तमिलनाडु: पीढ़ियों से जंगल में बसे आदिवासी अचानक बने सरकारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने वाले

पीढ़ियों से जिस जगह वो रह रहे थे, उससे क़रीब एक किलोमीटर के फ़ासले पर अब उनका घर है, लेकिन इस छोटी सी दूरी ने उन्हें 2006 के वन अधिकार अधिनियम के तहत सरकारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने वाला (अतिक्रमणकर्ता) बना दिया है.

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पीढ़ियों से आनमलाई टाइगर रिज़र्व के अंदर वालपराई में काडमपरई के जंगल 15 आदिवासी परिवारों का घर रहा है. 2010 में इस इलाक़े में लैंडस्लाइड के चलते, इनको और इनके घरों को सुरक्षित रखने के लिए, इस आदिवासी बस्ती को पास की एक जगह पर शिफ़्ट कर दिया गया.

इस शिफ़्टिंग ने उनकी पूरी ज़िदगी उलट-पलट कर दी है. पीढ़ियों से जिस जगह वो रह रहे थे, उससे क़रीब एक किलोमीटर के फ़ासले पर अब उनका घर है, लेकिन इस छोटी सी दूरी ने उन्हें 2006 के वन अधिकार अधिनियम के तहत सरकारी ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने वाला (अतिक्रमणकर्ता) बना दिया है.

सरकार द्वारा बसाए जाने के बाद, अगर सरकार ही उनका हक़ छीन लेगी, तो ज़ाहिर है बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं की आपूर्ति नामुमकिन ही होगी.

समुदाय के केशवन ने इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए कहा कि बस्ती के अधिकांश निवासी कूली के रूप में काम करते हैं, जबकि कुछ परिवार काली मिर्च और अदरक की खेती करते हैं.

उन्होंने कहा, “वन विभाग द्वारा लगाई गईं सोलर लाइट सिर्फ़ कुछ महीनों के लिए काम करती हैं. बिजली के बिना हम पिछले दस सालों से मिट्टी के तेल के दीये जलाते हैं, और उसकी रोशनी में अपनी शामें और रातें गुज़ारते हैं.”

प्रशासन और आदिवासियों के बीच इस खींचतान का सबसे बुरा असर बस्ती के बच्चों पर पड़ रहा है. बस्ती में 10 बच्चे हैं जिनकी उम्र स्कूल जाने लायक है. मिट्टी के तेल के दीयों की रोशनी में पढ़ाई करना उनके लिए मुश्किल है.

इसके अलावा एक दिक्कत यह भी है कि तेल की क़ीमत बढ़ गई है, और राशन की दुकान से मिलने वाला तेल हर रोज़ दीये जलाने के लिए नाकाफ़ी है.

ज़मीन देने वाले क़ब्ज़ा करने वाले कैसे बन गए?

आरक्षित वनों के अंदर बसे घरों को बिजली कनेक्शन लेने के लिए वन विभाग की मंज़ूरी लेना ज़रूरी है.

वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने अखबार से कहा, “वालपराई वन रेंज की पांच आदिवासी बस्तियों में से, हमने Tangedco के माध्यम से, वेल्लीमुडी, नेदुकुंद्रू और कील पूनाची में रहने वाले परिवारों को घर का पट्टा और बिजली आपूर्ति जारी की है. हम 2006 के वन अधिकार अधिनियम के तहत कवरकल और काडमपरई में रहने वाले लोगों को यह सुविधाएं नहीं दे सकते. फ़िलहाल उन्हें अतिक्रमणकर्ता माना जा रहा है, क्योंकि अधिनियम के तहत सिर्फ़ उन लोगों को पट्टे और दूसरे अधिकार दिए जा सकते हैं, जो 2006 से पहले वहां रहते थे. इन परिवारों की बात करें तो यह लोग 2010 में ही इस इलाक़े में आए हैं.”

आदिवासी कार्यकर्ता और एकता परिषद के राज्य समन्वयक, एस धनराज कहते हैं, “काडमपरई में इन आदिवासियों के पूर्वजों ने तत्कालीन सरकार को बांध के निर्माण के लिए अपनी ज़मीन दे दी थी. इसके अलावा बांध के निर्माण के लिए काम भी किया था. लेकिन, अब उन्हीं आदिवासियों के पास न तो अपने पक्के घर हैं, न ही बिजली की आपूर्ति. ऊपर से उन्हें अपने मूल अधिकारों के लिए संघर्ष भी करना पड़ रहा है.”

एक बात तो तय है, परिवारों को इस इलाक़े में शिफ़्ट प्रशासन द्वारा ही किया गया था, तो एफ़आरए के तहत उनके अधिकार दिलाने की ज़िम्मेदारी भी प्रशासन को ही लेनी होगी.

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