हम बोंडा हैं : हज़ार साल चले और 12 मील पहुँचे

इस बाज़ार में ज़्यादातर लोग आदिवासी समुदायों से ही हैं. इनमें मैदानी बोंडा भी शामिल हैं जो किसी समय पहाड़ी जंगलों को छोड़ कर मैदानी इलाक़ों में बस गए. समय के साथ इनके पहनावे और भाषा बोली में भी बदलाव आया है. इस बाज़ार में अलग अलग आदिवासी समुदायों के लोगों में फ़र्क़ करना मुश्किल है. सब लोग एक दूसरे में घुलमिल जाते हैं. पहाड़ी बोंडा मर्दों को भी इस बाज़ार में अलग से नहीं पहचाना जा सकता है. लेकिन अपने ख़ास पहनावे और आभूषणों की वजह से पहाड़ी बोंडा औरतें अलग ही नज़र आती हैं.

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मलकानगिरी ज़िले की बोंडा घाटी में बसे पहाड़ी बोंडा शनिवार के दिन जंगल से बाहर आते हैं. क़रीब 12-15 किलोमीटर पैदल चलते हुए ये आदिवासी पहाड़ी ढलानों और जंगल को पार करते हैं. बोंडा घाटी के कई गाँवों तक सड़क बनी चुकी है, लेकिन सड़क का रास्ता लंबा पड़ता है.

इसके अलावा बोंडा घाटी तक पहुँचने के लिए कोई पब्लिक ट्रांसपोर्ट की व्यवस्था नहीं है. कुछ प्राइवेट टेपों और जीप चलती हैं. 

लेकिन इन आदिवासियों के पास इतना पैसा नहीं होता है कि वो जीप या टेपों की सवारी पर पैसा ख़र्च करें. पहाड़ी बोंडा आदिवासियों से बात करने पर वो इस बात की कोई शिकायत नहीं करते हैं कि उन्हें इतनी लंबी दूरी पैदल तय करनी पड़ती है.

कई बार इस सवाल पर वो आपकी तरफ़ ऐसे देखते है कि मानो पूछ रहे हैं कि आप यह बेकार सवाल क्यों कर रहे हैं ? जंगलों में घूमना और लंबे लंबे रास्ते पैदल नाप लेना उनकी ज़िंदगी का हिस्सा रहा है, ना जाने कितनी पीढ़ियों से. 

लेकिन फिर भी आज के युग में जब आप लोगों को मीलों पैदल चलते देखते हैं तो मन में सवाल आना लाज़मी है. पहाड़ों में बसे ये आदिवासी शनिवार को अमलीपुट नाम के गाँव में लगने वाले साप्ताहिक बाज़ार या हाट के लिए निकले हैं.

ये लोग हाट में बेचने के लिए जंगल से जमा किए हुए फल, खेतों में पैदा की गई दाल, रागी जैसी चीजें लाते हैं. इसके अलावा सल्फ़ यानि ताड़ी और देसी शराब ले कर पहाड़ी बोंडा हाट में पहुँचते हैं. सल्फ़ या देसी शराब बेचने वाले बाज़ार के बाहरी हिस्से में ही रुक जाते हैं. लेकिन दूसरी चीजें लेकर आए लोग मुख्य बाज़ार की तरफ़ चले जाते हैं. 

इस बाज़ार में ज़्यादातर लोग आदिवासी समुदायों से ही हैं. इनमें मैदानी बोंडा भी शामिल हैं जो किसी समय पहाड़ी जंगलों को छोड़ कर मैदानी इलाक़ों में बस गए. समय के साथ इनके पहनावे और भाषा बोली में भी बदलाव आया है. इस बाज़ार में अलग अलग आदिवासी समुदायों के लोगों में फ़र्क़ करना मुश्किल है. 

सब लोग एक दूसरे में घुलमिल जाते हैं. पहाड़ी बोंडा मर्दों को भी इस बाज़ार में अलग से नहीं पहचाना जा सकता है. लेकिन अपने ख़ास पहनावे और आभूषणों की वजह से पहाड़ी बोंडा औरतें अलग ही नज़र आती हैं.

पहाड़ी बोंडा आदिवासियों की भाषा को रेमो कहा जाता है. लेकिन बाहरी समुदायों के साथ मेल मिलाप से ये आदिवासी ओडिया या फिर हिंदी भी बोलने लगे हैं. मर्द काम के सिलसिले में बाहर जाते हैं तो वो एक से ज़्यादा भाषाएँ सीख लेते हैं. औरतें आमतौर पर अपनी मातृभाषा में ही बात करती हैं. लेकिन इन बाज़ारों में ये औरतें भी ग़ैर बोंडाओं से संवाद के लिए ओडिया भाषा का इस्तेमाल करती हैं. 

अगर आप बोंडा औरतों की तस्वीर लेते हैं तो वो आपसे पैसे की माँग करती हैं. कई बार आस-पास के लोग भी उन्हें पैसे माँगने के लिए उकसाते हैं. दरअसल पहाड़ी बोंडाओं को यह बताया गया है कि उनकी तस्वीरों को बेचकर फ़ोटोग्राफ़र लाखों रूपये कमाते हैं.

इस थ्योरी में कितनी सच्चाई है, यह कहना मुश्किल है. लेकिन ऐसा लगता है कि स्थानीय प्रशासन ने इस थ्योरी को बढ़ावा दिया है. क्योंकि जब पत्रकार इस इलाक़े की कहानियाँ बाहर लाते हैं तो प्रशासन को कई मुश्किल सवालों के जवाब देने पड़ते हैं. 

इन आदिवासियों को सरकार ने पीवीटीजी की श्रेणी में रखा है. इनकी संस्कृति, भाषा को बचाने से लेकर रोज़गार के साधन पैदा करने तक, प्रशासन की कई ज़िम्मेदारी हैं. इन आदिवासियों के हालात बताते हैं कि ये ज़िम्मेदारी पूरी करने में प्रशासन कोताही करता है.

पहाड़ी बोंडा आदिवासी समुदाय के बारे में माना जाता है कि कम से कम 60 हज़ार साल से वो बोंडा घाटी के दुर्गम इलाक़ों में रहते आए हैं. इनकी वेशभूषा, भाषा और जीवनशैली उन्हें एक ख़ास पहचान देती है. 

लेकिन पिछली क़रीब आधी सदी से उनकी घटती आबादी और बदलती जीवनशैली पर काफ़ी चिंता जताई जाती रही है. इस सिलसिले में अभी तक की नीति यही रही है कि उनके कुदरती परिवेश में उन्हें जीने दिया जाए और उनकी पहचान को बचाया जाए.

लेकिन जैसा की कहा जाता है कि अगर कुछ स्थाई है तो वह है बदलाव. पहाड़ी बोंडा हज़ारों साल से जंगल में रहते आए हैं, लेकिन इसके बावजूद यह नहीं कहा जा सकता है कि वो बदलाव से अछूते हैं.

लगातार घटते जंगलों ने उनके सामने जीविका के नए विकल्प खोजने की चुनौती पेश की है. शायद यही कारण भी था कि इनमें से कुछ आदिवासी काफ़ी पहले ही मैदानों की तरफ़ चले आए. 

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