आदिवासियों में डॉक्टर, काणी समुदाय का लिखा जा रहा है इतिहास

काणीकारन या काणी के रूप में जानी जाने वाली यह जनजातियाँ पारंपरिक रूप से घुमंतू समुदाय हैं, जो तमिल नाडु के कन्याकुमारी और तिरुनेलवेली ज़िलों में पश्चिमी घाट में रहती हैं. यह समुदाय तमिल और मलयालम दोनो बोलते हैं.

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काणी आदिवासियों के इतिहास, रहन-सहन, आजीविका, औषधीय पौधों के बारे में उनका पारंपरिक ज्ञान, उनके त्यौहारों, संस्कृति, भोजन की आदतों और अनुष्ठानों के दस्तावेज़ीकरण के लिए विशेष पहल की जा रही है.

तिरुनेलवेली के कलेक्टर वी. विष्णु ने ज़िले के पश्चिमी घाट में पापनासम और सर्वलार बांधों के पास रहने वाले काणी आदिवासियों की पहचान की रक्षा, और उनके ज्ञान को दुनिया तक ले जाने का ज़िम्मा उठाया है.

काणीकारन या काणी के रूप में जानी जाने वाली यह जनजातियाँ पारंपरिक रूप से घुमंतू समुदाय हैं, जो तमिल नाडु के कन्याकुमारी और तिरुनेलवेली ज़िलों में पश्चिमी घाट में रहती हैं. यह समुदाय तमिल और मलयालम दोनो बोलते हैं.

काणी इस पहाड़ी क्षेत्र के चिन्ना मयिलार, पेरिया मयिलार और इंजिकुझी क्षेत्रों में रहते हैं. जंगलों के अंदर रहने वाले यह आदिवासी काफ़ी हद तक आत्मनिर्भर हैं.

जंगल में नींबू, काजू, कटहल, टैपिओका, काली मिर्च उगाते हैं, और आंवला और शहद जैसे वनोपज इकट्ठा करते हैं. काणी आदिवासी इन उत्पादों को व्यापारियों और पर्यटकों को बेचते हैं.

इसके अलावा काणी आदिवासियों को जंगली जड़ी-बूटियों का ज्ञान है. जंगल में मधुमेह, रक्तचाप, त्वचा रोग, दस्त, पेट दर्द, दांत दर्द, गठिया आदि के लिए दवाएं हैं, जिन्हें वो जानते हैं.

उनकी शादियों, धार्मिक अनुष्ठानों और नृत्यों का भी एक अलग ही स्वाद है.

काणी आदिवासियों को गाड़ी सौंपते कलेक्टर वी विष्णु

ज़िला कलेक्टर वी विष्णु ने दो दिन पहले पापनासम बांध के पास की काणी आदिवासी बस्तियों का दौरा कर उन्हें एक कार्गो वाहन सौंपा. इससे यह आदिवासी अपने कृषि उत्पाद बेचने के लिए पहाड़ों के नीचे मैदानी इलाकों में आसानी ले जा सकेंगे.

इसके अलावा समुदाय के लिए अलग से कोचिंग क्लास चलाई जाएंगी. हाल ही में समुदाय की दो औरतों ने वन विभाग द्वारा आयोजित परीक्षा पास की थी, जिसके बाद इन परीक्षाओं के बारे में जागरुकता बढ़ी है. उम्मीद है कोचिंग से इन्हें मदद मिलेगी.

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