समूहों को भी बाहर रखा गया है जिनके पारंपरिक अधिकार संविधान के भाग 21 के तहत सुरक्षित हैं.
हालांकि, इस बहस ने पारंपरिक अधिकारों और आदिवासी पहचान को लेकर व्यापक चिंताओं को और बढ़ा दिया है.
भरूच से बीजेपी सांसद मनसुख वसावा ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ को बताया, “हमारे विधायक, सांसद और मंत्री अपने-अपने इलाकों में 72 घंटे बिताएंगे, हर तालुका का दौरा करेंगे और गांवों में रात रुकेंगे. आंगनवाड़ी में बच्चों का हौसला बढ़ाने से लेकर प्रधानमंत्री कुसुम योजना, सोलर पावर और आदिवासी यूनिवर्सिटी बनाने के फायदों के बारे में बताने तक, हमारा मकसद अपने काम को लोगों के सामने लाना है.”
सात बार सांसद रहे वसावा ने कहा कि इस कवायद से संगठन की कमियों का पता लगाने में भी मदद मिलेगी.
उन्होंने कहा, “अच्छा काम हुआ है और पार्टी पूरी तरह मजबूत है. लेकिन हम जैसे लोगों और संगठन के कार्यकर्ताओं की तरफ से कुछ कमियां रही हैं और विरोधियों ने उनका फायदा उठाया है. इस कार्यक्रम से हमें स्थिति को समझने में मदद मिलेगी. जो भी सुधार करने की जरूरत होगी, हम करेंगे.”
बीजेपी की संगठनात्मक चिंताएं इस साल की शुरुआत में नर्मदा जिले में तब दिखी थीं, जब नंदोद की विधायक दर्शना देशमुख की जिले के नेताओं के साथ सार्वजनिक बहस हुई थी और वह जून में धरने पर बैठ गई थीं. वसावा ने उनका समर्थन किया था. इसके बाद बीजेपी ने नर्मदा जिला इकाई के प्रमुख को बदल दिया.
बीजेपी के आदिवासी मोर्चा से जुड़े एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने कहा कि इस कवायद से नेताओं को उन मुद्दों का आकलन करने का मौका मिलेगा जो आम राजनीतिक कार्यक्रमों के दौरान सामने नहीं आते.
नेता ने कहा, “नेता लोगों की शिकायतें सुनेंगे, देखेंगे कि सरकारी योजनाएं लाभार्थियों तक कैसे पहुंच रही हैं और उन इलाकों की पहचान करेंगे जहां पार्टी का स्थानीय संगठन कमजोर पड़ रहा है. जब नेता इलाकों का दौरा करते हैं, वहां रात रुकते हैं और घूमते हैं, तो स्थानीय कार्यकर्ता लोगों की प्रतिक्रियाओं को उस तरह से नियंत्रित नहीं कर पाते.”
पार्टी उन इलाकों को लेकर खास तौर पर सतर्क है जहां विपक्ष की मौजूदगी बनी हुई है.
अप्रैल में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में इनमें से कुछ कमियां सामने आई थीं, जब बीजेपी को नर्मदा, भरूच और छोटा उदेपुर जिलों में नुकसान उठाना पड़ा था.
इन घटनाओं ने BJP की चिंता बढ़ा दी
आदिवासी इलाके में हुई दो घटनाओं ने भी बीजेपी की चिंता बढ़ा दी है.
अगस्त महीने में नर्मदा ज़िले के सागबारा तालुका के 12 गांवों के आदिवासी किसानों ने पड़ोसी सूरत ज़िले के उमरपाड़ा तालुका में वन भूमि पर खेती करने के अधिकारों को लेकर विरोध प्रदर्शन किया.
वन विभाग का कहना है कि खेती ‘वन अधिकार अधिनियम’ और ग्राम सभा के प्रस्तावों के दायरे में आती है. नर्मदा और सूरत ज़िलों के बीच प्रशासनिक सीमा ने इस विवाद को और जटिल बना दिया है.
हालांकि विरोध प्रदर्शन खत्म हो गया है लेकिन यह मुद्दा कांग्रेस के लिए एक मौका बना हुआ है.
राज्य कांग्रेस अध्यक्ष अमित चावड़ा, विधायक अनंत पटेल और पूर्व मुख्यमंत्री शंकरसिंह वाघेला ने 2 अक्टूबर को खोपी का दौरा किया और किसानों का समर्थन किया.
दिसंबर 2025 में एक और चिंताजनक बात सामने आई, जब दक्षिण गुजरात के तापी ज़िले से जुड़ी ‘AC भारत सरकार संगठन’ नाम की एक संस्था बनासकांठा में सक्रिय हुई. इस समूह पर पदलिया गांव में सरकारी अधिकारियों के साथ मारपीट करने का आरोप लगा.
सभी तरह के अधिकार या सत्ता को न मानने का दावा करने वाले इस समूह ने 200 से ज़्यादा लोगों को अपने चुनाव और राशन कार्ड सरेंडर करने के लिए भी प्रभावित किया था, हालांकि बाद में अधिकारियों ने उन्हें अपने दस्तावेज़ वापस लेने के लिए मना लिया.
कांग्रेस के कमज़ोर होने से AAP के लिए जगह बनी है, खासकर नर्मदा जिले में आम आदमी पार्टी मजूबत हो गई है. अप्रैल में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में AAP ने नर्मदा ज़िला पंचायत की 22 में से 15 सीटें जीतीं और डेडियापाड़ा, सागबारा, गरुड़ेश्वर और हाल ही में बनी चिखड़ा तालुका पंचायतों में जीत हासिल की.
’स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी’ वाले इलाके गरुड़ेश्वर में मिली हार BJP के लिए सबसे बड़े झटकों में से एक थी.
इन नतीजों को चैतर वसावा के प्रति सहानुभूति के तौर पर देखा गया, जबकि उस समय वह जेल में थे. बाद में जून में वन अधिकारियों के साथ मारपीट के 2023 के एक मामले में उन्हें दोषी ठहराया गया.
उनके जेल में होने के बावजूद AAP का अभियान नहीं रुका है. उनकी पत्नियां, वर्षा और शकुंतला, उनकी तरफ़ से प्रचार करती रही हैं.
इस बात को कि चैतर वसावा को अभी तक विधायक के तौर पर अयोग्य नहीं ठहराया गया है, BJP के भीतर सावधानी बरतने के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है.
पार्टी के एक सीनियर नेता ने कहा कि पार्टी अभी डेडियापाडा में उपचुनाव को लेकर सतर्क है.
इस इलाके के लिए मोदी की कोशिशें
साल 2018 में ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के उद्घाटन के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नर्मदा जिले को पर्यटन और विकास के केंद्र के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की है. केवड़िया का नाम बदलकर ‘एकता नगर’ कर दिया गया और केंद्र सरकार ने इस इलाके का इस्तेमाल बड़े राष्ट्रीय कार्यक्रमों के आयोजन के लिए किया है.
सितंबर में दिल्ली के बाहर पहली बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह यहीं आयोजित किया गया था.
सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती के मौके पर 31 अक्टूबर को होने वाली ‘राष्ट्रीय एकता परेड’ में भी मोदी के शामिल होने की उम्मीद है.
सरकार के लिए ऐसे प्रोजेक्ट इलाके में आए बदलाव और आदिवासी समुदायों के लिए पैदा हुए रोज़गार के मौकों को दिखाते हैं.
लेकिन स्थानीय आबादी के कुछ वर्गों ने ज़मीन, विस्थापन और ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ के आसपास की आर्थिक गतिविधियों से आस-पास के समुदायों को कितना फ़ायदा हुआ है, इस पर सवाल उठाए हैं.
यह तनाव आदिवासी इलाके में बीजेपी की बड़ी चुनौती को दिखाता है: पार्टी सड़कें, पर्यटन, सार्वजनिक बुनियादी ढांचा और कल्याणकारी योजनाओं की बात करती है. जबकि आलोचक ज़मीन के अधिकारों और विकास प्रक्रिया में स्थानीय समुदायों की हिस्सेदारी पर सवाल उठाते हैं.
सरकार ने आदिवासियों पर केंद्रित कार्यक्रमों का भी विस्तार किया है, जिसमें ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान’ शामिल है, जिसका मकसद कल्याणकारी योजनाओं को बेहतर ढंग से पहुँचाना और ‘वन अधिकार अधिनियम’ को लागू करना है.
बीजेपी का पक्ष
गुजरात की 6.5 करोड़ की आबादी में आदिवासियों की संख्या लगभग 80 लाख है और वे राज्य के कुल वोटरों का करीब 14 फीसदी हैं. वे राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की सीमाओं से लगे 14 ज़िलों में बसे हुए हैं.
बीजेपी ने आदिवासी समुदायों के बीच समर्थन जुटाने के लिए लगातार कोशिशें की हैं. इसमें राष्ट्रपति के तौर पर द्रौपदी मुर्मू का चुनाव और मानगढ़ पहाड़ी पर आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों को याद करना शामिल है.
वहीं मनसुख वसावा ने इस आरोप को खारिज कर दिया कि बीजेपी ने आदिवासी इलाकों में बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) को नज़रअंदाज़ किया है.
उन्होंने कहा, “जिन जगहों पर बांधों का पानी पास के गांवों तक नहीं पहुँच पाता, उसकी वजह वहां की भौगोलिक बनावट है. लेकिन बीजेपी सरकार पानी की वैकल्पिक सप्लाई योजनाएं लेकर आई है.”
उन्होंने आगे कहा कि ‘नल से जल’ प्रोग्राम के तहत छोटा उदयपुर से लेकर दाहोद तक के ज़्यादातर आदिवासी इलाके अब कवर हो चुके हैं.
PESA (पेसा) कानून पर वसावा ने कहा कि इसमें कुछ सुधार की ज़रूरत है लेकिन साथ ही यह भी कहा कि “आदिवासी आबादी मूल रूप से बीजेपी पर भरोसा करती है.”

