आदिवासियों को ग़रीबी और मज़दूरी के चक्र से निकालने के लिए ज़मीन का मालिक़ बनाना होगा

वायनाड में बाहरी लोगों का पलायन, सरकार द्वारा बांधों का निर्माण, और वनों की कटाई ने ज़िले के कई आदिवासी समुदायों, ख़ासकर पनिया, अडिया और काट्टुनायकन, को भूमिहीन रखा है.

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मलयालम में एक कविता है, कुरत्ती, जिसमें कवि कदम्मनिट्टा रामकृष्णन लिखते हैं कि कैसे शक्तिशाली लोगों ने आदिवासियों को गुलाम बना दिया है. कविता में, कुरत्ती (कुरवा आदिवासी समुदाय की एक महिला) कहती है, “याद रखें कि आप खुद कैसे बने? हमने आपके लिए जंगली कंद पकाए, हमने जंगली धाराओं से शुद्ध पानी दिया. जब आप उन्हें खाकर सो गए, तो हमने आपकी रक्षा की. जंगली जानवरों से, जबकि हम खुद उनके शिकार हुए. हमने आपके लिए हाथियों, कुत्तों, गायों को वश में किया. हमने आपके लिए पेड़ काटे और घर बनाए. हमने सोचा था कि आप हममें से एक हैं, लेकिन जब हम सोए, तो हम फंस गए. आपने हमें अपना दास बनाया, हमारी पीठ जला दी, हमारे ज्ञान को त्याग दिया और आप हमारे शासक बन गए.”

सरकार के साथ-साथ आधुनिक कहा जाने वाला समाज भी यह मानता है कि देश के आदिवासियों ने बहुत प्रगति की है. लेकिन दशकों पहले लिखी गई इस कविता में आज की सच्चाई झलकती है. आजीविका के मामले में आज भी आदिवासियों की स्थिति ऐसी ही है.

न्यूज़ मिनट ने केरल के वायनाड ज़िले में रहने वाले आदिवासी समुदायों के जीवन पर एक रिपोर्ट की है. उसके मुताबिक़ कुरिच्यार और कुरुमा जैसे कुछ समुदायों को छोड़कर पनियार, काट्टुनायकन और अडिया समुदायों के ज़्यादातर लोग आज भी दैनिक मज़दूरी पर निर्भर हैं.

वो टपकती छतों के नीचे सोते हैं, और अपनी समृद्ध खाद्य संस्कृति को पीछे छोड़कर अब वो वही खाते हैं जो सरकार से मुफ़्त राशन के तौर पर मिलता है. यह आदिवासी कभी जंगलों पर राज करते थे, लेकिन अब जंगल उनका नहीं है.

उनके पास न तो खेती करने के लिए ज़मीन है और न ही जानवर पालने के लिए. उनमें से कई बंधुआ मज़दूर हैं, और वो जानते हैं कि अपनी छोटी-मोटी कमाई से, वो कभी अपनी ज़मीन के मालिक नहीं बन सकते.

कोचिन यूनिवर्सिटी ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी (CUSAT) के प्रोफेसर दामोरदन राजसेनन और राजीव भास्कर, और Purdue University Fort Wayne, Estados Unidos के ऑगस्टो डी वेनान्ज़ी ने 2020 में प्रकाशित हुए अपने एक शोध में कहा, “जनजातियों में पनिया सबसे ग़रीब समूह है, जिसके सिर्फ़ 1.7 प्रतिशत सदस्य किसान हैं, जबकि 65.7 प्रतिशत खेत मज़दूरी करते हैं. कुरीचियन, मलयारायण और मुदुवान जैसे समुदायों में ज़्यादा संख्या में किसान शामिल हैं, जबकि ज़्यादातर अडिया और काट्टुनायकन खेत मज़दूर हैं. “

केरल सरकार ने कल्पना की थी कि राज्य में 2015 तक कोई भी भूमिहीन नागरिक नहीं होगा. इसके लिए भूमिहीनों को ज़मीन देने की परियोजना 2012 में एक सरकारी अधिसूचना के माध्यम से शुरू की गई. लेकिन वायनाड में अभी भी कई ऐसी आदिवासी बस्तियां हैं जहां निवासियों के पास ज़मीन के पट्टे नहीं हैं.

वायनाड में आदिवासी बस्तियां लेबर कैंप के समान

वायनाड में दो तरह की आदिवासी कॉलोनियां हैं – एक, जहां लोगों को सरकार द्वारा उनकी ज़मीन पर मालिकाना हक़ के साथ बसाया गया है, और दूसरी जहां लोग दशकों पहले निजी भूमि पर बस गए थे, और ज़मीन उनकी नहीं है.

निजी भूमि पर बसने की प्रथा ज़मींदार व्यवस्था का हिस्सा है, जब आदिवासी लोग बागानों या खेतों में काम करने के लिए आते थे और ज़मींदार की निजी भूमि के किसी कोने में बस जाते थे. ज़मीन के छोटे-छोटे टुकड़ों पर एक से ज़्यादा परिवार रहते थे.

आदिवासी गोत्र महासभा के मुताबिक़ वायनाड में क़रीब 2,000 आदिवासी बस्तियां हैं जो बिना उचित दस्तावेजों के निजी जमीन पर बसी हैं.

वायनाड में बाहरी लोगों का पलायन, सरकार द्वारा बांधों का निर्माण, और वनों की कटाई ने ज़िले के कई आदिवासी समुदायों, ख़ासकर पनिया, अडिया और काट्टुनायकन, को भूमिहीन रखा है.

Photo Credit: The News Minute

जब बाहरी लोगों ने पैसा देकर पहाड़ों में ज़मीन खरीदी, तो उसका सीधा नतीजा यह हुआ कि ग़रीब आदिवासी लोग अपनी ज़मीन से बेदख़ल हो गए, और उनके पास बसने के लिए कोई जगह नहीं बची. कई आदिवासी बस्तियां सरकारी योजनाओं की भेंट चढ़ गईं, तो दूसरी आरक्षित वन घोषणाओं की.

आदिवासी गोत्र महासभा (AGMS) के गीतानंदन ने द न्यूज़ मिनट से बातचीत में कहा कि जब आदिवासियों के पुनर्वास की बात आती है तो सरकार उन्हें ऐसी बस्तियों में बसाती है, जहां बुनियादी सुविधाएं भी नहीं होतीं. गीतानंदन कहते हैं कि यह पुनर्वास नहीं, बल्कि लेबर कैंप के बराबर है.

AGMS सभी भूमिहीन आदिवासी परिवारों के लिए कम से कम एक एकड़ ज़मीन की मांग कर रहा है. इसके लिए सरकारी ज़मीन जो आरक्षित वन क्षेत्र का हिस्सा नहीं है, उसका इस्तेमाल किया जा सकता है.

खाद्य संस्कृति को ज़िंदा रखने की जद्दोजहद

पिछले कई सालों से यहां के आदिवासी समुदाय काफी हद तक सरकार से मिलने वाले मुफ्त राशन पर ही निर्भर हैं. हाल ही में COVID-19 लॉकडाउन के दौरान उन्हें भोजन किट के साथ दालें दी गईं, हालांकि यह उनकी खाद्य संस्कृति का हिस्सा नहीं है.

वन उत्पाद, कंद, कुछ अंकुर और सब्जियां आदिवासियों की खाद्य संस्कृति का हिस्सा हैं, लेकिन यहां के आदिवासी दालें नहीं खाते.

आदिवासियों के बीच काम करने वाले कार्यकर्ता बताते हैं कि उनसे सिर्फ चावल पर जीने की उम्मीद करना ग़लत है. अगर इनके पास अपनी ज़मीन होगी,तो यह लोग अपनी ज़रूरत की चीज़ें उगा सकते हैं, क्योंकि जंगल जाने पर कई पाबंदियां हैं.

ज़मीन पर मालिक़ाना हक़ न होना वायनाड के आदिवासियों को ग़रीबी और गुलामी के चक्र में फंसा रहा है. उनके जीवन को बेहतर करने के लिए, उन्हें खेती-किसानी के लिए संसाधन दिए जाने चाहिए न कि मज़दूरी के.

(Photo Credit: The News Minute)

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