ल्यूकेमिया से पीड़ित इस शख्स ने छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में शत-प्रतिशत कोविड टीकाकरण अभियान चलाया

दूर-दराज के आदिवासी क्षेत्रों में तैनात, उन्होंने ग्रामीण जनता के बीच जागरूकता पैदा करने का मुश्किल काम किया और कोविड-19 वैक्सीन को लेकर हिचकिचाहट को दूर करने के लिए कड़ी मेहनत की.

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लोगों को जीवन में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. लेकिन वे उन्हें कैसे संभालते हैं जो यह दर्शाता है कि वे किस चीज से बने हैं! ऐसा ही एक उदाहरण संतोष घोष हैं.

ल्यूकेमिया से पीड़ित होने के बावजूद, इस ग्रामीण चिकित्सा आयोजक ने छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में कोविड-19 के खिलाफ अपनी लड़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ी है.

उनका जीवन मुश्किलों से जूझने की कहानी रहा है. जब वह किशोर थे तब उन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया और एक अभिभावक के रूप में अपने भाई-बहनों की देखभाल करते हुए बड़े हुए. लेकिन असल में वह किस चीज से बने हैं यह महामारी की दूसरी लहर के दौरान स्पष्ट हो गया.

दूर-दराज के आदिवासी क्षेत्रों में तैनात, उन्होंने ग्रामीण जनता के बीच जागरूकता पैदा करने का मुश्किल काम किया और कोविड-19 वैक्सीन को लेकर हिचकिचाहट को दूर करने के लिए कड़ी मेहनत की.

संतोष घोष के प्रयासों से क्षेत्र ने दोनों खुराकों के साथ शत-प्रतिशत टीकाकरण को पूरा कर लिया है. हैरानी की बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग में कई लोगों को यह नहीं पता था कि वह ब्लड कैंसर के मरीज हैं, जिसके इलाज के लिए उन्हें मुंबई जाना पड़ता है.

दो बच्चों के पिता घोष कहते हैं, “मुझे अपने माता-पिता के संस्कार विरासत में मिले हैं. उन्हें खोने के बाद मैं बिखर गया था, लेकिन हिम्मत जुटानी पड़ी क्योंकि मुझे अपने छोटे भाई और बहन की देखभाल करनी थी. अपनों को खोने का दर्द मैं समझता हूं. इसलिए मैंने यह सुनिश्चित करने के लिए खुद को समर्पित करने का फैसला किया कि टीकाकरण अभियान शुरू होने पर कोई गरीब या आदिवासी समुदाय के सदस्य छूटे नहीं.”

संतोष घोष गांवों तक पहुंचने के लिए पहाड़ी और जंगली इलाकों से रोजाना 3-4 किलोमीटर का सफर तय करते थे. इनमें से कुछ आदिवासी गांवों में शायद ही कभी कोई आगंतुक आया हो. वे कहते हैं, “उन्हें टीका लगवाने के लिए राजी करना आसान नहीं था.”

घोष के समर्पण ने उन्हें आदिवासी समुदायों के बीच एक लोकप्रिय व्यक्ति बना दिया जो उन पर भरोसा करने लगे. रायगढ़ के आदिवासी प्रखंड धर्मजयगढ़ के अनुविभागीय दंडाधिकारी संबित मिश्रा का कहना है कि उदाहरण पेश करते हुए उन्होंने (संतोष घोष) स्थानीय लोगों को आश्वस्त किया कि जब उनके जैसा कैंसर रोगी टीका लगवा सकता है तो उन्हें इससे क्यों डरना चाहिए.

कोविड-19 टीकाकरण अभियान के दौरान संतोष घोष ने स्थानीय सरपंच, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, शिक्षकों और गांव के बुजुर्गों से मिलकर एक कोर टीम बनाई.

उन्होंने उनकी आशंकाओं को सुना और फिर उन्हें प्रेरित किया. धीरे-धीरे इस अभियान ने गति पकड़ी और अधिक से अधिक ग्रामीण टीका लगवाने के लिए आगे आने लगे. महीनों की मशक्कत के बाद संतोष घोष और उनकी टीम को अपने उद्देश्य का एहसास हुआ.

(यह लेख The New Indian Express में छपा है)

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