केरल: अपना दशकों पुराना घर छोड़ने को मजबूर आदिवासियों को है पुनर्वास का इंतज़ार

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केरल के एर्णाकुलम ज़िले की अरकप्पू बस्ती के आदिवासी परिवारों को वन विभाग ने छह जुलाई को वैशाली गुफ़ा इलाक़े से बेदखल कर दिया था. अब तीन हफ़्ते बाद पुनर्वास की मांग को लेकर इन परिवारों ने गुरुवार को कलेक्ट्रेट के सामने धरना दिया.

11 महिलाओं और 12 बच्चों सहित 11 आदिवासी परिवारों के समूह को सात जुलाई को इडमलयार में आदिवासी हॉस्टल में अस्थायी आवास दिया गया था. लेकिन इतना समय बीत जाने के बाद भी उनके पुनर्वास पर कोई निर्णय न होने की वजह से इन्होंने विरोध प्रदर्शन किया.

आदिवासियों ने कलेक्टर को एक ज्ञापन भी सौंपा. केलक्टर ने उन्हें अरकप्पू लौटने के लिए कहा है, और बस्ती में बुनियादी सुविधाएं जल्द देने का वादा भी किया है. हालांकि, यह परिवार वापस बस्ती में नहीं लौटना चाहते हैं, क्योंकि 2018 में आई बाढ़ के बाद से इलाक़े में बार-बार भूस्खलन हुआ है.

इन 11 आदिवासी परिवारों के 38 लोगों को घने जंगल के बीचोंबीच अपने घरों से इसी महीने 6 जुलाई को हटाया गया था. अरक्कप्पू बस्ती इडमलयार नदी के तट पर स्थित है, और तमिलनाडु की सीमा से लगे त्रिशूर ज़िले के एक गांव मलक्कपारा से सिर्फ़ 3 किमी दूर है.

कलेक्टरेट के बाहर प्रदर्शन करते आदिवासी

पक्की सड़क के इस बस्ती तक पहुंचने के अभाव में अरक्कप्पू का बाहरी दुनिया से जुड़ाव कम ही था. अपनी रोज़ की ज़रूरत का सामान लेने के लिए इन आदिवासियों को पैदल मलक्कपारा तक जाना पड़ता था. यह लोग समूह में यात्रा करते थे, क्योंकि हाथी, तेंदुए और भालू इस इलाक़े में घूमते हैं.

अगर कभी कोई बीमार पड़ जाए तो उसे अस्पताल ले जाना एक कठिन काम था, क्योंकि उसे लकड़ी के स्ट्रेचर पर मलक्कपारा तक ले जाना पड़ता था, और तब जाकर कोई वाहन इन लोगों को मिलता था.

2018 में केरल में आई बाढ़ के दौरान बड़े पैमाने पर बस्ती में भूस्खलन हुआ, जिसमें ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा बह गया और चार घर ढह गए. तब से यह परिवार निरंतर डर में जी रहे थे.

बारिश के मौसम में भूस्खलन का ख़तरा बढ़ा जाता है. इस साल भी मॉनसून शुरु होने के बाद भूस्खलन हुआ था, जिसमें एक घर को थोड़ा बहुत नुकसान हुआ था. एक और भूस्खलन से पूरी बस्ती बह सकती है और कोई परिवार नहीं बचता.

इन हालात में इन आदिवासियों के पास बस्ती छोड़ने के अलावा कोई और चारा नहीं था. हालांकि, बस्ती के 44 परिवारों में से सिर्फ़ 11 ने ही शिफ्ट होने का फैसला किया.

उस बस्ती के 44 परिवारों में से 30 मन्नान आदिवासी समुदाय के हैं, और बाकि उल्लाडन और मुदुवान जनजाति के हैं. बस्ती के मुखिया ने एक अखाबर से बातचीत में कहा कि जिन लोगों ने वहीं रहने का फ़ैसला किया, उनके पास शहर में ज़मीन और संपत्ति है, और उनके बच्चे सरकारी कर्मचारी हैं.

जिन परिवारों ने बस्ती छोड़ी उन्होंने 11 बांस के राफ्ट बनाए, अपना सामान, परिवार के सदस्य और पालतू जानवर उसपर लादे, और पांच जुलाई को बस्ती छोड़ दी. वो सीधे वैशाली गुफा गए, और वहां तंबू लगाकर रहने लगे.

इल लोगों ने इसी साल अप्रैल में त्रिशूर कलेक्टर और केरल के मुख्यमंत्री पिणराई विजयन को एक ज्ञापन सौंपकर वैशाली में जमीन आवंटित करने की मांग की थी. हालांकि, चुनावी गहमागहमी के बीच इस पर कोई कार्रावाई नहीं हुई.

दो रात इलाक़े में बिताने के बाद, इन परिवारों को हॉस्टल में शिफ़्ट कर दिया गया. वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक़ इन आदिवासियों को नई ज़मीन देने के लिए केंद्र सरकार से अनुमति की ज़रूरत है. इसके अलावा आदिवासियों को पहले से अपने नाम पर जो ज़मीन है, उसे सरेंडर करना होगा.

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