यूएन की रिपोर्ट: जंगलों पर आदिवासियों के अधिकार मानने से जंगल और आदिवासी दोनों को होगा फ़ायदा

रिपोर्ट के मुताबिक़ सांस्कृतिक, भौगोलिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थितियां तेज़ी से बदल रही हैं. और इसका सीधा असर हमारे जंगलों पर पड़ रहा है. इससे होने वाले नुकसान पर्यावरण और आर्थिक दोनों ही रूप से गंभीर हैं.

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एक नई रिपोर्ट के अनुसार ऐसे स्वदेशी और आदिवासी क्षेत्रों में वनों की कटाई की दर बेहद कम है, जहाँ सरकारों ने सामूहिक रूप से भूमि अधिकारों को औपचारिक मान्यता दी है.

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (Food and Agriculture Organisation, FAO) और यूएन एंड द फ़ंड दी पा डेवलपमेंट ऑफ़ इंडिजीनस पीपल्स ऑफ़ लैटिन अमेरिका एंड द कैरिबियन (United Nations and the Fund for the Development of Indigenous Peoples of Latin America and the Caribbean, FILAC) में ऐसा कहा गया है.

रिपोर्ट के मुताबिक़ अमेज़न बेसिन के आदिवासी इलाक़ों से वनों की कटाई की वजह से 2003 से 2016 के बीच हर साल औसतन इन जंगलों में संग्रहित 0.17 प्रतिशत कार्बन नष्ट हुआ.

वहीं, संरक्षित क्षेत्रों के बाहर के जंगलों में हर साल 0.53 प्रतिशत कार्बन की गिरावट आई, यानि आदिवासी क्षेत्रों की तुलना में 0.36 प्रतिशत अधिक.

रिपोर्ट में पाया गया कि आदिवासी क्षेत्रों में जंगल के प्रबंधन की प्रथाओं का पालन किया जाता है, जैसे फ़ॉरेस्ट रीजेनरेशन, चयनात्मक कटाई, और मौजूदा वनों के अंगर पेड़ों का विकास. अध्ययन में पाया गया कि कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए यह तरीक़े कारगर और किफ़ायती हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक़ सांस्कृतिक, भौगोलिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थितियां तेज़ी से बदल रही हैं. और इसका सीधा असर हमारे जंगलों पर पड़ रहा है. इससे होने वाले नुकसान पर्यावरण और आर्थिक दोनों ही रूप से गंभीर हैं.

FAO और FILAC ने कहा है कि जहां एक तरफ़ जंगलों में रहने वाले लोगों के पास संस्कृति, ज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों का विशाल भंडार है, लेकिन दूसरी तरफ़ उनकी आय भी सबसे कम है, और सेवाओं तक उनकी पहुंच भी.

यही समुदाय कोविड (COVID-19) महामारी के दौरान स्वास्थ्य और आर्थिक रूप से सबसे खराब स्थिति में थे.

इन चुनौतियों से पार पाने के लिए एफ़एओ की रिपोर्ट में कुछ नीतियां प्रस्तावित हैं, जिसमें जनजातीय क्षेत्रों की अर्थव्यवस्थाओं को फिर से सक्रिय करने, जलवायु परिवर्तन को कम करने, जैविक और सांस्कृतिक विविधता को संरक्षित करने के लिए उपाय हैं.

FAO और FILAC की रिपोर्ट में दिए गए छह प्रस्ताव

इन बातों का ध्यान रखने से सोशल इंक्लूज़न को बढ़ावा मिलेगा. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दुनियाभर में जैव विविधता में गिरावट की दर उन क्षेत्रों में कम है जहां जनजातियों को अपनी भूमि पर स्वामित्व मिला है.

यह रिपोर्ट भले ही लैटिन अमेरिका और कैरिबियन पर आधारित है, लेकिन दुनिया के सभी आदिवासी क्षेत्रों पर यह लागू होती है.

हाल ही में ओडिशा के सिमलीपाल टाइगर रिज़र्व में लगी आग के लिए सबसे पहले स्थानीय आदिवासी समुदायों को ज़िम्मेदार ठहराया गया था. रिपोर्ट में सबसे ज़्यादा ज़ोर आदिवासी लोगों के साथ नए संबंध बनाने और उनकी संस्कृति और ज्ञान को पुनर्जीवित करने पर है.

शायद ऐसा करने पर ग़ैर आदिवासी लोग यह समझ पाएंगे कि आदिवासी जो जंगल में रहते हैं, और जिनका जीवन जंगल पर ही निर्भर है, वो अपने ही घर में आग नहीं लगाएंगे.

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