आदिवासियों के लिए ख़ास सामाजिक सुरक्षा का ब्यौरा कमाल है!

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सरकार के जनजातीय मंत्रालय से सितंबर 2020 में एक सवाल पूछा गया था, जिसका जवाब जनजातीय मंत्रालय ने 19 सितंबर 2020 को दिया. यह सवाल लोकसभा के दो सांसदों ने पूछा था. इनका नाम है डीएम कातिर आनंद और प्रताप सिम्हा. 

इन दो सांसदों ने सरकार से पूछा था कि क्या सरकार ने ख़ासतौर से आदिवासियों के लिए कोई सोशल सिक्योरिटी की योजना बनाने का मन है. सवाल में पूछा गया है कि अगर जवाब हाँ है तो उसका ब्यौरा प्रस्तुत करें और जवाब ना है तो उसका कारण बताएँ. 

जनजातीय मंत्री अर्जुन मुंडा ने सवाल के पहले हिस्से का जवाब हाँ में दिया है. यानि सरकार ख़ासतौर से आदिवासियों के कल्याण और सुरक्षा के लिए सामाजिक सुरक्षा योजना पर विचार कर रही है. 

मंत्री महोदय ने लोकसभा में इस सवाल के अगले भाग का उत्तर भी दिया है. यानि योजना क्या है उसका ब्यौरा. उन्होंने ब्यौरा देते हुए कहा है कि जनजातीय मंत्रालय आदिम जनजातियों यानि पीवीटीजी समूहों के लिए एक योजना पर विचार कर रही है. 

सरकार पीवीटीजी के लिए विशेष योजना पर विचार कर रही है, योजना क्या है, कोई नहीं जानता.

जी हाँ यह ब्यौरा यहीं पर ख़त्म हो जाता है. अब आप सोचिए की सवाल के पहले भाग यानि कि क्या सरकार आदिवासियों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजना पर विचार कर रही है जवाब मिलता है हाँ. 

सवाल के दूसरे भाग में जवाब मिलता है कि PVTGs के लिए योजना पर विचार हो रहा है. क्या जवाब का दूसरा हिस्सा पहले हिस्से का एक भाग नहीं है. 

अगर पहले हिस्से को मंत्री जी कुछ ऐसे रखते, “जी हाँ, सरकार आदिम जनजातियों यानि पीवीटीजी समूहों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजना पर विचार कर रही है.” तो क्या बात अलग होती. जी हाँ, बात बिलकुल अलग होती. क्योंकि तब सरकार को सवाल के दूसरे जवाब के लिए कुछ जुगाड़ करना पड़ता. 

ज़ाहिर है संसद में सवालों के जवाब मंत्रालय के नौकरशाह तैयार करते हैं. यह जवाब भी किसी सीनियर अफ़सर ने ही तैयार किया होगा. ऐसा कहा जाता है कि जो अफ़सर जवाब जितना गोल-मोल या पेचीदा बना सकता है, उतना ही अफ़सर को काबिल माना जाता है. 

ऐसा नहीं है कि सवाल का जवाब इन दो लाइन में ही ख़त्म होता है. इस जवाब में बाक़ायदा एक और पूरा पैराग्राफ़ है. लेकिन इस पैराग्राफ़ में जो तथ्य दिए गए हैं. वो तथ्य सरकार की तरफ़ से लोक सभा और राज्य सभा में कई सवालों के जवाब में दिए गए हैं. 

इन तथ्यों में बताया गया है कि सरकार ने लघु वनोत्पादों की सूचि में कई नए उत्पादों को शामिल कर उनकी एमएसपी बढ़ाई है. राज्य सभा में जब सरकार से पूछा गया था कि उसने लॉक डाउन में आदिवासियों की मदद करने के लिए क्या क्या कदम उठाए थे तो भी यही तथ्य पेश किए गए थे. 

आप अगर राज्य सभा या लोक सभा के पिछले कम से कम दो सत्रों में जनजातीय मंत्रालय या आदिवासियों के विकास से जुड़े सवालों के उत्तर खंगालेंगे तो पाएँगे कि दो तीन रटे रटाए तथ्य और जवाब पेश किए जाते रहे हैं.

इन तथ्यों और जवाबों में आपको स्पष्टता नहीं मिलेगी. दरअसल जो काम अफ़सरों या मंत्री महोदय को करना चाहिए वो पत्रकारों या आम लोगों के लिए छोड़ दिया जाता है. यानि तथ्यों से माथापच्ची करके एक सरल और स्पष्ट जवाब संसद में देने का काम नहीं किया जाता है. 

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