विलुप्त होने के कगार पर तीन आदिवासी भाषाएं, संरक्षण की हो रही पहल

प्रोजेक्ट का मकसद झारखंड में रहने वाले तीन छोटे आदिवासी समुदायों - सबर, कोरवा और परहैया - के बच्चों को इन किताबों की तरफ आकर्षित करना है, ताकि न सिर्फ उनकी किताबें पढ़ने में रुचि बढ़े, बल्कि अपनी मातृभाषा से उनका संपर्क भी बना रहे.

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नैशनल बुक ट्रस्ट (NBT) रांची के डॉ राम दयाल मुंडा ट्राइबल वेलफेयर रिसर्च इंस्टीट्यूट, जिसे ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट (TRI) के नाम से जाना जाता है, के साथ साझेदारी में तीन आदिवासी भाषाओं के संरक्षण के लिए कदम उठा रहा है.

इसके लिए इन आदिवासी भाषाओं में बच्चों की चित्रात्मक किताबें (Pictorial Books) प्रकाशित की जाएंगी.

दोनों संस्थानों ने मिलकर रांची में टीआरआई परिसर में तीन दिन की एक वर्कशॉप का आयोजन किया. इस वर्कशॉप में अनुवादकों को ब्रीफ किया गया, और किताबों पर काम शुरू किया गया.

इस पूरे प्रोजेक्ट का मकसद झारखंड में रहने वाले तीन छोटे आदिवासी समुदायों – सबर, कोरवा और परहैया – के बच्चों को इन किताबों की तरफ आकर्षित करना है, ताकि न सिर्फ उनकी किताबें पढ़ने में रुचि बढ़े, बल्कि अपनी मातृभाषा से उनका संपर्क भी बना रहे.

यह तीनों समुदाय पीवीटीजी की श्रेणी में आते हैं, और इनकी भाषाओं पर विलुप्त होने का खतरा है.

अब इस पहल के तहत तीनों भाषाओं में पांच-पांच किताबें छापी जाएंगी. TRI के निदेशक रणेंद्र कुमार ने द टेलीग्राफ को बताया कि इन भाषाओं को संरक्षित करने की जरूरत है क्योंकि किसी भाषा की मौत का अर्थ है सीधा एक संस्कृति की मौत.

यूनेस्को के आंकड़ों के मुताबिक भारत समेत दुनिया भर की लगभग 2,500 भाषाएँ हमेशा के लिए खो जाने की कगार पर हैं, और उनके संरक्षण के लिए तत्काल ध्यान देने की जरूरत है.

सबर समुदाय, हालांकि ज्यादातर बंगाल और ओडिशा में रहते हैं, झारखंड के पूर्वी सिंहभूम और सरायकेला जिले में भी उनका एक छोटा समूह है. उनकी भाषा, लोधी, काफी उपेक्षित है.

इसी तरह, झारखंड-छत्तीसगढ़ सीमा पर सिर्फ 35,000 कोरवा लोग रहते हैं, जबकि परहैया ज्यादातर लातेहार जिले में रहते हैं. चूंकि वे ज्यादातर अपने समुदाय के बाहर दूसरी स्थानीय भाषाओं में बातचीत करते हैं, इसलिए उनकी अपनी भाषाओं को संरक्षण की जरूरत पड़ रही है.

सबर आदिवासियों की एक और बड़ी समस्या है कि उन्हें ब्रिटिश सरकार ने 1871 के आपराधिक जनजाति अधिनियम के तहत अधिसूचित कर दिया था. हालांकि देश के आज़ाद होने के बाद 1952 में यह अधिनियम खत्म हो गया, लेकिन अभी भी उन्हें इसी नजर से देखा जाता है, और वो मुख्यधारा से अलग जी रहे हैं.

सबर समुदाय के बच्चों को अब स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, लेकिन उनके लिए स्कूलों में दूसरी भाषा में पढ़ना पड़ता है, जिससे उनकी अपनी भाषा पीछे छूट जाती है.

वर्कशॉप के आयोजकों का मानना ​​है कि पुस्तकें बच्चों को उनकी भाषाओं की ओर खींचेंगी.

डॉ एसपी मुखर्जी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति सत्य नारायण मुंडा ने वर्कशॉप का उद्घाटन करते हुए कहा, “किसी समुदाय की भाषा उसकी संस्कृति को दर्शाती है, इसलिए लोकप्रिय किताबों का अनुवाद करते समय ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए, और लक्षित भाषाओं के मूल शब्दों पर खास ध्यान दिया जाना चाहिए.”

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