आदिवासी थे माओवादी नहीं, हत्या या सिर्फ़ ग़लती

न्यायिक रिपोर्ट के मुताबिक 25-30 लोग 'बीज पांडम' जो कि एक आदिवासी त्यौहार है की पूजा करने के लिए इकट्ठे हुए थे और वहां 1000 सुरक्षा कर्मी आ पंहुचे. उस वक्त सुरक्षाबलों की तरफ से कहा गया था कि वे आग की चपेट में आ गए थे और इसके बाद जवाबी कार्रवाई की. लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि उनको कोई खतरा नहीं था.

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छत्तीसगढ़ के बीजापुर में आठ साल पहले कुछ ऐसे हुआ था जिसकी जांच रिपोर्ट आज कई सवाल खड़े कर रही है. 

दरअसल छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के एडेसमेट्टा में सुरक्षाकर्मियों द्वारा चार नाबालिगों सहित आठ लोगों की हत्या के आठ साल बाद बुधवार को राज्य मंत्रिमंडल को सौंपी गई एक न्यायिक जांच रिपोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मारे गए लोगों में से कोई भी माओवादी नहीं था जैसा कि घटना के समय आरोप लगाया गया था. बल्कि वे सभी निहत्थे आदिवासी थे.

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस वीके अग्रवाल ने यह रिपोर्ट दी है. वीके अग्रवाल की रिपोर्ट में कहा गया की सुरक्षा कर्मियों ने “घबराहट में गोलियां चलाई होंगी.”

रिपोर्ट में इस घटना को तीन बार ‘गलती’ बताया गया है. जस्टिस अग्रवाल ने रिपोर्ट में बताया कि आदिवासियों पर 44 गोलियां चलाई गई थीं जिनमें से 18 गोलियां सीआरपीएफ की कोबरा यूनिट के सिर्फ एक कॉन्स्टेबल ने चलाई थीं.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मई 2019 से सीबीआई भी अलग जांच कर रही है.

घटना की पृष्ठभूमि

एडसमेटा की घटना साल 2013 में 17 और 18 मई की बीच रात को हुई थी. एडसमेटा जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर की दूरी पर है. निकटतम सड़क से भी इसकी दूरी करीब 17 किलोमीटर है. 

जहां एक ओर पुलिस ने एडेसमेटा में माओवादियों की मौजूदगी से इनकार किया था वहीं कोबरा ने एक माओवादी ठिकाने का भंडाफोड़ करने का दावा किया था.

न्यायिक रिपोर्ट के मुताबिक 25-30 लोग ‘बीज पांडम’ जो कि एक आदिवासी त्यौहार है की पूजा करने के लिए इकट्ठे हुए थे और वहां 1000 सुरक्षा कर्मी आ पंहुचे. उस वक्त सुरक्षाबलों की तरफ से कहा गया था कि वे आग की चपेट में आ गए थे और इसके बाद जवाबी कार्रवाई की. लेकिन रिपोर्ट में कहा गया है कि उनको कोई खतरा नहीं था. 

रिपोर्ट में कहा गया, “अगर सुरक्षा बलों को आत्मरक्षा के लिए पर्याप्त गैजेट दिए जाते. अगर उनके पास जमीन से बेहतर खुफिया जानकारी होती और वह सावधान रहते तो घटना को टाला जा सकता था.”

जहां एक और सुरक्षाबलों ने उनके ऊपर हमला होने पर जवाबी कार्यवाही करने का दावा किया वहीं दूसरी ओर जांच में कहा गया के सुरक्षाकर्मियों को किसी भी तरह से जान का खतरा नहीं थाबल्कि सुरक्षाकर्मियों ने मार्चिंग ऑपेरशन के मापदंडों का पालन नहीं किया.

यह मानते हुए कि कोई क्रॉस-फायर नहीं था. रिपोर्ट में कहा गया है कि कोबरा कांस्टेबल देव प्रकाश की मौत आपसी गोलीबारी के कारण हुई न कि माओवादियों के चलते.

रिपोर्ट में कहा गया है कि मौके पर दो “भरमार” राइफलें जब्त की गईं. आदिवासी प्रकाश के सिर में गोली लगने के लिए जिम्मेदार नहीं थे.

घटना के बाद ग्रामीणों का कहना था कि जब गोलीबारी होने लगी तो वे लोग चिल्लाने लगे थे. वे कह रहे थे कि गोलीबारी रोक दो, हमारे एक आदमी को गोली लगी है. 

आयोग ने पाई सुरक्षाबलों की कई खामियां

आयोग ने सुरक्षा बल के काम में कई खामियां पाईं. दो “भरमार” बंदूकों की जब्ती को ‘संदिग्ध’ और ‘अविश्वसनीय’ बताते हुएरिपोर्ट ने Seizure रिपोर्ट में वस्तुओं का कोई विवरण नहीं होने के लिए अधिकारियों की खिंचाई की. साथ ही पूछा कि क्षेत्र से कोई भी सामान फोरेंसिक लैब क्यो नहीं भेजा गया?

रिपोर्ट में कहा गया “ऑपरेशन के पीछे कोई मजबूत खुफिया जानकारी नहीं थी. इकट्ठे हुए लोगों में से किसी के पास हथियार नहीं थे और न ही वे माओवादी संगठन के सदस्य थे. ”

कमीशन ने भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने के लिए ड्रोन और मानव रहित गैजेट्स के उपयोग करने की सलाह दी.

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