बस्तर में सुरक्षा बलों पर दबाव बनेगा या फिर नक्सल आंदोलन सिमटेगा

दशकों से बस्तर ने नक्सलवादियों और सुरक्षा बलों के बीच के संघर्ष चल रहा है. इस संघर्ष में पुलिस पर आरोप लगते रहे हैं कि वो आम आदिवासियों को नक्सल बता कर फेक एनकाउंटर कर रही है. अब ऐसा लगता है कि सरकार ने बस्तर में सुरक्षा बलों के स्थाई और ज़्यादा कैंप बना कर नक्सल आंदोलन की जड़ों पर वार करने का फ़ैसला किया है.

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छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र के हजारों आदिवासियों ने अपने इलाकों में बढ़ते पुलिस कैंप के विरोध में बड़ा प्रदर्शन किया था. इन लोगों का कहना था कि इनका दशकों से शोषण हुआ है और पुलिस की उपस्थिति से शोषण कम होने की बजाए बढ़ेगा. इस सिलसिले में हज़ारों आदिवासियों ने मई 2021 में कई मील और कई दिनों तक सरकेगुडा की यात्रा की. इस क्षेत्र में एक कोविड कंटेनमेंट ज़ोन होने के बावजूद हाल के दिनों में यहां एक बड़ा आंदोलन नज़र आया था.

आदिवासियों के आंदोलन की पृष्ठभूमि

बीजापुर-सुकमा सीमा पर सिलगेर गाँव में आदिवासी भूमि पर एक सैन्य शिविर की स्थापना ने आदिवासी समुदाय को उत्तेजित किया. आदिवासियों का कहना था कि पुलिस की अतिरिक्त मौजूदगी उनके सामान्य जन जीवन को मुश्किल बनाती है. 

पिछले कुछ महीनों में हिंसक नक्सल आंदोलन के केंद्र बस्तर में सुरक्षा शिविरों की स्थापना को लेकर सुरक्षा बलों और आदिवासियों के बीच तनाव रहा है. कहीं-कहीं तो करीब हर 5 किलोमीटर पर सुरक्षा शिविर भी लगा हुआ है.

मई 2021 में जोनागुडा से 5 किलोमीटर दूर सिलगेर गाँव में एक और ऐसा शिविर आया जहाँ एक महीने पहले अप्रैल 2021 में एक ख़तरनाक घात में 22 सुरक्षाकर्मियों को नक्सलियों के हाथों मारे जाते देखा गया था.

अगर सरकार की तरफ़ खड़े हो कर देखें तो सुरक्षा की दृष्टि से यह बेहद ज़रूरी कदम है. क्योंकि बस्तर लगातार माओवादी संगठन और सुरक्षा बलों के बीच मुठभेड़ का मैदान बना हुआ है. ज़ाहिर है इस लड़ाई में सबसे अधिक नुकसान आम आदिवासी का ही होता है. 

सरकार का कहना है कि बस्तर में सुरक्षाबलों का विरोध, आम आदिवासी की मजबूरी है. क्योंकि माओवादी उनको विरोध के लिए मजबूर कर रहे हैं. 

सिलगेर की तरफ़ देश का ध्यान कैसे गया

दरअसल 17 मई 2021 को सिलगर विरोध के चौथे दिन सामने आई थी. जब आसपास के गाँवों के सैकड़ों ग्रामीण पुलिस शिविर के बाहर इकट्ठे हुए थे. पुलिस ने निहत्थे आदिवासियों पर गोलियां चलाईं जिसमें तीन की मौत हो गई. जिसके बाद इन हत्याओं ने पूरे क्षेत्र में अशांति फैला दी.

हिंसा में मरता आम आदिवासी

दशकों से बस्तर ने नक्सलवादियों और सुरक्षा बलों के बीच के संघर्ष चल रहा है. इस संघर्ष में पुलिस पर आरोप लगते रहे हैं कि वो आम आदिवासियों को नक्सल बता कर फेक एनकाउंटर कर रही है. अब ऐसा लगता है कि सरकार ने बस्तर में सुरक्षा बलों के स्थाई और ज़्यादा कैंप बना कर नक्सल आंदोलन की जड़ों पर वार करने का फ़ैसला किया है.  

उधर पिछले साल की तुलना में बस्तर में इस साल कम नक्सली हमले हुए हैं. लेकिन साल 2020 में महामारी के बावजूद 241 नक्सली हमले हुए और इस साल 84 ‘एनकाउंटर’ भी हुए.

लेकिन नक्सलियों के खात्मे के एवज में पुलिस की कथित ज्यादती से हुई मासूमों की मौत का कोई रिकॉर्ड नहीं है.

बस्तर में इतने सारे पुलिस कैंप क्यों हैं?

बस्तर में सड़क निर्माण में सहायता के लिए विवादास्पद सुरक्षा शिविरों की स्पष्ट रूप से जरूरत है क्योंकि माओवादियों ने अक्सर सड़क निर्माण गतिविधियों को निशाना बनाया है. यहां तक कि ठेकेदारों और श्रमिकों का अपहरण भी किया है. 

हालांकि एक बार सड़क निर्माण गतिविधियों को सुरक्षा कवच देने का उद्देश्य पूरा हो जाने के बाद इन सभी शिविरों को वापस नहीं लिया जाता है.

केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल, सीमा सुरक्षा बल और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस सहित अन्य सशस्त्र बलों ने बस्तर में कई कंपनियों को तैनात किया है. अर्धसैनिक शिविर में औसतन कम से कम 200 सुरक्षा कर्मियों को तैनात करते हैं. जिससे इन छोटे हिस्सों में पुलिस-नागरिक अनुपात देश में सबसे अधिक हो जाता है. 

बस्तर के आईजी पी सुंदरराज ने कहा, “इन शिविरों को बस्तर के गांवों के लिए एकीकृत विकास केंद्रों के रूप में काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है. किसी भी तरह की सुविधा देने के लिए हमें पहले मोबिलिटी में सुधार करना होगा. इसलिए हमें लोगों की सुरक्षा के लिए सड़कों की जरूरत है और बुनियादी ढांचे के लिए सुरक्षा शिविर लगाए जा रहे हैं. हम गाँवों से माओवादी प्रेरित विरोध का सामना कर रहे हैं और क्योंकि हम उनके मूल क्षेत्रों में घुसपैठ कर रहे हैं. माओवादी भारी दबाव में जवाब दे रहे हैं. वे क्षेत्र में अपनी पकड़ खो रहे हैं.”

लेकिन सुरक्षा शिविरों के साथ उनके कड़वे अनुभवों के चलते ग्रामीण उन्हें निगरानी और हिंसा की जगह कहते हैं. सड़कों के निर्माण का उनका विरोध मुख्य रूप से इन शिविरों के उनके प्रतिरोध से जुड़ा हुआ है.

युवा आदिवासी संतोष कुमार कार्तमी कहते हैं, “यह सच है कि सरकार विकास लाना चाहती है. लेकिन क्या यह गलत नहीं है कि आम किसानों और ग्रामीणों को बिना किसी कारण के अपहरण और गिरफ्तार कर लिया जाता है? लोग यहां शिविर और सड़क नहीं चाहते हैं. हमें सिर्फ अस्पताल और स्कूल चाहिए.”

सुरक्षा बलों के खिलाफ डर पीढ़ियों से चला आ रहा है और कई युवा आदिवासियों ने अपने बुजुर्गों की भावनाओं को प्रतिध्वनित किया है. आदिवासी युवाओं ने दूसरे आदिवासियों को लामबंद करने और उनके मुद्दे के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए मूलवासी बचाओ मंच का गठन किया है.

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