महामारी: आदिवासियों के बजट में कटौती, भुखमरी और कुपोषण बढ़ा

वित्त वर्ष 2020-21 के लिए सरकार ने जनजातीय मंत्रालय को कुल 7411 करोड़ रूपये आवंटित किये थे. लेकिन बाद में इस बजट में 1903 करोड़ रूपये की कटौती कर दी गई. जनजातीय मंत्रालय ने साल 2021-22 के लिए आदिवासी समुदायों से जुड़ी योजनाओं और दूसरे ख़र्चों के लिए कुल 12050 करोड़ रूपये की माँग की.

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संसद की स्थायी समिति ने वित्त वर्ष 2020-21 और 2021-22 के लिए आदिवासी मामलों के मंत्रालय के बजट में कटौती पर चिंता ज़ाहिर की है.

समिति ने कहा है कि इस कटौती से पहले से ही ग़रीबी में जी रहे आदिवासी समुदाय के हालात और ख़राब हो सकते हैं. 

समिति ने अपनी रिपोर्ट में नोट किया है कि सरकार ने जनजातीय मंत्रालय को कुल 7411 करोड़ रूपये आवंटित किये थे. लेकिन बाद में इस बजट में 1903 करोड़ रूपये की कटौती कर दी गई.

यानि कोविड महामारी के साल में जनजातीय मंत्रालय के बजट में लगभग 25 प्रतिशत बजट काट दिया गया. ज़ाहिर है आदिवासी आबादी से जुड़ी योजनाओं पर इस कटौती का बुरा असर लाज़मी है.

पीवीटीजी यानि विशेष रूप से पिछड़े आदिवासी समुदायों में कुपोषण और भुखमरी बढ़ी है

स्थाई समिति ने भी इस चिंता को ज़ाहिर किया है. लेकिन कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती है. जनजातीय मंत्रालय ने साल 2021-22 के लिए आदिवासी समुदायों से जुड़ी योजनाओं और दूसरे ख़र्चों के लिए कुल 12050 करोड़ रूपये की माँग की.

लेकिन इस मंत्रालय को सिर्फ़ 7524 करोड़ रूपये ही आवंटित किए हैं. यानि जनजातीय मंत्रालय की ज़रूरत और दिए गए पैसे में क़रीब 4526 करोड़ रूपये का फ़र्क़ है. 

जनजातीय मंत्रालय ने स्थायी समिति को बताया है कि कोविड और लॉक डाउन के दौरान आदिवासी समुदायों को चलाए जाने वाली ज़्यादातर योजनाएँ काम नहीं कर पाईं.

इसका कारण भी मंत्रालय ने बताया है. मंत्रालय का कहना है कि कोविड और लॉक डाउन की वजह से ग़ैर सरकारी संस्थाओं और आदिवासी समुदायों के लिए काम करने वाले दूसरे संगठनों का काम काज सीमित हो गया था.

जनजातीय मंत्रालय इन्हीं संस्थाओं के भरोसे ही आदिवासी समुदायों से जुड़ी योजनाओं को लागू करता है. इसलिए इस दौरान आदिवासी इलाक़ों में चलने वाली योजनाएँ बंद थीं. 

लॉक डाउन के दौरान ज़्यादातर साप्ताहिक हाट बंद थे

आदिवासी इलाक़ों में कोविड और लॉक डाउन के दौरान जीविका और पोषण काफ़ी बुरी तरह से प्रभावित हुआ. 

इस  सिलसिले में ‘हंगर वॉच’ नाम की संस्था ने समाज के कमज़ोर और ग़रीब तबकों के बीच एक सर्वे किया था.

इस सर्वे में पाया गया था कि ग़रीब परिवारों में कोविड महामारी और लॉक डाउन के दौरान पोषण बुरी तरह से प्रभावित हुआ था. इस सर्वे में कम से कम 20 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उन्हें कई बार भूखे पेट ही सोना पड़ा. 

इस दौरान सामाजिक-धार्मिक संगठनों और हज़ारों लोगों ने व्यक्तिगत तौर पर यह कोशिश की थी कि कम से कम लोगों को खाना मिल जाए.

लेकिन आदिवासी समुदायों तक यह मदद भी नहीं पहुँच पाई. क्योंकि ज़्यादातर आदिवासी समुदाय दूर दराज़ के जंगल और पहाड़ी इलाक़ों में रहते हैं. 

स्कूल और आंगनबाड़ी बंद होने से बच्चों को भरपेट खाना मिलना बंद हो गया है

आदिवासियों के बारे में आम धारणा यही है कि कोविड महामारी से ये समुदाय बचे रहे हैं. कुछ हद तक शायद यह बात सही भी है कि आदिवासी समुदायों के दूर दराज़ के इलाक़ों तक इस महामारी ने वैसा क़हर नहीं बरपाया, जैसा दूसरे इलाक़ों में देखा गया. लेकिन इस महामारी और लॉक डाउन की वजह से उनकी जीविका और पोषण पर बाक़ी वर्गों की तुलना में ज़्यादा फ़र्क़ पड़ा.

आदिवासी समुदायों में अभी भी ख़ुद को ज़िंदा भर रखने के लिए ही आर्थिक क्रिया कलाप होते हैं. इन समुदायों में संचय की प्रवृति ना के बराबर मिलती है.

आमतौर पर आदिवासी समुदाय जंगल से लकड़ी, फल-फूल और पत्ते जमा करते हैं. इनको ये आदिवासी साप्ताहिक हाटों में बेच कर अपने लिए कुछ पैसा जुटाते हैं. 

इसके अलावा आदिवासी समुदाय के लोग दिहाड़ी मज़दूरी करते हैं. लेकिन लॉक डाउन के दौरान ये सभी गतिविधि बंद थी. इसकी वजह से आदिवासी समुदायों की आय ख़त्म हो गई. 

इस दौरान आदिवासी इलाक़ों में चल रहे सभी स्कूल या आंगनबाड़ी पूरी तरह से बंद थे. इस वजह से आदिवासी बच्चों का पोषण भी बुरी तरह से प्रभावित हुआ. 

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