वैक्सीन के मामले में नंबर वन महाराष्ट्र के आदिवासी भी पीछे छूटे

राज्य के स्वास्थ्य विभाग के आँकड़ों से पता चलता है कि आदिवासी आबादी में वैक्सीन कवरेज बेहद कम है. इसलिए यहाँ की आदिवासी आबादी कोरोना संक्रमण के बड़े ख़तरे में जी रही है. राज्य के ग्रामीण और आदिवासी इलाक़ों में यह संख्या और भी कम है. हिंगोली, पालघर, गढ़चिरौली, जलगाँव, सोलापुर और नंदुरबार में अभी तक मात्र 2.5 प्रतिशत लोगों को ही वैक्सीन की दोनों डोज़ मिली हैं.

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महाराष्ट्र ने अभी तक कुल 2.06 करोड़ लोगों कोरोना की वैक्सीन लगाई है. यह संख्या देश के किसी भी राज्य से अधिक है.

इसके बावजूद अगर कुल आबादी के लिहाज़ से देखें तो यहां भी अभी मात्र 3.3 प्रतिशत लोगों को ही वैक्सीन की दोनों डोज़ मिली है. 

राज्य के ग्रामीण और आदिवासी इलाक़ों में यह संख्या और भी कम है. हिंगोली, पालघर, गढ़चिरौली, जलगाँव, सोलापुर और नंदुरबार में अभी तक मात्र 2.5 प्रतिशत लोगों को ही वैक्सीन की दोनों डोज़ मिली हैं. 

इन ज़िलों में अगर सोलापुर को छोड़ दें तो बाक़ी 5 ज़िलों में 60 प्रतिशत आदिवासी आबादी या ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाली है. 

राज्य के स्वास्थ्य विभाग के आँकड़ों से पता चलता है कि आदिवासी आबादी में वैक्सीन कवरेज बेहद कम है. इसलिए यहाँ की आदिवासी आबादी कोरोना संक्रमण के बड़े ख़तरे में जी रही है. 

अगर हालात यही रहते हैं तो फ़िलहाल यानि कोरोना की दूसरी लहर से अगर आदिवासी बच भी जाते हैं तो भी ख़तरा बना रहेगा. क्योंकि वैज्ञानिक लगातार कोरोना वायरस की तीसरी लहर की चेतावनी दे रहे हैं. 

राज्य के स्वास्थ्य विभाग के आँकड़ों से पता चलता है कि आदिवासी बहुल पालघर में 35 लाख से ज़्यादा की जनसंख्या है. इसमें से कम से कम 3 प्रतिशत लोगों को कोरोना हो चुका है. 

लेकिन यहाँ पर अभी तक सिर्फ़ 9.2 प्रतिशत लोगों को ही कोरोना वैक्सीन की पहला टीका लगा है. यानि यहाँ कि कुल 88 प्रतिशत आबादी कोरोना संक्रमण के ख़तरे में जी रही है. 

महाराष्ट्र के आदिवासी भी वैक्सीन के मामले में पिछड़ रहे हैं

इसी तरह से नंदुरबार ज़िले की बात करें तो यहाँ भी कम से कम 87 प्रतिशत आबादी ऐसी है जो वैक्सीन के लिए रखी गई शर्तें पूरी करती है. लेकिन अभी तक इनको टीका नहीं लगा है. 

आँकड़ों के हिसाब से गढ़चिरौली में भी कम से कम 86 प्रतिशत आबादी जिसकी उम्र 18 साल से ज़्यादा है, उसे अभी तक कोरोना वैक्सीन नहीं लगाई गई है.

हिंगोली में हालात और ख़राब हैं, यहाँ तो 90 प्रतिशत आबादी जिसे कोरोना वैक्सीन लगनी चाहिए, अभी तक नहीं मिली है. 

आदिवासी और ग्रामीण इलाक़ों के कोरोना वैक्सीन मामले में पिछड़ने की सबसे बड़ी वजह तो वैक्सीन की कमी है.

इसके अलावा यातायात के साधनों की कमी, वैक्सीन के प्रति झिझक और अफ़वाहें हैं. आदिवासी इलाक़ों में कोरोना वैक्सीन के मामले में पर्याप्त जागरूकता अभियान नहीं चलाया गया है.

जानकारों का कहना है कि अगर आदिवासी आबादी को कोरोना वैक्सीन देने है तो घर-घर जा कर ही यह अभियान चलाया जाएगा. हालाँकि इस मामले में अभी तक सरकार की तरफ़ से कोई नीति नहीं बनाई गई है.

टीकाकरण के मामले में जानकार कहते हैं कि भारत का ज़बरदस्त रिकॉर्ड रहा है.

इस अनुभव से पता चलता है कि ग्रामीण इलाक़ों में वैक्सीन अगर देने है तो घर घर जा कर ही यह अभियान सफल हो सकता है.

ग्रामीण और आदिवासी इलाक़ों में अपना काम धाम छोड़ कर वैक्सीन के लिए स्वास्थ्य केन्द्रों पर लोगों का आना मुश्किल है. 

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