कोरोना से मौत के बाद अंतिम संस्कार का SOP? आदिवासियों को कौन बताए?

रिपोर्टर को गाँव वालों ने बताया कि उन्हें नहीं पता था कि कोरोना वायरस से मरने वाले व्यक्ति के शरीर से भी दूसरों को इंफ़ेक्शन हो सकता है.

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कोविड-19 के बारे में कहा जाता है कि यह ऐसा वायरस है जो नए-नए टारगेट ढूँढता रहता है. इस वायरस ने पहली लहर में मुख्यतः शहरी इलाक़ों में 60 साल से उपर के लोगों को ही ज़्यादा निशाना बनाया था. 

लेकिन इसकी दूसरी लहर ने दो नए टारगेट ढूढ़ लिए हैं. अब यह वायरस तेज़ी से फैल रहा है और इसकी चपेट में जवान लोग ज़्यादा आ रहे हैं.

कुछ जानकारों का कहना है कि दूसरी लहर में यह वायरस इतने बड़े स्तर पर फैला ही नौजवानों से है. इसके अलावा इस वायरस ने इस बार ग्रामीण इलाक़ों को भी टारगेट कर लिया है.

यहाँ तक कि यह वायरस जंगलों में दूर दराज़ की आदिवासी बस्तियों तक भी पहुँच गया है. 

महाराष्ट्र से भी ख़बरें आ रही हैं कि यहाँ के आदिवासी इलाक़ों में भी कोरोना तेज़ी से फैल रहा है. यहाँ के आदिवासी बहुल पालघर ज़िले के बारे में स्थानीय मीडिया में चिंताजनक ख़बरें छप रही हैं.

इन ख़बरों के अनुसार आदिवासी गाँवों में कोरोना की वजह से कई आदिवासी गाँवों में मौतें हो रही हैं. इसमें अफ़सोस की बात ये है कि यहाँ हो रही मौतों के बात शवों के अंतिम संस्कार में ज़रूरी प्रोटोकॉल भी नहीं माना जा रहा है.

इसके अलावा आदिवासी इलाक़ों में स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी है. मसलन यहाँ के मोखाड़ा तालुक़ा के बेदुकवाड़ी गाँव के लोगों ने बताया कि प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र भी इस गाँव से कम से कम 10 किलोमीटर दूर है. 

मज़दूरी के सिलसिले में आदिवासी बाहर जाते हैं

पालघर ज़िले के कई गाँवों के बारे में जो मीडिया रिपोर्ट छपी हैं उनसे पता चलता है कि कोविड-19 के बारे में यहाँ पर कोई जागरूकता अभियान नहीं चलाया गया है. 

मसलन जब रिपोर्टर को गाँव वालों ने बताया कि उन्हें नहीं पता था कि कोरोना वायरस से मरने वाले व्यक्ति के शरीर से भी दूसरों को इंफ़ेक्शन हो सकता है. 

आदिवासी इलाक़ों के लिए यह ज़रूरी है कि यहाँ पर जागरूकता अभियान चलाया जाए. यह जागरूकता अभियान स्थानीय लोगों और संगठनों को जोड़ कर चलाने से ज़्यादा प्रभावी हो सकता है.

आदिवासी इलाक़ों में कोरोना कैसे पहुँच रहा है यह यह तो शोध का विषय है. लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि पालघर के आदिवासी इलाक़ों से मज़दूरी के लिए लोग बाहर जाते हैं. 

यहाँ के आदिवासी ईंट भट्टों पर मज़दूरी के लिए जाते हैं. यहाँ पर उनका संपर्क बाहर के दूसरे समुदाय के लोगों से होता है. यह एक कारण हो सकता है कि आदिवासी इलाक़ों में भी कोरोना फैल गया है. 

स्थानीय प्रशासन का कहना है कि आदिवासी इलाक़ों में जागरूकता अभियान और बीमारों को इलाज के इंतज़ाम किए गए हैं.

आदिवासी बड़ी तादाद में ईंट भट्टों पर काम करते हैं

हालाँकि राज्य सरकार या स्थानीय प्रशासन ने आदिवासी इलाक़ों में कोरोना की स्थिति पर कोई आँकड़ा जारी नहीं किया है.

इस बात की उम्मीद भी कम ही है कि आदिवासी इलाक़ों में सरकार की तरफ़ से कोई सर्वे या आँकड़ा जमा करने का कोई और प्रयास किया भी गया हो. 

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