खुद सड़क बना रहे हैं आदिवासी, इनकी जय जय से पहले सरकार की हाय हाय तो कहिए

गाँव में बिजली नहीं है और लोग पीने के पानी के लिए चुआन पर निर्भर हैं. स्थानीय आबादी को खुद की देखभाल करने के लिए छोड़ दिया जाता है और अक्सर ये लोग सरकारी कल्याणकारी उपायों के लाभ से वंचित रह जाते हैं.

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ओडिशा के कंधमाल जिले के बंदोपंका गाँव के 42 वर्षीय धनेश्वर प्रधान और उनका परिवार एक महीने से एक बड़े ही अहम काम में लगा हुआ है. धनेश्वर और उनके परिवार ने अपने दुर्गम गांव को 6 किलोमीटर दूर केरुबाडी गाँव के यानि एक वाहन योग्य सड़क से जोड़ने के लिए सड़क बनाने का काम किया है.

बंदोपंका एक छोटा और दुर्गम गाँव है जिसमें ज्यादातर कोंध जनजाति के सदस्य रहते हैं. यह गंजम की सीमा से लगे कंधमाल जिले के सुदूर छोर पर है और शायद ही कभी कोई यहाँ दूसरे लोग आते हैं.

धनेश्वर, उनकी पत्नी और चार बच्चे चुपचाप बंदोपंका और केरुबाडी के बीच सड़क का निर्माण कर रहे हैं. उनके बेजोड़ प्रयासों पर किसी का ध्यान नहीं गया होता अगर दो युवा सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस क्षेत्र का दौरा नहीं किया होता.

प्राथमिक विद्यालयों का स्वच्छता सर्वेक्षण लुस्मिन प्रधान और रूपकांता प्रधान को इस गाँव में लेकर गया. लुस्मिन ने कहा, “डेटा इकट्ठा करने के लिए एक गाँव में जाते समय हम जंगल में अपना रास्ता भटक गए. फिर हमने सड़क पर काम कर रहे इस परिवार को देखा.”

सामाजिक कार्यकर्ताओं के मुताबिक केरुबाडी से शुरू होकर परिवार ने पहले ही लगभग 4 किलोमीटर सड़क का निर्माण कर लिया है. बोल्डर को साफ कर दिया है साथ ही बजरी, रेत और मिट्टी से मार्ग भर दिया है.

धनेश्वरी ने कहा, “हमें उम्मीद है कि हम कुछ ही समय में केरुबाडी को अपने गाँव से जोड़ देंगे. अगले 2 किलोमीटर सड़क बनाने पर कम से कम हमारे पास एक काम करने योग्य सड़क होगी.

यह गांव घने जंगलों और पथरीले इलाके में स्थित है. बंदोपंका पहुंचने के लिए पहाड़ी पर चलने के अलावा कोई विकल्प नहीं है क्योंकि यहाँ साइकिल की सवारी भी बहुत मुश्किल है. स्थानीय लोगों के मुताबिक  सरकारी अधिकारी भी उस गांव का दौरा नहीं करते हैं जहां 10 घर हैं और कुल 56 की आबादी है.

इस गांव में सरकार का एकमात्र निशानी प्राथमिक स्कूल था जिसे नीति आयोग के “समेकन और युक्तिकरण” कदम के अनुरूप 20 से कम छात्रों के साथ ओडिशा सरकार की नीति के बाद बंद कर दिया गया था.

स्कूल खुला होने पर भी शिक्षक कभी-कभार ही आते थे क्योंकि जगह पूरी तरह से कटी हुई थी.

गाँव में बिजली नहीं है और लोग पीने के पानी के लिए चुआन पर निर्भर हैं. स्थानीय आबादी को खुद की देखभाल करने के लिए छोड़ दिया जाता है और अक्सर ये लोग सरकारी कल्याणकारी उपायों के लाभ से वंचित रह जाते हैं.

बंदोपंका सब कुछ से वंचित था क्योंकि यह दुर्गम था और धनेश्वर ने ये महसूस किया. उन्होंने कई बार ग्राम पंचायत, ब्लॉक और जिला अधिकारियों से संपर्क किया था. उनसे अनुरोध किया था कि वे एक सड़क का निर्माण शुरू करें जो बंदोपंका को केरुबाडी से जोड़े. लेकिन उनकी दलीलें बहरे कानों पर पड़ीं. 

फिर उन्होंने अपने साथी ग्रामीणों से सड़क बनाने के लिए सामुदायिक कार्य करने को कहा. लेकिन उनका ये विचार किसी को भी पसंद नहीं आयाय

गाँव के निवासी मधुर प्रधान ने कहा कि ग्रामीण इतने गरीब हैं कि वे स्वैच्छिक काम के लिए मजदूरी के दिन नहीं गंवा सकते.

तभी धनेश्वर ने अपने ऊपर जिम्मेदारी ली और अपने परिवार के सदस्यों के साथ काम खत्म करने की ठान ली.

अब सरकार भी इसमें शामिल होना चाहती है. दरिंगबाड़ी प्रखंड विकास अधिकारी कलाकृष्ण प्रधान ने अखबार डाउन टू अर्थ को बताया, “हम धनेश्वर के परिवार के साथ-साथ अन्य ग्रामीणों को शामिल करते हुए महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के माध्यम से सड़क बनाने की योजना बना रहे हैं.” उन्होंने कहा कि उन्हें धनेश्वर की कोशिशों के बारे में जानकारी मिली है.

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