उत्तराखंड हाई कोर्ट: आदिवासियों को मौलिक अधिकारों से वंचित नहीं रखा जा सकता

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उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कहा है कि संविधान के तहत आदिवासियों के उतने ही मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) हैं, जितने किसी आम शहरी या ग्रामीण व्यक्ति के हों.

कोर्ट ने अपने आदेश में राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह वन गुर्जरों की समस्याओं को समझने के लिए बनाई गई समिति का पुनर्गठन करे. हाई कोर्ट ने कहा है कि समिति में ज़िला मजिस्ट्रेटों के साथ-साथ समाज कल्याण विभाग के सचिव भी सदस्य होने चाहिएं.

पैनल को यह भी निर्देश दिया गया है कि वो हर महीने राज्य सरकार और हाई कोर्ट दोनों को अपनी रिपोर्ट दे. कोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री से भी हर महीने इस मामले को लिस्ट करने को कहा है.

अपने आदेश में चीफ़ जस्टिस आरएस चौहान और जस्टिस आलोक कुमार वर्मा ने कहा कि उत्तराखंड में एक बड़ी आदिवासी आबादी है, और राज्य का संवैधानिक कर्तव्य है कि उनकी देखभाल करे.

अदालत ने यह भी कहा कि राज्य को एक आदिवासी नीति बनानी चाहिए. कोर्ट ने थिंक एक्ट राइज़ फाउंडेशन (Think Act Rise Foundation – TARF) नामक एक एनजीओ द्वारा दायर पीआईएल पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिए.

उत्तराखंड में वन गुर्जर, भोटिया, बुक्सा, थारू, जौनसरी, बनरावत और माहीगीर आदिवासी समुदाय रहते हैं

इससे पहले अगस्त 2020 में इसी केस की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य सरकार को एक समिति बनाने और वन गुर्जरों की समस्याओं पर गौर करने का निर्देश दिया था. राज्य सरकार ने पिछले साल अक्टूबर में एक मेमो जारी कर, एक समिति का गठन किया.

पैनल के सदस्य थे – मुख्य वन्यजीव वॉर्डन, राजाजी नैशनल पार्क के निदेशक, भारतीय वन्यजीव संस्थान के निदेशक, और WWF द्वारा नामित एक एनजीओ. समिति को यह ज़िम्मेदारी सौंपी गई कि वो विचार करे कि गुर्जरों को ज़मीन से हटाया जाए या नहीं, और अगर निकाला जाना है तो उसकी प्रक्रिया क्या होगी.

इसके अलावा, समिति को वन अधिकार अधिनियम के तहत अधिकारों के साथ-साथ उनके पुनर्वास के लिए दिए जाने वाले मुआवज़े पर विचार-विमर्श का भी ज़िम्मा है.

उत्तराखंड में कई आदिवासी समुदाय रहते हैं. इनमें वन गुर्जरों के अलावा भोटिया या शौका, बुक्सा या भोक्सा, थारू, जौनसरी, बनरावत और माहीगीर शामिल हैं.

यह सभी समुदाय ग़रीबी और कुपोषण का शिकार तो हैं ही, साथ ही इनकी ज़मीन से जुड़े भी कई मुद्दे हैं.

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