रिपोर्ट: लॉकडाउन से 95 प्रतिशत आदिवासी बच्चों की शिक्षा ठप, पोषण पर भी हुआ असर

शहरी इलाक़ों में 24 प्रतिशत और ग्रामीण इलाक़ों में सिर्फ़ 8 प्रतिशत छात्र ही नियमित रूप से ऑनलाइन पढ़ रहे थे. इसकी एक बड़ी वजह सर्वेक्षण में शामिल हुए घरों में स्मार्टफोन की कमी है. ग्रामीण इलाक़ों में तो लगभग आधे घरों में स्मार्टफ़ोन नहीं है.

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कोविड महामारी के शुरु होने के बाद से प्राइमरी और अपर प्राइमरी स्कूलों के लंबे समय तक बंद रहने से छात्रों पर काफ़ी गहरा असर पड़ा है, खासकर ग्रामीण भारत में.

ग्रामीण भारत में सिर्फ़ 8 प्रतिशत छात्रों की ही ऑनलाइन शिक्षा तक पहुंच थी, जबकि कम से कम 37 प्रतिशत छात्रों ने पूरी तरह से पढ़ाई बंद कर दी.

ऑनलाइन शिक्षा तक पहुंच में बाधा

इनमें भी दलित और आदिवासी बच्चों में से सिर्फ़ 5 प्रतिशत की ऑनलाइन क्लास तक पहुंच है. यानि इन वर्गों के 95 प्रतिशत बच्चों की पढ़ाई पिछले डेढ़ साल से बिल्कुल ठप है.

देशभर में लगभग 100 स्वयंसेवकों द्वारा किए गए इस सर्वेक्षण साफ़ करता है कि ऑनलाइन शिक्षा की पहुंच बहुत सीमित है. शहरी इलाक़ों में 24 प्रतिशत और ग्रामीण इलाक़ों में सिर्फ़ 8 प्रतिशत छात्र ही नियमित रूप से ऑनलाइन पढ़ रहे थे. इसकी एक बड़ी वजह सर्वेक्षण में शामिल हुए घरों में स्मार्टफोन की कमी है. ग्रामीण इलाक़ों में तो लगभग आधे घरों में स्मार्टफ़ोन नहीं है.

स्मार्टफ़ोन और इंटरनेट की कमी भी ग्रामीण और आदिवासी इलाक़ों में ज़्यादा दिखी है

रिपोर्ट में असम, बिहार, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, पंजाब, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल समेत 15 राज्यों में फैले 1,362 परिवारों को शामिल किया गया है.

सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि दलित और आदिवासी बच्चों को कोविड का ज़्यादा नुकसान हुआ, क्योंकि इन समूहों के सिर्फ़ 5 प्रतिशत बच्चों की ऑनलाइन शिक्षा तक पहुंच थी.

शिक्षकों तक पहुंच की कमी

स्कूलों के लंबे समय तक बंद रहने का एक और नुकसान शिक्षकों और छात्रों के बीच संबंध है. शहरी इलाक़ों में सर्वे किए गए 51 प्रतिशत और ग्रामीण भारत में 58 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वो महीनों तक शिक्षकों से नहीं मिले.

शिक्षा के अलावा, लॉकडाउन ने ग्रामीण स्कूलों में बच्चों के पोषण के स्तर को भी प्रभावित किया, क्योंकि इनका मिड-डे मील बंद हो गया. कई आदिवासी और दूसरे ग़रीब परिवारों के लिए स्कूलों में मिलना वाला मिड-डे मील उनके बच्चों का इकलौता पौष्टिक आहार होता है.

ज़ाहरि है, सर्वेक्षण में शामिल अधिकांश अभिभावकों ने जल्द से जल्द स्कूलों को फिर से खोलने का समर्थन किया है. शहरी इलाक़ों में 10 प्रतिशत माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजने में झिझक रहे हैं, लेकिन कुल मिलाकर 97 प्रतिशत माता-पिता ने स्कूलों को फिर से खोलने का समर्थन किया है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि लंबे समय तक स्कूल का बंद होना दुनिया में एक दूसरी बड़ी आपदा को जन्म दे रहा है.

(पूरी रिपोर्ट आप यहां पढ़ सकते हैं.)

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