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छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले के कई गाँवों में अज्ञात बीमारी से लोगों की मौत से भय फैला

सुकमा नक्सल प्रभावित इलाक़ा है. यहाँ के अंदरूनी गाँवों में अभी लोग झाड़ फूँक पर निर्भर करते हैं. क्योंकि इलाज की आधुनिक सुविधाओं का यहाँ पर घोर अभाव है. इसके अलावा किसी बीमार को अस्पताल तक पहुँचाना बेहद मुश्किल काम है.

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के गादीरास तहसील अंतर्गत ग्राम पंचायत मारुकी में दो सप्ताह में एक नवजात बच्चे सहित 8 लोगों की मौत हो चुकी है. इस इलाक़े में अब भय का माहौल बन गया है.एक के बाद एक मौत की घटना से ग्रामीणों में काफी दहशत है. 

यहाँ गाँव के लोगों ने बताया कि पंचायत के खासपारा में ही 6 लोगों की मौत हुई है. गादेमपारा और ड़ययापारा में 1- 1 आदमी की मौत हो हुई है. इसके अलावा गांव में कई लोग और भी बीमार हैं.  

ग्राम पंचायत मारुकी में 19 सितम्बर से 1 अक्टूबर तक दो सप्ताह के भीतर सिरदर्द, बुखार व पैरों में सूजने की वजह से 8 लोगों की मौत हो चुकी है. गाँव के लोगों ने बताया कि जिन लोगों की मौत हुई है वो 3-4 दिन तक ही बीमार थे. 

गाँव के ज़्यादातर लोग झाड़-फूंक के सहारे अपना इलाज करवा रहे थे. हालाँकि इनमें से  एक महिला की मौत जिला अस्पताल में इलाज के दौरान हुई है.  

मारूकी पंचायत में एक परिवार के साथ शोक मनाते लोग

जिन लोगों की मौत हुई है उनके बारे में पता चला है कि इनमें ग्राम पंचायत मारुकी के ध्रुवा मड़ावी 60 वर्ष 19 सितंबर को, जोगी मांडवी 35 वर्ष, 24 सितंबर को, नुप्पो आयतु 40 वर्ष व मड़कामी रामा के दो सप्ताह की नवजात बच्चे का 28 सितंबर को, मड़कामी हिड़मे 55 वर्ष 30 सितंबर, मड़कामी जोगा 35 वर्ष 1 अक्टूबर को मौत हुई है. 

वही पंचायत के आश्रित ग्राम ड़ययापारा व गादेमपारा में भी 1-1 ग्रामीण की मौत हुई है. ग्रामीणों ने बताया कि ड़ययापारा की महिला हिड़मे को इलाज के लिए जिला अस्पताल भर्ती करवाया गया जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई. 

वहीं रविवार को जिले के कोन्टा ब्लॉक के कांकेरलंका रंगाईगुड़ा में चार लोगों की मौत हुई. इस मामले की जानकारी लगते ही कलेक्टर ने मौके पर स्वास्थ्य विभाग की टीम भेजकर ग्रामीणों के साथ जांच की जा रही है.

इस इलाके के ग्रामीण आज भी झाड़-फूंक के सहारे अपना इलाज करा रहे हैं. यहाँ लोग लंबे समय तक इन बीमारियों का इलाज ना हो पाने की वजह से असमय मौत का शिकार हो जाते हैं. इस इलाके में आज भी स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बहुत ही दयनीय है. 

शासन की स्वास्थ्य सुविधाएं के नाम पर एक अस्पताल है जो हफ्ते में एक दिन स्वस्थ्य कर्मी पहुंचने से खुलता है. जिसकी वजह से ग्रामीण अस्पताल में इलाज करने से ज्यादा झाड़-फूंक करवाने पर भरोसा करते हैं. 

अस्पताल यहां से करीब 12 से 15 किमी दूर है, अंदरूनी नक्सल प्रभावित इलाका होने की वजह से आवागमन के संसाधन भी नहीं है. जिसकी वजह से अस्पताल तक नहीं पहुंचते हैं.

मारुकी सरपंच सविन मरकाम ने बताया कि उनके गांव में 2 सप्ताह के अंदर करीब 8 लोगों की मौत हो चुकी है. ग्राम पंचायत के खासपारा में ही 6 लोगों की कुछ दिनों के अंतराल में मौत हो चुकी है. 28 सितंबर को एक ही दिन 2 सप्ताह की नवजात बच्चे के साथ 2 लोगों की मौत हुई है. इस प्रकार से गांव में मौत का सिलसिला जारी है. 

उन्होंने कहा कि इस बीमारी की वजह से अब हमारे गांव के लोग भी डर चुके हैं, इसलिए हम लोग जिला प्रशासन से मांग कर रहे हैं कि गांव में स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया जाए. सभी बीमार लोगों का तत्काल इलाज की सुविधा उपलब्ध हो सकें.

सीएमएचओ यशवंत ध्रुव ने बताया कि मारुकी में स्वास्थ्य अमले की टीम भेजकर यहां की स्थिति के बारे में जानकारी ली जाएगी और बीमार लोगों के लिए मेडिकल कैंप लगाकर इलाज करवाया जाएगा. उन्होंने बताया कि रंगाईगुड़ा में मेडिकल टीम दूसरे दिन भी गई है. 

रेगड़गट्टा के बाद रंगाईगुडा में अज्ञात बीमारी से मौत के मामले में सुकमा के कलेक्टर हरीश एस ने कहा, “इस मामले की सूचना मिलते ही वहाँ पर मेडिकल टीम भेज दी गई थी. फ़िलहाल वहाँ पर 5 लोगों में बीमार होने के लक्षण पाए गए हैं. इन सभी को इलाज के लिए अस्पताल लाया गया है. “

उन्होंने कहा कि प्रशासन मुस्तैदी से मामले पर नज़र बनाए हुए है.

वहां पर चार लोगों की मौत का मामला सामने आया था जिसमें से दो ग्रामीण बुजुर्ग थे, और 2 लोग 35 से 40 वर्ष के बीच थे. उनके पैर में सूजन की शिकायत थी.

सुकमा जिले में अज्ञात बीमारी से मौत का मामला नया नहीं है. सुकमा जिले की कोंटा तहसील के घने जंगलों के बीच जिला मुख्यालय सुकमा से 90 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम रेगड़गट्टा में बीते करीब ढ़ाई साल के अंदर 61 ग्रामीणों की मौत हो गई है. 

स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट में मौत का कारण अब तक पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो पाया है. 

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