तमिलनाडु: दो आदिवासी गांव जहां अब जाकर बनी है पक्की सड़क, बिजली भी पहुंची थी आज़ादी के 60 साल बाद

इन दोनों आदिवासी गांवों में बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंचने में भी 60 साल लगे. उम्मीद है कि इन दोनों गांवों के क़रीब 1200 लोगों की ज़िंदगी थोड़ी और बेहतर होने में अब इतना समय नहीं लगेगा.

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जारुगुमलई आरक्षित वन क्षेत्र में स्थित जारुगुमलई आदिवासी गांव में 6 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनाव में पहली बार इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) और अन्य पोल सामग्री पहुंचेगी. और यह संभव हुआ है कुछ महीने पहले बनी पक्की सड़क से.

वीरपांडी विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के कुरलनाथन पंचायत में आने वाला यह इलाक़ा सेलम वन प्रभाग में आता है. जारुगुमलई आरक्षित वन के अंदर दो गाँव हैं – मेलूर और कीलूर – जिनमें कुल 716 मतदाता हैं.

जारुगुमलई पहुंचने के लिए साढ़े तीन किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है. ज़्यादातर समय इलाक़ा इसलिए ख़बरों में आता है क्योंकि यहां से गर्भवती महिलाओं और रोगियों को अस्पतालों तक पालने या खाट में ले जाया जाता है.

इसके अलावा राशन और एलपीजी सिलिंडर जैसी चीज़े निवासियों द्वारा सर पर रखकर ले जाई जाती हैं. अब तक के सभी चुनावों में पोल सामग्री निवासी उठाकर ले जाते थे. ज़ाहिर है गांव तक सड़क की मांग कई साल पुरानी है.

आदिवासी गांवों तक जाने वाली नई सड़क

इससे पहले मनरेगा के तहत 8 किलोमीटर लंबी एक कच्ची सड़क बनाई गई थी. लेकिन इसपर वाहन नहीं चल सकते थे. 2018 में पक्की सड़क बनाने के लिए 4.80 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्ज़न का प्रस्ताव पेश किया गया.

नाबार्ड फंडिंग की मदद से 7.1 किमी लंबी सड़क को 9 करोड़ रुपए की लागत से बनाया गया है. यह काम इसी साल जनवरी में पूरा हुआ है.

जारुगुमलई एक हिल स्टेशन के रूप में मशहूर है. ज़ाहिर है पर्यटन यहां फल-फूल भी रहा है. लेकिन ऐसा नहीं लगता कि इस बात से इलाक़े के आदिवासियों को कुछ ख़ास फ़ायदा ह रहा है.

इन दोनों आदिवासी गांवों में बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं पहुंचने में भी 60 साल लगे. उम्मीद है कि इन दोनों गांवों के क़रीब 1200 लोगों की ज़िंदगी थोड़ी और बेहतर होने में अब इतना समय नहीं लगेगा.

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