केरल: कोविड की दूसरी लहर से आदिवासियों को बचाने के लिए ख़ास इंतज़ाम

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केरल में कोविड-19 की दूसरी लहर से आदिवासियों को बचाने के लिए सरकार दोहरे प्रयास कर रही है. इसके लिए जंगलों और उसके आसपास के क्षेत्रों में बाहरी लोगों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया है.

मंगलवार तक 4.84 लाख की कुल आदिवासी आबादी में से 4439 व्यक्ति कोविड पॉज़िटिव पाए गए थे. इनमें से सबसे ज़्यादा वायनाड में 1,437 थे, और उसके बाद कासरगोड में 1,155 मामले दर्ज किए गए.

पालक्काड ज़िले में प्रतिबंधों से अच्छे परिणाम दिख रहे हैं, जहां सिर्फ़ 82 लोग संक्रमित हुए. ज़िले में 48.97 हज़ार लोगों के साथ राज्य की तीसरी सबसे बड़ी आदिवासी आबादी है. इनमें से अब तक 56 लोगों की कोविड की वजह से जान जा चुकी है.

एक वरिष्ठ अधिकारी ने एक अखबार को बताया कि अनुसूचित जनजाति विकास विभाग (Scheduled Tribes Development Department  – STDD) ने कोविड की पहली लहर के दौरान ही हस्तक्षेप शुरू कर दिया था.

एसटीडीडी, स्वास्थ्य विभाग और ज़िला प्रशासन द्वारा एक साथ मिलकर प्रयास किए जा रहे हैं. आदिवासी समुदाय खुद भी काफ़ी सावधानी बरत रहे हैं.

कई जगहों पर निवासियों ने खुद ही बाहरी लोगों की आवाजही पर प्रतिबंध लगा दिया है.

इसके अलावा STDD और ज़िला प्रशासन युद्धस्तर पर आदिवासी समुदाय के लोगों का टीकाकरण कर रहे हैं. अब तक 18,000 से ज़्यादा आदिवासियों को टीका लगाया जा चुका है.

वैक्सीन लेने वाले आदिवासियों की सबसे बड़ी संख्या वायनाड में है, जहां 10,079 लोगों को अब तक टीका लग चुका है. कोट्टयम में 991 और इडुक्की में 655 लोगों को टीका लगाया गया है.

अधिकारियों का कहना है कि पालक्काड और इडुक्की में टीकाकरण अभियान तेज़ी से आगे बढ़ रहा है.

जागरुकता अभियान और विशेष शिविरों ने वायनाड में टीकाकरण की संख्या बढ़ाने में मदद की है. टीकाकरण शिविरों का आयोजन आदिवासी बस्तियों के आसपास किया गया, और ज़रूरतमंद लोगों के लिए वाहनों की व्यवस्था की गई.

राज्य सरकार इस बात पर भी ख़ास ध्यान दे रही है कि संक्रमित आदिवासियों को रूरत के हिसाब से कोविड-19 फ़र्स्ट लाइन ट्रीटमेंट सेंटर या अस्पतालों में भर्ती कराया जाए.

एसटीडीडी महामारी के शुरु होने के बाद से ही बड़े आदिवासी परिवारों को अतिरिक्त मात्रा में खाद्यान्न और प्रावधानों की आपूर्ति कर रहा है. सरकार की कोविड मुफ्त भोजन किट की आपूर्ति राशन कार्ड वाले परिवारों को की जाती है.

ऐसे में बड़े परिवारों को भी महीने में सिर्फ़ एक ही किट मिलती है. इसीलिए बड़े आदिवासी परिवारों को अतिरिक्त खाद्यान्न दिए जा रहे हैं.

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