बोंडमगुडा में कोदू आदिम जनजाति की दुनिया में मलेरिया और कुपोषण है

भारत सरकार ने आंध्र प्रदेश के आदिवासी समूहों में से 12 को PVTG की श्रेणी में रखा है. यानि ये आदिवासी समूह आज भी खेती में पुरातन तकनीक का इस्तेमाल करते हैं. इन आदिवासियों की आर्थिक कवायद खुद को ज़िंदा रखने तक ही सीमित हैं.

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कोदू या कोंध आदिवासी अपनी बस्तियों के आप-पास के जंगलों या पहाड़ों में एक लँगोटी भर में नज़र आ जाते हैं. सैंकड़ों सालों से ये आदिवासी पहाड़ों और जंगलों में रहते आए हैं.

भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में एक कही जाती है. हमारा देश पिछले 70-75 साल में काफ़ी तेज़ी से बदला है उदारीकरण की नीतियों के बाद तो इस बदलाव में और तेज़ी आई है.

कोदू आदिवासियों की ज़िंदगी भी बदलाव से अछूती तो नहीं है पर फिर भी इनकी ज़िंदगी बहुत ज़्यादा नहीं बदली है. इन आदिवासियों को आदिम जनजाति या पीवीटीजी कहा जाता है.

इनकी ज़िंदगी में एक बड़ा बदलाव कोई कहा जा सकता है तो वो है कि अब इन आदिवासियों को एक जगह पर बसा दिया गया है. एक वक़्त में ये आदिवासी जंगल में अस्थाई बस्तियाँ बना कर रहते थे.

खाने की ज़रूरत और मौसम के हिसाब से ये जंगल में घूमते आए हैं. लेकिन जंगल के किनारे पर लाकर बसा दिए गए इन आदिवासियों की अब जंगल तक पहुँच कम हो गई है. लेकिन फिर भी ये आदिवासी जीने के लिए जंगल की तरफ़ ही देखते हैं.

अभी भी ये आदिवासी अपना खाने का बड़ा हिस्सा जंगल से ही जुटाते है. इन आदिवासी घरों में झांकने पर संपत्ति के नाम पर कुछ बर्तन ही मिलते हैं. बर्तनों में भी खाना पकाने और पानी रखने के ही बर्तन होते हैं.

खाना खाने के लिए अभी भी पत्तल और दोने ज़्यादा इस्तेमाल होते हैं.  इस बदलाव ने इनकी पहचान में एक और शब्द जोड़ दिया है, वो है ग़रीबी. 

कोदु आदिवासियों को बसाने के सिलसिले में जो बस्तियाँ बसाई गई हैं उन्हीं में से एक है बोंडमगुडा.  कोदू आदिवासियों इस बस्ती में कुल आबादी है 184. बस्ती में रास्ते के दोनों तरफ कतार में घर बने हैं.

ज़्यादातर घर कच्चे हैं. इसके अलावा य महिलाएं परंपरागत तरीक़े से साड़ी पहनती हैं जिसमें बाएं कंधे पर गांठ बांधी जाती है. इन महिलाओं के शरीर पर यही एक कपड़ा होता है.  लेकिन अब कुछ महिलाएं मैक्सी या ब्लाउज़ भी पहनती हैं.

ख़ासतौर से जब इन औरतों को अपनी बस्ती से बाहर जाना होता है तब. कोदू आदिवासी बस्तियों में मलेरिया एक महामारी की तरह है. इस बस्ती में जब हम पहुँचे तो पता चला कि कम से कम 20 लोगों को मलेरिया हो चुका है.

सरकार ने इतना ज़रूर किया है कि इस गाँव में एक आशा नर्स है और उसको मलेरिया टेस्ट किट और कुछ ज़रूरी दवाई उपलब्ध कराई गई है. लेकिन कई बार टेस्ट किट और दवाइयों का भी तोड़ा हो जाता है. 

विशाखापट्टनम ज़िले में कोदू आदिवासियों की कुल आबादी 86 हज़ार के क़रीब है. इन आदिवासियों को कई अलग अलग नाम से पुकारा जाता है. मसलन आरकु घाटी मंडल में इन्हे कोदू कहा जाता है तो कई दूसरे मंडलों या इलाक़ों में इन्हे कोंद, कोदी, देसया कोंद, डोंगरी कोंद, कुटिया कोंद, टिकिरिया कोंद, येमिति कोंद भी कहा जाता है.

भारत सरकार ने आंध्र प्रदेश के आदिवासी समूहों में से 12 को PVTG की श्रेणी में रखा है. यानि ये आदिवासी समूह आज भी खेती में पुरातन तकनीक का इस्तेमाल करते हैं. इन आदिवासियों की आर्थिक कवायद खुद को ज़िंदा रखने तक ही सीमित हैं.

इन आदिम जनजातियों में भी कोदू आर्थिक मामले में सबसे ज्यादा पिछड़े हुए हैं. सामाजिक हैसियत के मामले में भी कोदू आदिवासी काफ़ी निचले पायदान पर माने जाते हैं. 

कोदु आदिवासियों की इस बस्ती में पानी के लिये एक टंकी बनाई गई है. जिससे लोगों को पानी के लिये अब झरने तक नहीं जाना पड़ता है. पानी के इस इंतज़ाम से लोगों का काफी समय बच जाता है.

ख़ासतौर पर महिलाओं का जिन्हे पानी लाने के लिये काफ़ी दूर जाना पड़ता था. सरकार ने झरने के पानी को पाईप से बस्ती में पहुंचा दिया है. यह इंतज़ाम इन आदिवासियों का समय तो ज़रूर बचाता है. लेकिन अभी भी जो पानी वो पीते हैं वो स्वासथ्य के लिये अच्छा नहीं है.

यानि पीने का साफ़ पानी इन्हें आज तक नसीब नहीं है. इसकी वजह से यंहा पर पेट की बीमारियां फैलती रहती हैं ख़ासतौर से बच्चे काफ़ी बीमार होते हैं.

बोंडमगुडा में एक प्राईमरी स्कूल है. स्कूल में कुल 23 बच्चे हैं जो बोंडमगुडा और आसपास के गांव से आते हैं. स्कूल में दो अध्यापक पढ़ाते हैं. इस स्कूल का अस्तित्व एक समय ख़तरे में पड़ गया था जब सरकार ने कहा था कि अगर किसी स्कूल में 20 बच्चों से कम होते हैं तो स्कूल को बंद कर दिया जायेग.

लेकिन काफ़ी संघर्ष के बाद सरकार ने ये फ़ैसला टाल दिया. वैसे इस स्कूल में बच्चों का ज़्यादातर समय खेलने में ही चला जाता है. अध्यापक थोड़ी बहुत देर के लिये ही स्कूल आते हैं और मध्यान्ह भोजन यानि मिड डे मील की कोई गारंटी नहीं 

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