काले चावल की खेती असम के आदिवासी किसानों के लिए लेकर आई है एक नई उम्मीद

नई किस्में मणिपुर से पेश की गई हैं. अन्य दो काले चावल की किस्में कलामलीफुला और कलावती, ओडिशा से पेश की गई हैं. IRRI, विश्व बैंक द्वारा वित्त पोषित असम कृषि व्यवसाय और ग्रामीण परिवर्तन परियोजना के तहत असम सरकार के सहयोग से भारत के विभिन्न राज्यों से काले चावल की नई किस्मों को पेश करके इसका उत्पादन शुरू कर दिया है.

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मणिपुर और ओडिशा से असम लाए गए काले चावल की किस्मों ने असम के गोवालपारा जिले के आदिवासी किसानों में नई उम्मीद जगाई है.

गोवालपारा के बुजुर्ग किसान उपेंद्र राभा, जिन्हें निचले असम में काले चावल की किस्म को लोकप्रिय बनाने के लिए जाना जाता है को अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (IRRI) द्वारा काले चावल की प्रीमियम किस्मों को बढ़ावा देने के लिए शामिल किया गया है. जो असम के किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने की क्षमता रखते हैं.

हर साल हाथियों द्वारा तबाह काले चावल की किस्मों को राज्य के कृषि विभाग द्वारा कार्यान्वित विश्व बैंक समर्थित असम कृषि व्यवसाय और ग्रामीण परिवर्तन परियोजना (APART) के तहत लगाया गया है. इसका उद्देश्य कम उपज वाले किसानों को अधिक लाभ देकर राहत देना है.

उपेंद्र चावल I नाम से ब्रांडेड इस किस्म की आपूर्ति पहले ही ओडिशा, पंजाब, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल के बाजारों में की जा चुकी है.

उपेंद्र राभा को कई साल पहले कृषि विज्ञान केंद्र, गोवालपारा के माध्यम से राजस्थान के एक कृषि मेले से एक किलो काले चावल के बीज का नमूना मिला था. लेकिन सिर्फ एक ही बीज अंकुरित हुआ लेकिन इसके बावजूद उन्होंने उम्मीद नहीं खोई.

राभा ने कहा, “सिर्फ एक बीज किस्म से बाद में ये उपेंद्र चावल I के नाम से लोकप्रिय हो गई और यह असम के कई जिलों में फैल गई.”

इस साल उन्होंने दावा किया कि उपेंद्र चावल II और III, उपेंद्र चावल I से विकसित स्थानीय किसानों को वितरित किए गए हैं.

नई किस्में मणिपुर से पेश की गई हैं. अन्य दो काले चावल की किस्में कलामलीफुला और कलावती, ओडिशा से पेश की गई हैं. IRRI, विश्व बैंक द्वारा वित्त पोषित असम कृषि व्यवसाय और ग्रामीण परिवर्तन परियोजना के तहत असम सरकार के सहयोग से भारत के विभिन्न राज्यों से काले चावल की नई किस्मों को पेश करके इसका उत्पादन शुरू कर दिया है.

आईआरआरआई के संचार विशेषज्ञ ज्योति विकास नाथ ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, “इसका उद्देश्य किसानों को अच्छी लागत के लिए खरीदारों से जोड़ना और भविष्य में इस्तेमाल के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले बीज उपलब्ध कराना है.”

गोवालपारा में ये प्रयोग वर्तमान में बिखरी हुई खेती की स्थिति से काले चावल की खेती को व्यवस्थित करने में एक लंबा रास्ता तय कर सकता है. बाजार में उपलब्ध कई किस्मों में से देश के विभिन्न हिस्सों में काले चावल की मांग है. नाथ ने कहा, “मिट्टी और मौसम की स्थिति इस प्रकार के चावल की खेती के अनुकूल होती है और इसे व्यावसायिक रूप से उगाया जा सकता है.”

अपने उच्च पोषण मूल्य और स्वास्थ्य लाभों के कारण काले चावल की वर्तमान मांग बढ़ने के साथ IRRI का लक्ष्य इसे और अधिक क्षेत्रों में पेश करना है.

IRRI के रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर और सीनियर एसोसिएट साइंटिस्ट- II कंवर सिंह ने कहा, “आईआरआरआई ने तुलनात्मक विश्लेषण, मूल्यांकन और चयन के लिए देशी चावल की किस्मों के साथ प्रीमियम गुणवत्ता वाले चावल (PQR) किस्मों का फसल कैफेटेरिया भी पेश किया है. क्रॉप कैफेटेरिया किसानों को अपने खेतों में आगे अपनाने के लिए अपनी पसंद की सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाली किस्मों का चयन करने का अवसर प्रदान करना है.”

बीज कुल 17.6 बीघा भूमि पर बोया गया था जिसमें 10 बीघा पर मणिपुरी काला चावल, 3.6 बीघा पर कलावती और 4.0 बीघा पर कलामलीफुला शामिल थे. अगले एक सप्ताह में फसल कटने की उम्मीद है. उपेंद्र राभा ने कहा कि कलामालिफुला बीजों से कई अलग-अलग किस्में यहां विकसित हुई हैं.

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