HomeAdivasi Dailyबिजली मिले तो दुल्हन भी आदिवासी के घर आ जाए

बिजली मिले तो दुल्हन भी आदिवासी के घर आ जाए

वर्षों से अंधेरे में रह रहे आदिवासी लोगों ने दीपावली के दिन धरना दिया. उन्होंने अपने गांवों में मशाल रैलियां निकालीं और सरकार से अपील की कि उनके गांवों को बिजली का कनेक्शन दिया जाए.

आंध्र प्रदेश की विशाखा एजेंसी के चार आदिवासी गांवों के निवासियों को अपने बेटों की शादी करना कठिन होता जा रहा है. क्योंकि इन गांवों के लड़कों से शादी करने के लिए लड़कियाँ तैयार नहीं होती हैं. लड़कियों का यहाँ शादी करने से मना करने की वजह बिजली की कमी है.

आजकल लड़कियाँ मोबाइल फोन और टेलीविजन सेट के बिना अपनी जिंदगी के बारे में सोच भी नहीं सकती है. यहां तक ​​कि इन गांवों के निवासियों से शादी करने वाले लड़की भी एक या दो महीने के लिए अपने ससुराल में रहकर अपने माता-पिता के घर चली जाती हैं. एक आदिवासी नेता कहते हैं यह स्पष्ट है कि इसकी वजह बिजली की कमी है.

जहां जहां आदिवासी बिजली का कनेक्शन है वहां भी अब टीवी और मोबाइल फ़ोन लोगों की आदत में शुमार हो गया है. अब सभी उम्र के लोग टीवी और मोबाईल का इस्तेमाल करते हैं. रविकामथम मंडल के नेरेदुबंधा और गुद्दीपा गडबापलेम और कोय्यूरु मंडल के रामचंद्रपुरम और जजुलबंध में बिजली एक तरह से वरदान मानी जाती है.

वर्षों से अंधेरे में रह रहे लोगों ने इस दीपावली के दिन बिजली लगाने की माँग के लिए धरना दिया. उन्होंने अपने गांवों में मशाल रैलियां निकालीं और सरकार से अपील की कि उनके गांवों को बिजली का कनेक्शन दिया जाए.

विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व जाजुलबांधा में के. वेंकट राव, नेरेदुबंध में पीटीजी संगम के नेता किलो पोट्टुडोरा, रामचंद्रपुरम में श्रीधारी नागेश और गुड्डीपा गडबपलेम में तिन्नी अप्पा राव ने किया.

गिरिजन संगम के नेता के गोविंदा राव कहते हैं, “हम पिछले कई सालों से बिजली के बिना रह रहे हैं. हम पहले मिट्टी के तेल का इस्तेमाल करते थे लेकिन इसकी आपूर्ति भी बंद कर दी गई है. अब हम रिचार्जेबल टॉर्च पर निर्भर हैं. बिजली के अभाव में हमें अपने मोबाइल फोन चार्ज करने के लिए 9 किमी की यात्रा करनी पड़ती है.”

उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा, “गुड्डीपा गडबापलेम को 2016-17 वित्तीय वर्ष में एनटीआर हाउसिंग स्कीम के तहत एक हाउसिंग कॉलोनी स्वीकृत की गई थी. मकान बन गए हैं लेकिन बिजली नहीं है. कहा जाता है कि 2018 में विश्व बैंक योजना के तहत नेरदुबंधा के लिए एक अनुदान स्वीकृत किया गया था लेकिन अब तक काम नहीं किया गया है.”

रामचंद्रपुरम में बसे प्रवासी आदिवासी 15 साल पहले यहां आए थे और तब से अंधेरे में रह रहे हैं. उनका कहना है कि जजुलाबंध में बिजली का कनेक्शन था लेकिन 2018 में भीषण आग में सभी फूस के घर जलकर खाक हो गए और ट्रांसफार्मर और बिजली के उपकरण नष्ट हो गए.

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