10,000 रूपये क़ीमत ? इस मुर्ग़े में ऐसा क्या है ?

उन्होंने बड़ी नरम आवाज़ में कहा अभी धार नहीं बनी है. फिर मेरी हस्ती को नकारते हुए वो अपने काम में लग गए. मैंने उन्हें फिर टोक दिया, क्या मुर्ग़ा लड़ाई की तैयारी हो रही है? इस बार दलसू मंडावी ने मेरी तरफ़ ढंग से देखा भी नहीं था, लेकिन 'जी हाँ' ज़रूर कहा था.

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उत्तर बस्तर का कांकेर राज्य के आदिवासी बहुल ज़िलों में से एक है. यहाँ कि पखांजुर तहसील में कंदाड़ी पंचायत क्षेत्र का एक गाँव है आमाटोला. दोपहर का समय था दलसू मंडावी एक पत्थर पर छोटे छोटे ब्लेड पैना रहे थे. वो बड़ी शिद्दत से अपने काम में जुटे थे.

वो बीच बीच में पानी डाल कर ब्लेड को पत्थर पर घिस रहे थे. ब्लेड का धार नापने के लिए वो अपने नाखून और कभी पिंडली पर उसे चला कर देखते. मैं काफ़ी देर तक उन्हें यह काम करते देखता रहा था.

आख़िर मैं उठ कर उनके पास चला ही गया और उन्हें टोक दिया. मैंने उनसे पूछा की वो ब्लेड को कितना देर और घिसते रहेंगे. वो मुस्करा कर थोड़े से हैरान होते हुए मेरी तरफ़ देखते हैं. मानो पूछ रहे हैं कि जनाब आप हैं कौन और आपको दिक़्क़त क्या है.

मुर्ग़ा लड़ाई की तैयारी में जुटे दलसू मंडावी

लेकिन उन्होंने बड़ी नरम आवाज़ में कहा अभी धार नहीं बनी है. फिर मेरी हस्ती को नकारते हुए वो अपने काम में लग गए. मैंने उन्हें फिर टोक दिया, क्या मुर्ग़ा लड़ाई की तैयारी हो रही है? इस बार दलसू मंडावी ने मेरी तरफ़ ढंग से देखा भी नहीं था, लेकिन ‘जी हाँ’ ज़रूर कहा था.

मैनें अगला सवाल ठेल दिया, क्या आज ही हाट है? जवाब आया, ‘नहीं’. अब मेरे पास कुछ और कहने को था नहीं. वो थोड़ी देर और काम में लगे रहे. जब उन्हें इत्मीनान हो गया कि धार अब तैयार हो चुकी है तो फिर उन्होंने वहीं से बात शुरू की जो मेरा आख़िरी सवाल था.

उन्होंने बताया कि अगले दिन नदी पार के एक गाँव में हाट है और क़रीब शाम 4 बजे वहाँ पर मुर्ग़ा लड़ाई होगी. मैंने उनसे पूछा की क्या वो हर हफ़्ते मुर्ग़ा लड़ाई में जाते हैं. उन्होंने हाँ में जवाब देते हुए कहा कि यही तो एक शौक़ है.

मैंने उनसे पूछा कि हार जीत का क्या अनुपात रहता है. उनका कहना था कि हार-जीत दोनों ही होती रहती है. जिस दिन जीत जाते हैं तो ख़ुशी होती है और हार जाते हैं तो मुर्ग़ा भी गया और 100 रूपये भी.

दलसू मंडावी के आँगन में ख़ास मुर्गा

क्या उनकी पत्नी नाराज़ नहीं होती है जब मुर्ग़ा और 100 रूपये गँवा देते हैं. इसके जवाब में उनका कहना था कि दुखी होती है, पर क्या करें?

उन्होंने बताया कि मुर्ग़े को लड़ाई के लिए बाक़ायदा ट्रेनिंग दी जाती है. उन्होंने अपना एक मुर्ग़ा दिखाया जिसने उनके लिए कई लड़ाइयाँ जीती थीं. एक लड़ाई में उस मुर्ग़े की एक टांग में चोट आ गई. उसके बाद से अब यह मुर्ग़ा लड़ाई के लायक़ नहीं रहा है.

आमतौर पर जो मुर्ग़ा लड़ाई में हार जाता है या मारा जाता है तो वो परिवार का भोजन बन जाता है. लेकिन इस मुर्ग़े को इस परिवार का ख़ास प्यार मिलता है. दलसू मंडावी ने बताया कि उन्होंने एक नया मुर्ग़ा लड़ाई के लिए तैयार कर लिया है.

उन्होंने वो मुर्ग़ा दिखाया तो उनके चेहरे पर अभिमान के भाव थे. मैंने उनसे पूछा कि इस मुर्ग़े की क़ीमत क्या होगी. उनका जो जवाब था उसने मुझे हैरान कर दिया था. उन्होंने कहा कि इस मुर्ग़े की क़ीमत कम से कम 5000 रूपये होगी.

एक मुर्ग़े की क़ीमत 5000, आप कहीं 500 तो नहीं कहना चाहते हैं? मैंने उनसे पूछा. जी नहीं मैं सही बता रहा हूँ, लड़ाई का मुर्ग़ा 10 से 15 हज़ार रुपये तक भी बिकता है. मुर्ग़े की क़ीमत तय होती है कि वो मुर्ग़ा लड़ाई में इशारा होते ही कैसे अपने सामने वाले मुर्ग़े पर टूट पड़ता है.

ये आदिवासी लड़ाई के मुर्ग़े को ऐसे पालते हैं जैसे कोई शौकिन रेस के लिए अपने घोड़े पालता है.

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