बिरसा मुंडा की जयंती अब होगा ‘जनजातीय गौरव दिवस’

आदिवासियों के गौरवशाली इतिहास, संस्कृति और उपलब्धियों को मनाने के लिए 15 नवंबर से 22 नवंबर तक एक हफ़्ते चलने वाले समारोह की योजना भी बनाई गई है.

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केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बिरसा मुंडा की जयंती 15 नवंबर को ‘जनजातीय गौरव दिवस’ के रूप में घोषित करने को मंज़ूरी दे दी है.

केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने इस बात की घोषणा करते हुए कहा, “आदिवासियों के गौरवशाली इतिहास, संस्कृति और उपलब्धियों को मनाने के लिए 15 नवंबर से 22 नवंबर तक एक हफ़्ते चलने वाले समारोह की योजना भी बनाई गई है.”

बिरसा मुंडा, 15 नवंबर, 1875 को पैदा हुए थे. छोटा नागपुर के पठार इलाक़े के बिरसा मुंडा एक स्वतंत्रता सेनानी, धार्मिक नेता और लोक नायक थे.

मुंडा आदिवासी समुदाय के बिरसा मुंडा उम्र के साथ ब्रिटिश अत्याचारों के बारे में जागरुक होते गए, और चाईबासा में 1888-1890 के बीच मिशनरी विरोधी और अंग्रेज़ विरोधी गतिविधियों में हिस्सा लिया, और ‘उलगुलान’ नाम से एक आंदोलन शुरू किया.

उन्होंने आदिवासी लोगों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी. इसमें सबसे ज़रूरी थी अक्टूबर 1894 में जब उन्होंने ज़मींदारों द्वारा लिए जा रहे कर की माफी के लिए आदिवासी लोगों को इकट्ठा कर मार्च किया.

उन्होंने देश को ‘अबुआ राज सेटर जाना, महारानी राज टुंडू जाना’ का नारा दिया. इसका मतलब था, ‘रानी के राज्य को खत्म करो, हमारे राज्य का निर्माण करो’.

आदिवासियों की स्वतंत्रता और अधिकारों के लिए लड़ने के अलावा, बिरसा ने एक नए धर्म की स्थापना भी की जिसे बिरसैत कहा जाता है. यह नया धर्म इसाई मिशनरियों द्वारा बड़े पैमाने पर किए जा रहे धर्मांतरण के जवाब में था. 

बिरसैत ने लोगों को एक ईश्वर में विश्वास करना सिखाया. बिरसैत जल्द ही मुंडाओं और उरांवों के बीच लोकप्रिय धर्म बन गया.

‘धरती आबा’ बिरसा मुंडा ने आदिवासियों को अपनी जड़ों की ओर वापस जाने और अपनी परंपराओं का पालन करने के लिए प्रोत्साहित किया.

मार्च 1900 में, अपनी छापामार सेना के साथ अंग्रेजों से लड़ते हुए, मुंडा को चक्रधरपुर के जामकोपई जंगल में गिरफ्तार कर लिया गया. कुछ महीने बाद, 9 जून को, हिरासत में उनकी मौत हो गई. 

जनजातीय गौरव दिवस

15 नवंबर को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने का फ़ैसला इस आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी को सम्मानित करने और युवाओं को उनके बलिदानों के बारे में बताने का एक प्रयास है. कैबिनेट के फ़ैसले के अनुसार, अब यह दिवस हर साल मनाया जाएगा, और आदिवासियों की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण पर ज़ोर दिया जाएगा. 

राज्य सरकारों के साथ संयुक्त रूप से कई गतिविधियों की योजना बनाई गई है. इसमें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासियों के योगदान के अलावा, उनकी सांस्कृतिक विरासत, प्रथाओं, अधिकारों, परंपराओं और उनका खाने को भी बढ़ावा दिया जाएगा. 

सरकार की आदिवासियों के शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका, बुनियादी ढांचे, और कौशल विकास से जुड़ी कल्याणकारी योजनाओं की भी बात होगी. 

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