हिंसा और भेदभाव: पूर्वोत्तर (North East) के ट्राइबल संगठनों ने मांगी हेल्पलाइन

आदिवासी संगठनों ने दावा किया कि 13 अगस्त को, नोएडा में काम करने वाले पूर्वोत्तर क्षेत्र के दो व्यक्तियों ज्ञान रंजन चकमा और निवारण चकमा को उनके मकान मालिक और अन्य लोगों ने लोहे की रॉड और ईंटों से बेरहमी से पीटा था.

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तीन आदिवासी संगठनों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से नोएडा में पूर्वोत्तर के लोगों के लिए स्पेशल हेल्पलाइन नंबर स्थापित करने का आग्रह किया है, ताकि वहां रहने वाले क्षेत्र के लोगों के खिलाफ भेदभाव और हिंसा की गतिविधियों से निपटा जा सके.

चकमा वेलफेयर एंड कल्चरल सोसाइटी (Chakma Welfare and Cultural Society), नोएडा, अरुणाचल प्रदेश चकमा छात्र संघ (Arunachal Pradesh Chakma Students Union) और अरुणाचल प्रदेश चकमा एवं हाजोंग छात्र संघ (Arunachal Pradesh Chakma and Hajong Students Association) ने गृह मंत्री को अपने संयुक्त ज्ञापन में कहा है कि अकेले नोएडा में चकमा समुदाय की आबादी लगभग 1,000 हैं और वे नियमित रूप से भेदभाव और हिंसा जैसी घटनाओं का सामना करते हैं.

उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर क्षेत्र से बड़ी संख्या में लोग नोएडा में काम कर रहे हैं, जो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में से एक है, जहां पूर्वोत्तर के लोगों के लिए ऐसी कोई विशेष हेल्पलाइन स्थापित नहीं की गई है.

संगठनों ने दावा किया कि 13 अगस्त को, नोएडा में काम करने वाले पूर्वोत्तर क्षेत्र के दो व्यक्तियों ज्ञान रंजन चकमा और निवारण चकमा को उनके मकान मालिक और अन्य लोगों ने लोहे की रॉड और ईंटों से बेरहमी से पीटा था.

सीडब्ल्यूसीएसएन के अध्यक्ष संतोष बाबूरा चकमा ने कहा, “दोनों के सिर सहित कई जगहों पर गंभीर चोटें आईं हैं. वे अस्पताल गए लेकिन उन्हें इलाज से पहले पुलिस स्टेशन जाने के लिए कहा गया. उसके बाद वे प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए स्थानीय पुलिस स्टेशन गए लेकिन वे उत्तर पूर्व से हैं इसलिए नोएडा पुलिस ने भी उन्हें गंभीरता से नहीं लिया और पीड़ितों को तत्काल चिकित्सा उपचार की आवश्यकता के बावजूद उन्हें प्रतीक्षा में रखा. आखिरकार प्राथमिकी दर्ज की गई लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है. आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं.”

ज्ञापन में कहा गया है कि पूर्वोत्तर के लोग अलग हैं और उन्हें अक्सर स्थानीय आबादी द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता है. इसमें कहा गया है कि पूर्वोत्तर के लोग असुरक्षित महसूस करते हैं और अक्सर अपनी मंगोलियाई विशेषताओं के कारण असुरक्षित महसूस करते हैं. इसमें कहा गया है कि वे अक्सर अपने रोजमर्रा की जिंदगी में भेदभाव का शिकार होते हैं.

ज्ञापन के अनुसार, भेदभाव के सबसे सामान्य रूपों में भद्दी टिप्पणियां और अपमानजनक शब्द, चिढ़ाना, ताना मारना, छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न और शारीरिक हमले शामिल हैं.

पूर्वोत्तर क्षेत्र के लोगों को कार्यस्थलों पर भी भेदभाव, उत्पीड़न, वेतन से इनकार का सामना करना पड़ता है, जो ज्यादातर असंगठित क्षेत्रों में हैं. ज्यादातर मामलों में वे पुलिस के व्यवहार और रवैये के कारण मामलों की रिपोर्ट तक दर्ज नहीं कराते हैं.

(File Image, Credit: REUTERS)

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