16 साल बाद स्कूल खुले हैं छत्तीसगढ़ के इस नक्सल प्रभावित क्षेत्र में- प्रशासन का दावा

2004, 2005 में बस्तर में माओवादियों के खिलाफ सलवा जुडूम के उदय के बाद, नक्सलियों ने बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा, नारायणपुर के अंदरूनी इलाकों में स्कूल भवनों को निशाना बनाया. इस संघर्ष के दौरान, बीजापुर में 300 से अधिक स्कूल नष्ट कर दिए गए.

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जिला प्रशासन ने दावा किया है कि सोलह साल की लंबी कोशिश के बाद छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के नक्सल प्रभावित गांवों में स्कूल खोले गए हैं. न्यूज एजेंसी ANI से बात करते हुए बीजापुर के जिला कलेक्टर, रितेश अग्रवाल ने कहा, “पिछले 15-16 वर्षों में नक्सलियों द्वारा कई स्कूल नष्ट किए गए. इस साल 116 स्कूल खोले जाएंगे, जिससे 2800 से अधिक बच्चे लाभान्वित होंगे. पेड्डा जोजर, चिन्ना जोजर और कामकानार बीजापुर के गांवों बच्चों को अब शिक्षा मिल सकेगी.”

जिला कलेक्टर ने आगे बताया कि प्रशासन को सड़कों के निर्माण के दौरान नक्सलियों से रुकावट का सामना करना पड़ा क्योंकि इस प्रक्रिया में कई सुरक्षाकर्मी मारे गए थे. खंड शिक्षा अधिकारी (BEO) जाकिर ख़ान ने कहा, “सबसे मुश्किल हिस्सा ग्रामीणों के साथ बातचीत स्थापित करना है. सरकार ने एक नेटवर्क बनाने का फैसला किया है ताकि छात्रों को शिक्षा का अधिकार मिल सके. आज 14 स्कूलों में 900 छात्र नामांकित हैं.”

एक छात्रा नेहा ने ANI को बताया, “हम पहले सिर्फ गोंडी भाषा जानते थे लेकिन अब हिंदी बोल सकते हैं. शिक्षक हर दिन आ रहे हैं. स्कूल प्रशासन हमें किताबें और स्कूल ड्रेस उपलब्ध करा रहा है.”

शिक्षकों को रोजाना स्कूल पहुंचने के लिए नदी से होकर गुजरना पड़ता है. तमाम हंगामे के बावजूद छात्रों ने बताया कि शिक्षकों ने एक भी क्लास मिस नहीं की है.

बीईओ ख़ान ने कहा, “2004, 2005 में बस्तर में माओवादियों के खिलाफ सलवा जुडूम के उदय के बाद नक्सलियों ने बीजापुर, दंतेवाड़ा, सुकमा, नारायणपुर के अंदरूनी इलाकों में स्कूल भवनों को निशाना बनाया. इस संघर्ष के दौरान बीजापुर में 300 से अधिक स्कूल नष्ट कर दिए गए. इनमें पेड्डा जोजर भी शामिल है. चिन्ना जोजेर, कामकानार गांव, जहां माओवादियों ने स्कूलों को निशाना बनाया.”

30 साल बाद 10 अगस्त को बीजापुर के नक्सल बहुल तारेम गांव को बिजली, अपना प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC), एक स्कूल, बिजली कनेक्शन, सड़क समेत अन्य नागरिक सुविधाएं मिलीं. राजधानी रायपुर से 500 किलोमीटर से अधिक दूर तर्रेम गांव के निवासी बुनियादी सुविधाओं से वंचित थे क्योंकि यह क्षेत्र 1980 के बाद नक्सली हिंसा का शिकार हो गया था. अब इसमें प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, आंगनवाड़ी केंद्र, एक राशन की दुकान और सड़कें हैं.

नक्सलियों द्वारा की गई हिंसा के कारण कई ग्रामीणों को अपने मूल स्थानों से पलायन करना पड़ा. 3 अप्रैल 2021 को तेकुलागुडेम और जोनागुडा के जंगल में जो तारेम गाँव से केवल 10-12 किलोमीटर दूर है, नक्सलियों के साथ मुठभेड़ में 22 सैनिक मारे गए और 31 घायल हो गए.

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