केरल में कई जगह भारी बारिश से बाढ़, आदिवासियों को नहीं है कोई डर

उनकी बस एक ही चिंता है कि वो बारिश की वजह से वनोपज इकट्ठा करने घने जंगलों में नहीं जा पा रहे हैं. इनमें से कई आदिवासियों ने कभी 'राहत शिविर' के बारे में सुना तक नहीं है.

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केरल के पतनमतिट्टा ज़िले में जब भी आसमान में काले बादल छाते हैं, तो मज़बूत और कंक्रीट के घरों के अंदर रहने वाले लोग भी डर जाते हैं. राज्य में आजकल कई इलाक़े भारी बारिश और उसकी वजह से आई बाढ़ से जूझ रहे हैं.

लेकिन ज़िले में कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्हें प्लास्टिक और तिरपाल की चादरों से बने घरों में रहने के बावजूद भारी बारिश का डर नहीं है. यह हैं ज़िले के घने जंगलों में रहने वाले मलमपंडारम आदिवासी.

उनकी बस एक ही चिंता है कि वो बारिश की वजह से वनोपज इकट्ठा करने घने जंगलों में नहीं जा पा रहे हैं. इनमें से कई आदिवासियों ने कभी ‘राहत शिविर’ के बारे में सुना तक नहीं है.

मूझियार में मलमपंडारम आदिवासी, 23 साल के रेजी ने न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में कहा, “मैं बचपन से भारी बारिश देख रहा हूं. हालांकि हम प्लास्टिक की चादर के नीचे रहते हैं, हममें से किसी को भी बारिश का डर नहीं है. हम जंगल के अंदर पहाड़ी इलाकों में रहते हैं और वहां बाढ़ का ख़तरा नहीं है. हमारे सामने एक ही ख़तरा है – भूस्खलन. लेकिन हमने अभी तक इसकी बड़ी घटना नहीं देखी है. अगर हमारे गांव में छोटे-छोटे भूस्खलन होते भी हैं, तो उससे हम आसानी से पार पा लेते हैं.”

उन्होंने यह भी बताया कि पहले भारी बारिश के दौरान बस्ती में कभी-कभी पेड़ उखड़ जाते थे, तो यह आदिवासी उन पेड़ों को तुरंत हटा देते थे. यह लोग आजीविका के लिए मुख्य रूप से वनोपज पर निर्भर हैं, और बरसात के मौसम में इनके लिए जंगल के अंदर जाना संभव नहीं होता, और यही उनकी परेशानी का सबसे बड़ा सबब है.

भारी बारिश के दौरान यह लोग बस्ती से बाहर नहीं जाते. पिछले कुछ सालों में इनके हालात थोड़े बदले भी हैं.  वनोपज इकट्ठा करने के लिए अब मुख्य रूप से बस्तियों के बड़े ही जंगल जाते हैं. इस आदिवासी समुदाय के कई युवा राज्य सरकार की मदद से पास के कक्की-अनतोडु बांध में मछली पालन में लगे हुए हैं. इस परियोजना के तहत समुदाय के कम से कम 100 सदस्यों को नौकरी मिलने की उम्मीद है.

25 लोग फ़िलहाल एस योजना के तहत काम कर रहे हैं. इस काम के लिए इन्हें हर रोज़ 400 रुपये मिलते हैं, जो इनके लिए बहुत मददगार है. भारी बारिश के दौरान, मलमपंडारम लोग अपना समय गांव में ही बिताते हैं, और आदिवासी विभाग द्वारा दिए जा रहे राशन से गुज़र-बसर करते हैं. विभाग हर महीने किराने के सामान के अलावा 15 किलो चावल भी इन्हें देता है.

मुझियार के अनुसूचित जनजाति प्रमोटर कोचुमोन ने बताया कि मलमपंडारम आदिवासी जंगल के अंदर रहने के आदि हैं, और जब पहाड़ी इलाकों और जंगल में भारी बारिश होती है तो उन्हें डर नहीं लगता.

मलमपंडारम आदिवासियों की बाहरी दुनिया से मेलजोल रखने में दिलचस्पी नहीं है. यह अपना जीवन जंगलों के अंदर बिताना ही पसंद करते हैं. हालांकि सरकार धीरे-धीरे उन्हें बाहरी दुनिया के संपर्क में लाने की कोशिश कर रही है.

जनजातीय विभाग के आंकड़ों के अनुसार 252 मलमपंडारम परिवार पतनमतिट्टा ज़िले में रहते हैं, और उनमें से 92 परिवार अभी भी जंगल के अंदर खानाबदोश जीवन जीते हैं. मलमपंडारम परिवार मुख्य रूप से मंजतोडु, मूझियार और प्लापल्ली इलाक़ों में रहते हैं.

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