प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टर ने आदिवासी गांव को बनाया अपना दूसरा घर

तेंगुमरहड़ा एक आदिवासी गांव है, जो नीलगिरी पहाड़ियों की उत्तरी ढलानों पर मोयार नदी के तट पर स्थित है. यहां के लोग कहीं आने-जाने के लिए छोटी-छोटी नावों पर निर्भर हैं. उन्होंने कई बार मोयार नदी पर पुल बनाने की अपील की है, लेकिन यह अब तक अनसुनी ही रही हैं.

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कोविड महामारी ने पिछले डेढ़ साल में लगभग सभी व्यवसाय के लोगों की कमर तोड़ दी है, लेकिन यह समय शायद सबसे चुनौतीपूर्ण रहा है डॉक्टरों और दूसरे स्वास्थ्य कर्मियों के लिए.

कोविड के चलते पीपीई किट पहनना, और लगातार चौबीस घंटों की शिफ्ट मेडिकल स्टाफ़ के लिए आम बन गई हैं.

तमिलनाडु के सुदूर तेंगुमरहड़ा गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) में तैनात 27 साल के डॉक्टर एन अरुण प्रसाद की दिनचर्या भी कुछ ऐसी ही है. कोविड ने उन्हें इतना व्यस्त कर दिया कि उन्हें घर जाना ही छोड़ना पड़ा.

तेंगुमरहड़ा एक आदिवासी गांव है, जो नीलगिरी पहाड़ियों की उत्तरी ढलानों पर मोयार नदी के तट पर स्थित है. यहां के लोग कहीं आने-जाने के लिए छोटी-छोटी नावों पर निर्भर हैं. उन्होंने कई बार मोयार नदी पर पुल बनाने की अपील की है, लेकिन यह अब तक अनसुनी ही रही हैं.

तेंगुमरहड़ा का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र चार आदिवासी बस्तियों कल्लमपालयम, हल्लीमोयार, चितिरमपट्टी और पुदुकाडु के लिए काम करता है. और डॉक्टर अरुण प्रसाद इसका प्रबंधन करते हैं.

डॉक्टर प्रसाद कोयंबत्तूर के रहने वाले हैं, और पहले वो हर दो हफ़्ते में एक बार अपने घर जाते थे. लेकिन जब से कोविड की दूसरी लहर शुरु हुई है, उन्होंने अपनी साप्ताहिक छुट्टी छोड़ दी और अब तेंगुमरहड़ा में ही रहते हैं.

शुरुआत में इलाक़े के आदिवासियों के लक्षण मौसमी बुखार की तरह थे, लेकिन फिर कई लोगों में कोविड के लक्षण दिखे. जब कोविट टेस्ट के लिए उनके सैम्पल लिए गए, तो कई आदिवासियों में यह बीमारी पाई गई.

फ़िलहाल गांव में 13 एक्टिव केस हैं. डॉक्टर अरुण अब घर-घर जाकर बुखार की जांच करते हैं, और इन आदिवासियों को कोविड वैक्सीन लेने के लिए राज़ी कर रहे हैं.

पहली लहर के दौरान, अरुण ने संक्रमण को दूर रखने के लिए एक भी दिन के ब्रेक के बिना लगभग छह महीने लगातार काम किया था.

वो अपने परिवार के सदस्यों से फ़ोन पर संपर्क रखते थे, और एक दूसरे के बारे में अपडेट लेते रहते थे. लेकिन वीडियो कॉलिंग मुश्किल थी, क्योंकि कई आदिवासी गांवों की तरह ही इस आदिवासी गांव में भी इंटरनेट कनेक्टिविटी ख़राब है.

डॉक्टर अरुण ने कलेक्टर जे इनोसेंट दिव्या, स्वास्थ्य सेवाओं के उप निदेशक पी बालूसामी और स्वास्थ्य विभाग के सदस्यों की मदद को स्वीकारा, और कहा कि सबके निरंतर प्रयास से आदिवासियों को सुरक्षित रखा जा रहा है.

ढाई महीने से ज़्यादा लगातारा काम करने के बाद, डॉक्टर अरुण ने शनिवार को एक दिन की छुट्टी ले ही ली.

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