कभी गवाह मुकरे, कभी वकील बदले, आदिवासी परिवार को अभी भी इंसाफ़ का है इंतज़ार

आदिवासियों और कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए कई कानून हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर केवल कागजों पर ही हैं

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2018 के केरल के एक आदिवासी युवक के लिंचिंग के मामले में एक और गवाह के मुकरने के एक दिन बाद, मृतक के परिजनों ने रविवार को आरोप लगाया कि अधिकारियों द्वारा की गई अत्याधिक देरी और उनके कामचलाउ रवैये ने मामले को कमजोर कर दिया है.

28 साल के मानसिक रूप से विकलांग आदिवासी युवक, मधु को पीट-पीट कर मार डाला गया था. घटना केरल के पालक्काड ज़िले के अट्टपाड़ी की है, जहां स्थानीय लोगों ने एक दुकान से खाद्य सामग्री चोरी करने के आरोप में मधु को पीट-पीट कर मार डाला.

मामले में अब तक नौ गवाह मुकर चुके हैं, और दो सरकारी वकील बदले जा चुके हैं.

शनिवार को मण्णारक्काड की विशेष अदालत में मामले के 19वें गवाह कक्की मूपन मुकर गए. मूपन ने कहा कि उनका पिछला बयान पुलिस के दबाव में दिया गया था. मूपन ने यह भी कहा कि उन्होंने मधु के साथ मारपीट होते हुए नहीं देखा, और पुलिस ने उन्हें ऐसा कहने के लिए मजबूर किया.

मृतक की मां वी मल्ली ने आरोप लगाया कि मामले को शुरू से ही कमजोर करने की कोशिश की जा रही है. “अगर सुनवाई तेजी से होती तो ऐसा नहीं होता. सभी आरोपी ज़मानत पर बाहर हैं, और उन्हें गवाहों को प्रभावित करने का समय मिल रहा है. कुछ गवाहों ने अपना बयान बदलने की धमकी भी दी है,” उन्होंने कहा.

उन्होंने यह भी कहा कि एक आरोपी ने उनसे संपर्क भी किया और मामला आगे न बढ़ाने की धमकी दी. पुलिस ने मुख्य आरोपियों में से एक, एम अब्बास के खिलाफ मल्ली की शिकायत पर पिछले हफ्ते ही मामला दर्ज किया है.

“हमारे परिवार के लोग भी हमसे कह रहे हैं कि केस से मधु तो वापस नहीं आएगा, तो आप परिवरा के दूसरे लोगों का जीवन क्यों खराब करना चाहता हूं. मैं मानती हूं कि आदिवासी जीवन भी मायने रखता है. हमें न्याय चाहिए,” मल्ली ने कहा.

मल्ली का कहना है कि मामला कमज़ोर होता जा रहा है, लेकिन अधिकारी अपनी आंखें मूंदे बैठे हैं. गवाहों को प्रभावित करने के लिए धन, बाहुबल और राजनीतिक दबाव का इस्तेमाल किया जा रहा है.

दलित कार्यकर्ता धन्या रमन कहती हैं कि आदिवासियों और कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए कई कानून हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर केवल कागजों पर ही हैं. कानून विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक़ मुकदमे में देरी महामारी की वजह से हुई, और सरकार मामले में न्याय सुनिश्चित करेगी.

मधु की ऑटोप्सी रिपोर्ट में पुष्टि हुई थी कि भीड़ के हमले में उन्हें गंभीर आंतरिक चोटें दीं, जिसकी वजह से उनकी मौत हुई. कुछ आरोपियों ने एक पेड़ से बंधे हुए खून से लथपथ मधु के साथ सेल्फी भी पोस्ट की थी.

मधु की मौत से आक्रोश फैला और सरकार ने एक विशेष जांच दल का गठन किया. जांच दल ने 16 आरोपियों के खिलाफ छह महीने में चार्जशीट दायर की. हत्या के अलावा उन पर एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 के तहत आरोप लगाए गए.

मधु की माँ ने पुष्टि की कि उनका बेटा मानसिक बीमारी से पीड़ित था और कई सालों से परिवार से दूर रह रहा था. उन्होंने कहा कि मधु कभी-कभी ही खाने का सामान लेने के लिए जंगलों से बाहर निकलता था, और जैसा भीड़ ने आरोप लगाया, वह चोर नहीं था.

2019 में, सरकार ने वीटी रघुनाथ को सरकारी वकील नियुक्त किया, लेकिन बाद में उन्होंने पद छोड़ दिया और एक दूसरे वकील सी राजेंद्रन को नियुक्त किया गया. कई गवाहों के मुकर जाने के बाद मधु की मां ने हाई कोर्ट का रुख किया तो पिछले महीने राजेंद्रन का भी तबादला कर दिया गया.

राजेंद्रन के बदले अदालत ने एक नए सरकारी वकील राजेश एम मेनन को नियुक्त किया. उन्होंने कहा है कि गवाहों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी.

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