वैक्सीन देने के लिए 4 घंटे पैदल चल कर आदिवासी गाँव पहुँची टीम से 4 सवाल

कोविड का टीका लगाने से पहले उस व्यक्ति को को विन (CoWin app) ऐप पर रजिस्टर करना पड़ता है. लेकिन इस गाँव में मोबाइल का नेटवर्क ही नहीं मिल रहा था. इसके लिए टीम के एक सदस्य को आदिवासियों की मदद से एक पहाड़ी चोटी पर जाना पड़ा. उसके बाद ही इन 11 आदिवासियों का रजिस्ट्रेशन हो सका.

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महाराष्ट्र के नंदुरबार ज़िले में एक दूर दराज़ के आदिवासी गाँव में एक पेड़ की छाँव तले स्वास्थ्य कर्मियों ने 11 आदिवासियों को कोविड का टीका लगाया. नर्मदा नदी के किनारे पहाड़ियों में यह छोटा सा आदिवासी गाँव हैं.

एक तरफ़ नदी, पहाड़ी ढलानें और हरे-भरे जंगलों के बीच यह एक बेहद ख़ूबसूरत गाँव हैं. लेकिन इस ख़ूबसूरती की कहानी से कुछ कड़वी सच्चाई भी जुड़ी हैं. 

पहली सच्चाई ये है कि तहसील से यहाँ तक पहुँचने में स्वास्थ्य कर्मियों को कम से कम 4 घंटे लगे थे. ये कर्मचारी यहाँ नाव में सवार हो कर कुछ दूर तक आए. इसके अलावा उन्हें काफ़ी लंबा रास्ता पैदल ही तय करना पड़ा. 

स्वास्थ्य कर्मियों को गाँव में एक पेड़ के नीचे ही लोगों को कोरोना का टीका लगाना पड़ा, क्योंकि गाँव में कोई और विकल्प था ही नहीं. यहाँ पर दो पक्के भवन हैं. एक प्राइमरी स्कूल और दूसरा आंगनबाड़ी केन्द्र. 

स्वास्थ्य टीम का कहना था कि स्कूल के कमरों में इतनी गर्मी थी कि वहाँ बैठना ही मुश्किल था. आंगनबाड़ी वाला कमरा टूट फूट गया है. सो उस कमरे में मरम्मत का काम चल रहा है.

आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि जहां स्वास्थ्य टीम को पहुँचने में इतना समय लगा, क्या वहाँ स्कूल में अध्यापक आते होंगे. अगर आते होंगे तो कैसे?

जिस स्कूल के कमरे में गर्मी की वजह से इस टीम को कुछ घंटे बिताने में दिक़्क़त हुई, क्या वहाँ अध्यापक बैठ कर आराम से पढ़ाते होंगे?

महाराष्ट्र में भी आदिवासी इलाक़ों में वैक्सीन के मामले में कई तरह के भ्रम हैं

फ़िलहाल बात कोविड पर ही रखते हैं, जिस गाँव की यहाँ हम बात कर रहे हैं वो नासिक से क़रीब 450 किलोमीटर दूर है. इस गाँव का नाम चीमलखेड़ी है. 

इस गाँव में पहुँची स्वास्थ्य टीम और प्रशासन के अधिकारियों ने बताया कि उनकी तमाम कोशिशों के बावजूद इस गाँव के मात्र 7 लोगों ने ही वैक्सीन लगवाई है. 

इन 7 लोगों के अलावा जिन 4 लोगों को वैक्सीन लगाई गई वो पड़ोस के गाँव मनीबेली के थे. इन 11 लोगों को वैक्सीन के लिए तैयार करने में प्रशासन की टीम को काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ी.

लेकिन इस टीम के लिए इन आदिवासियों को वैक्सीन के लिए तैयार करने के बाद भी कई चुनौतियाँ था. इन आदिवासियों के तैयार हो जाने के बावजूद यह काम आसान नज़र नहीं आ रहा था.

कोविड का टीका लगाने से पहले उस व्यक्ति को को विन (CoWin app) ऐप पर रजिस्टर करना पड़ता है. लेकिन इस गाँव में मोबाइल का नेटवर्क ही नहीं मिल रहा था. 

इसके लिए टीम के एक सदस्य को आदिवासियों की मदद से एक पहाड़ी चोटी पर जाना पड़ा. उसके बाद ही इन 11 आदिवासियों का रजिस्ट्रेशन हो सका. 

चीमलखेड़ी स्वास्थ्य टीम को बेशक इस काम के लिए शाबाशी मिलनी ही चाहिए. उन लोगों को भी तो शाबाशी मिलनी ही चाहिए जिन्होंने यह फ़ैसला किया कि इस स्वास्थ्य टीम को इस गाँव में भेजा जाए. 

लेकिन उन अधिकारियों से कुछ सवाल भी पूछे ही जाने ज़रूरी हैं. सबसे पहला सवाल कि क्या कारण है कि गाँव के वयस्क लोगों में से सिर्फ़ 7 ही लोगों ने टीका लगवाया?

दूसरा सवाल है कि क्या इस टीम ने यह ज़रूरत महसूस की थी कि गाँव के लोगों में किस तरह का भय या भ्रम वैक्सीन के बारे में है ?

तीसरा सवाल क्या इस टीम ने इस बात की ज़रूरत महसूस की थी कि इन कारणों को लिखा जाए और उच्च अधिकारियों तक यह बातें पहुँच सकें? 

चौथा सवाल क्या ज़िला प्रशासन ने अभी तक सिलसिलेवार तरीक़े से आदिवासी इलाक़ों में वैक्सीन के बारे में फैले भ्रम को दूर करने के लिए कोई योजना बनाई है ?

कोरोना वैक्सीन के बारे में अगर आदिवासी इलाक़ों में कोई भ्रम फैला है तो इसमें बड़ी हैरानी नहीं होनी चाहिए. क्योंकि सिर्फ़ आदिवासी इलाक़ों में नहीं बल्कि शहरों में भी वैक्सीन के बारे में चिंताएँ और ग़लतफ़हमी रही थी.

सरकार ने एक वैक्सीन के ब्लड क्लॉट जैसे साइड इफ़ेक्ट की स्टडी कराई है. इस स्टडी की रिपोर्ट हाल ही में सरकार को मिल भी गई है. जिसमें यह बताया गया है कि सच में इस वैक्सीन के ऐसे साइड इफ़ेक्ट हैं. 

इसलिए कोविड वैक्सीन के बारे में भ्रम के लिए आदिवासियों को दोष देना, उन्हें नीचा दिखाना या उनका मज़ाक़ बनाना, यह छोटी सोच होगी. प्रशासन को जितना जल्दी हो सके एक अभियान डिज़ाइन करना होगा. 

इस अभियान में आदिवासी इलाक़ों में स्थानीय भाषा में उन भ्रम और ग़लतफ़हमियों का जवाब देना चाहिए जो इन इलाक़ों में फैले हैं. 

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