आदिवासी इलाकों में कुपोषण से 411 मौतें, बॉम्बे हाईकोर्ट ने नंदुरबार ज़िला कलेक्टर को तलब किया

सुनवाई के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता बीएस साने खंडपीठ के सामने कहा कि नंदुरबार में कुपोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में बच्चों की मौत का आकड़ा लगातार बढ रहा है. यह आकड़ा 400 के ऊपर पहुंच गया है लेकिन अब तक वहां पर पर्याप्त डाक्टर नहीं उपलब्ध कराए गए है.

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बॉम्बे हाईकोर्ट ने राज्य के अन्य आदिवासी इलाकों सहित नंदुरबार में कुपोषण और मेडिकल सुविधाओं के अभाव में बच्चों की मौत के खुलासे के बाद नंदुरबार के जिलाधिकारी को 23 सितंबर को तलब किया है.

हाईकोर्ट ने पिछली सुनवाई के दौरान नंदुरबार के जिलाधिकारी को वहां पर हुई बच्चों की मौत को लेकर विस्तृत रिपोर्ट देने को कहा था लेकिन कोर्ट के सामने इस विषय पर कोई रिपोर्ट अदालत में नहीं पेश की जा सकी. इसलिए कोर्ट ने नंदुरबार के जिलाधिकारी को अगली सुनवाई के दौरान कोर्ट में हाजिर रहने का निर्देश दिया.

इससे पहले कोर्ट को बताया गया कि जनवरी 2022 से अब तक आदिवासी इलाकों में कुपोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में 400 से अधिक लोगों की मौत हुई है इसमें से 86 बच्चों की मौत नंदुरबार में हुई है.

चीफ जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एम. एस. कार्णिक राज्य के आदिवासी क्षेत्रों में कुपोषण के कारण कई बच्चों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं की मृत्यु से संबंधित 2007 में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहे थे.

सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने कहा कि मामले को लेकर हमारे सामने आधी-अधूरी जानकारी पेश की गई है. इससे हम संतुष्ट नहीं है. हम सरकार से बेहतर हलफनामे की अपेक्षा रखते है. साथ ही कोर्ट ने मेलघाट इलाके में आदिवासी इलाके में रह रहे लोगों की दिक्कतों को लेकर सरकार की ओर से उठाए गए कदमों को लेकर असंतोष व्यक्त किया.

इस दौरान सामाजिक कार्यकर्ता बीएस साने खंडपीठ के सामने कहा कि नंदुरबार में कुपोषण और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में बच्चों की मौत का आकड़ा लगातार बढ रहा है. यह आकड़ा 400 के ऊपर पहुंच गया है लेकिन अब तक वहां पर पर्याप्त डाक्टर नहीं उपलब्ध कराए गए है.

उन्होंने यह भी प्रस्तुत किया कि क्षेत्र में उचित सड़कें नहीं हैं, जो मेडिकल देखभाल तक पहुंच की समस्या को बढ़ा देती हैं. साने ने कोर्ट के समक्ष जिले में बच्चों के स्वास्थ्य और मातृ स्वास्थ्य के संबंध में रिपोर्ट प्रस्तुत की.

जनजातीय क्षेत्रों के विकास के लिए नीतियां बनाने में सरकार की सहायता करने के उद्देश्य से अध्ययन समूह द्वारा रिपोर्ट तैयार की गई. रिपोर्ट में कहा गया कि मौतों का कारण बनने वाली अधिकांश स्थितियों को रोका जा सकता है या आसानी से इलाज किया जा सकता है. हालांकि, क्षेत्र में स्वास्थ्य कार्यक्रमों को ठीक से लागू नहीं किया गया, जिसके परिणामस्वरूप बच्चों की मृत्यु में वृद्धि हुई.

इससे पहले खंडपीठ ने आदिवासी इलाकों में डाक्टरों की नियुक्ति न किए जाने को लेकर भी नाराजगी जाहिर की. कोर्ट ने कहा कि जिस तरीके से न्यायिक सेवा में न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर समय पर कदम उठाए जाते है वैसे ही डाक्टरों की नियुक्ति को लेकर वक्त पर पहल की जानी चाहिए.

दरअसल, कोर्ट ने 17 अगस्त, 2022 को कलेक्टर को इस मामले में हलफनामा दाखिल करने का भी निर्देश दिया। हालांकि कोई हलफनामा दाखिल नहीं किया गया. इसलिए अदालत ने कलेक्टर को 23 सितंबर, 2022 को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का निर्देश दिया.

कोर्ट ने स्वास्थ्य सेवा निदेशक को 21 सितंबर, 2022 से पहले इस मुद्दे के बारे में एक व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत करने का भी निर्देश दिया.

दरअसल, हाल ही में महाराष्ट्र में कुपोषण से होने वाली मौतों पर परस्पर विरोधी जानकारी विधानसभा से सामने आई थी. आदिवासी विकास मंत्री विजय कुमार गावित ने दावा किया था कि राज्य में कुपोषण के चलते किसी बच्चे की मौत नहीं हुई है. उनका कहना था कि बच्चों की मौत दूसरी बीमारियों के चलते हुई.. और बच्चों में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होने के चलते उन्हें बीमारियां हुईं और उनकी मौत हो गई.

जबकि महिला एवं बाल विकास मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा ने स्वीकार किया था कि कुपोषण से होने वाली मौतें सिर्फ महाराष्ट्र तक ही सीमित नहीं है. वहीं कांग्रेस विधायक कुणाल पाटिल ने कहा कि राज्य के आदिवासी आबादी वाले 16 ज़िलों में पिछले पांच वर्षों में कुपोषण के कारण 8,842 बच्चों की मौत हुई है.

आदिवासी इलाक़ों मे स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाले ज़्यादातर संगठन यही कहते हैं कि यहां पर बीमारी की असली जड़ कुपोषण और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी है. जिसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने जनवरी महीने में इस तरह के संगठनों की जनहित याचिका में दिए गए तथ्यों के आधार पर आदिवासी इलाक़ों में कुपोषण को गंभीर मुद्दा माना था.

सरकार को आदिवासी इलाक़ों में बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं के लिए हाईकोर्ट से लगातार फ़टकार लगाती रहती है.. बावजूद इसके इन इलाकों के हालात जस के तस हैं. कुछ दिन पहले ही एक आदिवासी महिला ने जंगल में बच्चे को जन्म दिया. क्योंकि गांव तक पक्की सड़क संपर्क नहीं है, इसलिए उसके परिवार और गांव के लोग रात तीन बजे डोली यानि बांस में कपड़ा बांध कर अस्पताल ले जा रहे थे.

इस महिला को ले जा रहे लोग करीब 5 किलोमीटर का रास्ता तय कर चुके थे. लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले ही इस महिला ने जंगल में एक बच्ची को जन्म दे दिया.

इससे पहले मुंबई से क़रीब 115 किलोमीटर दूर पालघर ज़िले में एक गर्भवती औरत को अस्पताल तक नहीं पहुँचाया जा सका था. क्योंकि उसके गाँव तक सड़क नहीं है इसलिए वहाँ एंबुलेंस नहीं जाती है. लोगों ने चादर और बांस की डोली बना कर इस महिला को अस्पताल तक पहुँचाने की कोशिश की थी. लेकिन जब तक उसे अस्पताल पहुँचाया जाता तब काफ़ी देर हो चुकी थी. इस देरी की वजह से उसके नवजात जुड़वां बच्चों की मौत हो गई थी.

आदिवासी औरत के जुड़वां बच्चों की मौत के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने सरकार को आदेश दिया था कि आदिवासी इलाकों में गर्भवती महिलाओं और नवजात बच्चों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं और दूसरी सुविधाएं पहुंचाने के इंतज़ाम किए जाए. बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि पिछले दो दशक से इस अदालत ने आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने के जो आदेश दिए हैं उनका पालन नहीं हुआ है.

अदालत में सरकार ने यह दावा किया कि अदालत के आदेश के अनुसार आदिवासी इलाकों में अस्पताल, डॉक्टर्स और दवाइयों का इंतज़ाम किया गया है. जबकि सामाजिक कार्यकर्ताओं की तरफ से अदालत को सूचित किया गया है कि अभी भी आदिवासी इलाकों में महिला डॉक्टर, बच्चों के डॉक्टर अस्पतालों में पहुंचते ही नहीं है.

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