गुजरात: दूर-दूर रहने की आदीवासी जीवनशैली बचा रही है इन्हें कोविड-19 से

प्रशासन और सामाजिक वैज्ञानिकों का कहना है कि आदिवासी आबादी के कई उप-समुदायों की एक निश्चित जीवन शैली है, जिसमें वे पारंपरिक रूप से एक-दूसरे से दूरी बनाए रखते हैं. और शायद यही वजह है कि यह बीमारी यहां कम फैल रही है.

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कस्बों और शहरों में लोगों के घरों और आपसी मेलजोल से गुजरात के ज़्यादातर हिस्सों में कोविड-19 का भारी प्रकोप है. लेकिन एक राहत की बात यह है कि राज्य के कई आदिवसी इलाक़ों में चिकित्सा सुविधाओं की कमी के बावजूद स्थिति ख़तरनाक नहीं बनी है.

गुजरात के दक्षिणी सिरे पर स्थित डांग में मंगलवार को सामने आए 524 मामले राज्य में सबसे कम हैं. नर्मदा और छोटा उदेपुर ज़िलों के दूरदराज़ के इलाक़े में भी कोविड-19 के मामले कम हैं.

प्रशासन और सामाजिक वैज्ञानिकों का कहना है कि आदिवासी आबादी के कई उप-समुदायों की एक निश्चित जीवन शैली है, जिसमें वे पारंपरिक रूप से एक-दूसरे से दूरी बनाए रखते हैं. और शायद यही वजह है कि यह बीमारी यहां कम फैल रही है.

पहाड़ी इलाक़ों और जंगलों में रहने वाले समुदाय के लोगों के घर और खेत दूर-दूर होते हैं. डांग ज़िले के कलेक्टर डॉ एन के डामोर और सेंटर फॉर सोशल स्टडीज़ के प्रोफेसर किरण देसाई ने एक अखबार को बताया कि जिले में सोशल डिस्टेंसिंग एक आम बात है. डांग एक पहाड़ी और वन क्षेत्र है, और यहां गांव बड़े इलाक़ों में बसे हैं. ऐसे में लोग अलग-थलग रहते हैं.

हालांकि, बारडोली, वलोड और व्यारा के मैदानी में, आदिवासी समूह पास-पास बसते हैं, और वहां कोविड-19 की स्थिति शहरों जैसी है.

बोडेली, छोटा उदेपुर और संखेड़ा जैसे कस्बों में ज़्यादा मामले सामने आ रहे हैं, जबकि नासवाड़ी और कावंत जैसे दूरदराज़ के इलाक़ों में संक्रमण कम है.

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