मध्य प्रदेश में आदिवासी शिक्षा का बुरा हाल, शिक्षकों की कमी से छात्रों का भविष्य अंधेरे में

भले ही छात्र पढ़ाई में रुचि रखते हैं, लेकिन सिस्टम उन्हें मेंटरशिप देने में विफ़ल रहा है. ऐसे में यह आदिवासी बच्चे अपनी क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाते, जो उनके जीवन में बड़े बदलाव ला सकता है.

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मध्य प्रदेश के मऊ तहसील के सरकारी स्कूलों के आदिवासी छात्रों का भविष्य अधर में लटका हुआ है. राज्य सरकार इन बच्चों को शिक्षकों का बुनियादी स्टाफ़ भी देने में विफ़ल रही है – जो नियमों के अनुसार स्कूलों को चलाने के लिए अनिवार्य हैं.

आदिवासी छात्रों की पढ़ाई को लेकर भावनाओं का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वो स्कूल पहुंचने के लिए कच्ची सड़कों पर हर रोज़ 6 किलोमीटर से ज़्यादा पैदल चलते हैं.

कुशलगढ़ के माध्यमिक विद्यालय में सिर्फ़ एक शिक्षक है – जयनारायण निनामा. शिक्षकों की कमी ने उन्हें जैसे सर्वगुण संपन्न बना दिया है क्योंकि वह अंग्रेजी, गणित, विज्ञान जैसे सभी विषय पढ़ाते हैं. इसके अलावा छात्रों को सरकारी योजनाओं और नीतियों के बारे में बताने की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं की है.

निनामा को इस बात का दुख है कि भले ही छात्र पढ़ाई में रुचि रखते हैं, लेकिन सिस्टम उन्हें मेंटरशिप देने में विफ़ल रहा है. ऐसे में यह आदिवासी बच्चे अपनी क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाते, जो उनके जीवन में बड़े बदलाव ला सकता है.

तहसील मुख्यालय से 20 किलोमीटर से ज़्यादा की दूरी पर स्थित कलाकुंड के सरकारी स्कूलों में भी यही हाल है. यहां प्राइमरी, मिडिल और हाई स्कूलों में एक ही शिक्षक है. स्कूल में 47 छात्र पढ़ते हैं – 25 प्राइमरी में और 22 माध्यमिक कक्षाओं में. प्राइमरी और सेकेंडरी के छात्रों के लिए शिक्षक एक ही है – चंद्रकांत कर्माकर.

हाई स्कूल के शिक्षक राजेश वर्मा हिंदी और संस्कृत पढ़ाते हैं. वो फ़िलहाल बाकि के विषय नहीं पढ़ाते. जबकि रामगोपाल इजागर माध्यमिक कक्षाओं के षिक्षक हैं.

फ्री प्रेस जर्नल के मुताबिक़ यहां के शिक्षक स्कूल को अपनी मर्जी और शौक से संचालित करते हैं – शैक्षणिक कैलेंडर का शायद ही कभी पालन किया जाता है.

करमाकर का कहना है कि प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाएं दो कमरों में संचालित होती हैं, और वो मानते हैं कि आदिवासी छात्र प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार हैं.

एक अधिकारी ने मीडिया साइट को बताया कि डिविज़न के अधिकारी स्थिति को सुधारने के लिए कोई पहल नहीं करना चाहते. यह तब है जब आदिवासी कल्याण विभाग को आदिवासी बच्चों की शिक्षा के लिए एक बड़ा बजट मिलता है.

माता-पिता, छात्रों और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ताओं ने आदिम जाति कल्याण विभाग के सामने इस मुद्दे को उठाया है, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.

राज्य सरकार के नियमों के अनुसार हर स्कूल में एक प्रंसिपल, 2 कमरे, 8 शिक्षक (हर विषय के लिए एक), एक प्रयोगशाला, एक पुस्तकालय, एक स्टाफ रूम और पीने के पानी की सुविधा होना अनिवार्य है. हालांकि, जहां तक ​​मऊ के स्कूलों का सवाल है, सरकार और अधिकारी अपने ही जनादेश पर खरे नहीं उतरे हैं.

ब्लॉक शिक्षा अधिकारी बीएस बमनिया ने कहा कि उन्होंने इसकी जानकारी ज़िला शिक्षा अधिकारी को दे दी है. वो कहते हैं कि शिक्षकों की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी क्योंकि सरकार उनको वेतन देने के लिए एक बड़ी रक़म खर्च कर रही है.

सवाल यह है कि शिक्षकों पर जब अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करने का इतना ज़ोर है, तो सरकार के ज़िम्मेदारियां पूरी न करने की जवाबदेही किसकी है?  

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