मलकानगिरी के कोया आदिवासी – ग़ैरआदिवासी दबाव और नेगेटिव ग्रोथ

2011 की जनगणना में कोया आदिवासी आबादी में नेगेटिव ग्रोथ दर्ज की गई थी. जब हम ओडिशा के मलकानगिरी ज़िले में कोया आदिवासियों से मिलने पहुंचे तो यह तथ्य हमारे दिमाग में था. इस तथ्य की पड़ताल के लिए हमने कोई विधिवत स्टडी नहीं की है. लेकिन इन कोया आदिवासियों के गांवों में लोगों से मुलाक़ात और बातचीत के बाद हमें यह ज़रूर लगा कि इन आदिवासियों की ग्रोथ रेट नेगेटिव नहीं है. बल्कि जनगणना के आंकड़ों में ही शायद त्रुटि रही है.

0
1342

कोया आदिवासियों से मिलने हम ओडिशा के मलकानगिरी ज़िले की तरफ़ निकले. मलकानगिरी के कालीमेला, मोट्टू, पोडिया, मथिली, कोरकोंडा और मलकानगिरी ब्लॉक में कोया आदिवासी रहते हैं. ओडिशा के मलकानगिरी और आंध्रप्रदेश के गोदावरी ज़िले के उत्तरी जंगलों और पहाड़ों पर कोया आबादी मिलती है. मलकानगिरी से लगे छत्तीसगढ़ के सुकमा और बस्तर इलाक़े में भी कोया आदिवासी हैं, लेकिन यहां इन आदिवासियों को माडिया और दोरला कहा जाता है.

मलकानगिरी पहुंचकर हमने कालीमेला का रुख किया. मलकानगिरी से कालीमेला तक की सड़क अच्छी थी. लेकिन कालीमेला से जंगल के भीतर कोया आदिवासियों की बस्तियों या गांवों तक जाने वाली सड़क उबड़-खाबड़ है. इस बारे में कुछ लोगों का कहना है कि नक्सलवादी संगठन यहां स्थानीय प्रशासन को सड़क नहीं बनाने देता है.

मुख्य सड़क से आदिवासी इलाक़ों के रास्ते में कहीं-कहीं घना जंगल पड़ता है, लेकिन ज़्यादातर गांव और खेत ही नज़र आते हैं. इस रास्ते से होते हुए हम जबनपल्ली गांव पहुंच गये. 

शाम का समय था, गांव के बाहर ही साप्ताहिक हाट लगा था. हाट में एक कोने में सबसे ज़्यादा भीड़ जमा थी, मुर्गा लड़ाई के बाड़े के पास. जबनपल्ली में मुर्गा लड़ाई के लिये आस-पास के गांव के लोग भी पहुंचते हैं. 

गांव का साप्ताहिक हाट

कोया आदिवासियों के घर आमतौर पर बांस और लकड़ी से बनाये जाते हैं, जिसपर मिट्टी का लेप किया जाता है. घर के ऊपर छप्पर होता है. आमतौर पर बांस या लकड़ी से घर के आंगन की बाड़ बनाई जाती है. जबनपल्ली गांव में ज़्यादातर घर कच्चे हैं, हालांकि अब कुछ लोगों को सरकारी मदद मिली है और उन्होंने पक्के मकान बनाने शुरू किये हैं. घरों के पास ही सूअर का बाड़ा होता है. यहां के कुछ आदिवासी गाय भी पालते हैं. गांव में एक पेड़ के नीचे कई पत्थर गाड़े गये हैं. दरअसल ये पत्थर कोया आदिवासी अपने परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु के बाद उसकी याद में लगाते हैं. 

कोया आदिवासियों में पत्थरगड़ी की परंपरा रही है

इन पत्थरों के बारे में गांव के प्राइमरी टीचर देवा मड़कामी बताते हैं कि पहले से ही उनके गांव में परिवार के सदस्य की मृत्यु के बाद पत्थर गाड़ने की प्रथा है. लेकिन आजकल लकड़ी भी गाड़ते हैं. लकड़ी को इंसान की शक्ल में डिज़ाइन करके लगाया जाता है. लेकिन अभी भी ज़्यादातर लोग पत्थर ही गाड़ते हैं.

कोया आदिवासियों की कुल व्यवस्था  

कोया आदिवासियों का समाज कुटुम्ब के लिहाज़ से पांच हिस्सों में बंटा है – कोवासी, ओदी, मडकाम, माडी और पडियम. कोया आदिवासियों में कुटुम्ब के भीतर शादी नहीं होती. यानि कोई कोवासी लड़का कोवासी लड़की से शादी नहीं कर सकता. शादी की बात करें तो कोया आदिवासियों में कई तरह से शादी होती है.

लेकिन इन आदिवासियों में सबसे पहली और प्रचलित विधि है पेंडुल. इस तरीक़े में दुल्हन चुनने का हक़ कोया लड़के के मामा या बुआ की बेटी को दिया जाता है. शादी की बातचीत आमौतर पर लड़के के परिवार की तरफ़ से शुरू की जाती है. इसके अलावा लड़के का परिवार लड़की के परिवार को भेंट भी देता है. भेंट में गाय, सूअर या रुपया पैसा कुछ भी दिया जा सकता है.

आमतौर पर यह सब परिवार की हैसियत के हिसाब से तय होता है. दूसरा तरीक़ा है करसू पेंडुल. इस तरीक़े में लड़का अपनी पसंद की लड़की को अपने मित्रों की मदद से लेकर खेत में भाग जाता है. बाद में मां-बाप की सहमति से शादी होती है. लेकिन लड़के को लड़की के परिवार को भारी मुआवज़ा देना होता है.

तीसरा तरीक़ा है लोन उडी वाता. इस विधि में लड़की अपनी पसंद के लड़के के घर आ जाती है, और अपने घर जाने से इंकार कर देती है. इस तरह के मामले में लड़के का परिवार लड़की के परिवार को भेंट देने की रस्म से लगभग बच ही जाता है.

कोया आदिवासियों का एक घर

कोया आदिवासियों पर अपनी पीएचडी करने वाले एक स्कूल के प्रिंसिपल प्रभात कुमार सुतार ने इस सिलसिले में एक किस्सा सुनाया. वो अपने गाइड के साथ मलकानगिरी के एक कोया गांव में फील्ड स्टडी के लिए गए थे. शाम को गांव में कुछ कार्यक्रम था. यहां प्रभात कुमार ने एक कोया लड़की का हाथ पकड़ लिया.

यह देखकर लड़की के परिवार ने प्रभात कुमार को पकड़ लिया. परिवार का कहना था कि कोया परंपरा के हिसाब से प्रभात कुमार को इस लड़की से शादी करनी होगी. उन्होंने परिवार से माफ़ी मांगी और बताया कि वो शादी नहीं कर सकते क्योंकि वो तो पहले से ही शादीशुदा थे. 

किसी तरह से उनके गाइड ने गांव के बुज़ुर्गों से बात करके मामला रफ़ा-दफ़ा कराया. हालांकि इसके लिए उन्हें एक सुअर और शराब जुर्माने के तौर पर लड़की के परिवार को देना पड़ा था.

कोया आबादी में नेगेटिव ग्रोथ

1970 के दशक के बाद कोया आदिवासियों के परिवेश, भाषा और समाज में कई तरह के बदलाव तेज़ी से आये. दरअसल, 1970 के दशक में मलकानगिरी ज़िले के आदिवासी इलाक़ों में बांग्लादेश से आये बंगाली, म्यंमार से आये ओडिया और श्रीलंका से आये तमिल शरणार्थियों को बसा दिया गया. अब कोया आदिवासियों की भाषा में इन भाषाओं के शब्द मिल गए हैं, और लगभग एक नई भाषा तैयार हो गई है. 

क कोया मां

ग़ैर आदिवासी आबादी और शरणार्थियों की आबादी बढ़ने से कोया आदिवासियों के परंपरागत संसाधनों पर असर पड़ा है. मसलन सरकार ने उनके पशु चराने की ज़मीन को खेतों में तब्दील करने की अनुमित दे दी. इसके साथ ही जंगल से मिलने वाले उत्पादों में भी इन बाहर से आकर बसे लोगों का हिस्सा हो गया. इस घटना ने आदिवासियों के जीने के पूरे अंदाज़ को ही प्रभावित कर दिया.

अब कोया आदिवासियों का मुक़ाबला कई मायनों में आगे बढ़े हुए समाज से तय था. अभी तक खुद को ज़िंदा रखने तक सीमित समाज पर लगातार दबाव बढ़ता गया. 1975-76 के बाद से सरकार की तरफ़ से कोया आदिवासियों के लिये किए गए सभी प्रयासों में से ज़्यादातर निष्प्रभावी ही नज़र आते हैं. यही वजह है कि कोया आदिवासियों की स्थिति लगातार ख़राब होती गई. 

2011 की जनगणना के हिसाब से मलकानगिरी में कुल कोया आबादी क़रीब एक लाख सैंतालीस हज़ार है. इसमें महिलाओं की तादाद 76,000 से ज़्यादा है, जबकि पुरूषों की तादाद 71,000 है. यानि प्रति एक हज़ार पुरुष कोया आदिवासियों में महिलाओं की संख्या 1072 है. यानि लिंगानुपात के मामले में कोया आदिवासयों का रिकॉर्ड मुख्यधारा कहे जाने वाले समाज से अच्छा है.

लेकिन कोया आदिवासियों में 2011 की जनगणना में नेगेटिव ग्रोथ दर्ज हुई है. इस नेगेटिव ग्रोथ पर कई तरह की चिंताएं भी प्रकट की गई हैं. लेकिन शायद झारखंड के बिरहोर या कई और आदिवासी इलाकों की तरह ही यहां के जनगणना आंकड़ों को ध्यान से समझने की ज़रूरत है. क्योंकि शायद पलायन की वजह से इस जनजाति के आंकड़े सही-सही दर्ज नहीं हो पाते हैं. इसलिये 2001 से 2011 के बीच कोया आदिवासियों की जनसंख्या वृध्दिदर में बीस प्रतिशत की नेगटिव ग्रोथ दर्ज हुई है.

कोया इलाक़ों में स्वाइन फ़्लू

कोया समाज अपनी परंपरागत जानकारी और तकनीक पर काफ़ी भरोसा करता है. लेकिन आदिवासियों के योजनाबध्द विकास में शायद इस तथ्य को नज़रअंदाज़ कर दिया गया. मसलन आज भी कोया आदिवासियों में ये धारणा है कि बीमारियों के लिये ऊपरी ताक़ते ज़िम्मेदार होती हैं. इसलिए इलाज के लिये वो तंत्र-मंत्र का सहारा लेते हैं. इसके अलावा जंगल से मिलने वाली जड़ी बूटियों का इस्तेमाल करते हैं. परंपरागत तरीक़े से इलाज करने वाले को वाडा कहा जाता है.

आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं तक अभी कोया आदिवासियों की पहुंच सीमित है. सितंबर और अक्टूबर 2016 में मलकानगिरी ज़िले में ही 200 से ज़्यादा कोया आदिवासी बच्चों की मौत हो गई. यह ख़बर काफ़ी देर से नैशलन मीडिया तक पहुंची. उसके बाद यहां स्थानीय प्रशासन, राज्य के अधिकारी और केन्द्रीय टीमों का दौरा हुआ था. लेकिन उसके बावजूद यहां के कोया गांवों में कोई स्वास्थ्य सेवाओं की मौजूदगी नज़र नहीं आती है.

बच्चे को झाड़ा देते ओझा

इस घटना के बारे में कोट्स (Council of Analytical Tribal Studies) के प्रोफ़ेसर पीसी महापात्रा कहते हैं कि जब 2016 में कोया आदिवासी बच्चों में बीमारी फैली, तो उस समय स्थानीय प्रशासन ने इन आदिवासियों के सभी सूअर मारकर गांव से दूर ज़मीन में गाड़ दिए. हालांकि अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि बीमारी सुअर से ही फैली थी. 

प्रोफ़ेसर महापात्रा कहते हैं कि इन आदिवासियों की पहुंच स्वास्थ्य सेवाओं तक हो, इसके लिए सही-सही योजना बनाने की ज़रूरत है. इसके साथ ही यह भी समझने की ज़रूरत है कि आदिवासी मान्यताओं के अनुसार अभी भी ये आदिवासी काफ़ी हद तक बीमारी के लिए ऊपरी ताक़तों को ही ज़िम्मेदार मानते हैं. इसलिए इनके इलाक़ों में इनके ही समुदाय के लोगों को वॉलेंटियर या स्वास्थ्य विभाग में काम देकर जागरुकता फैलाना ज़रूरी है. 

केरल में इस तरह के प्रयास आदिवासी इलाक़ों में काफ़ी कामयाब भी रहे हैं. 

कोया आदिवासियों में सरकुलर माइग्रेशन

कोया आदिवासी आज भी जिस आर्थिक मॉडल पर जीता है, वो खुद को ज़िंदा रखने तक सीमित है. देश के ज़्यादातर हिस्सों में आज भी उसका आर्थिक लेन-देन वस्तुओं से होता है. उन आदिवासियों को विशेषज्ञता, प्रतिस्पर्ध्दा और संचय का मॉडल देना शायद समय से पहले अपनी सोच उन पर लादना है. 

कोया शिकार करने वाले या फिर जंगल से खाना जुटाने वाले आदिवासी रहे हैं. कोया आदिवासी एक समय बेहतरीन शिकारी थे. अभी भी जंगली चूहे, गिलहरी, और खरगोश ये आदिवासी चाव से खाते हैं. लेकिन ग़ैर आदिवासी आबादी के बढ़ने से उनकी शिकार की गतिविधियां लगभग ख़त्म हो गई हैं. ये आदिवासी जूम खेती भी करते थे. लेकिन सरकार ने खेती के इस तरीक़े को हतोत्साहित किया.

वक्त के साथ इन आदिवासियों ने स्थाई खेती भी शुरू की है. लेकिन अभी भी बीज, खाद या तकनीक के मामले में ये काफ़ी पिछड़े हैं. गुज़र-बसर के लिये इन आदिवासियों के पास गाय और सूअर जैसे जानवर हैं. हालांकि आदिवासियों के लिये वनाधिकार क़ानून के बाद उनको फिर से जंगल और ज़मीन पर अधिकार मिला है. लेकिन उसके अपेक्षित परिणाम कम-से-कम इन आदिवासियों को अभी तो नहीं मिल रहे हैं.

कोया आदिवासी ऐतिहासिक तौर पर अपने रहने के ठिकाने बदलते रहे हैं. जब भी ऐसा हुआ कि जंगल के किसी हिस्से में जीवन यापन मुश्किल हो जाए, तो ये आदिवासी अपने गांव छोड़कर कहीं दूसरी जगह पर जाकर बस जाते. कई बार इसका कारण बीमारी फैलना भी होता था. लेकिन अब कोया आदिवासी शहरों की तरफ़ पलायन करते हैं. यह पलायन सरकुलर है, यानि ये आदिवासी उन शहरों में बसते नहीं बल्कि कुछ महीन वहां रहने के बाद अपने गांव लौट आते हैं.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here