अट्टपाड़ी से गर्भवती महिलाओं को TSR मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया

जनजातीय अस्पताल में ओपी में हर दिन करीब 200 आदिवासियों और आईपी में 80 फीसदी की भीड़ देखी जाती है. ज्यादातर मामले एनीमिया और कुपोषण से संबंधित हैं. यह हर महीने आदिवासी महिलाओं की 50-60 प्रसव भी देखता है. इनमें से करीब 15 का वजन जन्म के समय कम है.

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अट्टपाड़ीमें तीन गर्भवती आदिवासी महिलाओं को कोट्टाथारा के आदिवासी विशेषता अस्पताल में स्कैनिंग सुविधा की कमी के कारण रविवार को त्रिशूर के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में रेफर कर दिया गया.

महिलाएं जो गर्भावस्था के विभिन्न चरणों में हैं को अट्पाड़ी से करीब 100 किमी दूर स्थित मेडिकल कॉलेज भेज दिया गया है क्योंकि उनमें कुछ कॉम्प्लिकेशन थीं.

अट्टपाड़ी में आदिवासियों की दुर्दशा देखकर स्वास्थ्य अधिकारी नाराज और बेबस हैं. उन्हें लगता है कि सरकार को आदिवासियों को चम्मच से खाना खिलाना बंद कर देना चाहिए और इसके बजाय कृषि और अन्य क्षेत्रों में खुद को आत्मनिर्भर बनाना चाहिए.

जनजातीय स्वास्थ्य नोडल अधिकारी डॉ आर प्रभुदास ने कहा, “अट्टपाड़ी को तालुक घोषित किया गया है. अगर सरकार इस अस्पताल को तालुक अस्पताल में अपग्रेड कर रही है तो आदिवासियों को अधिक विशिष्ट डॉक्टरों और अन्य बुनियादी ढांचे की सेवा मिलेगी. हालांकि अस्पताल में अब आठ विशेषज्ञ हैं लेकिन स्त्री रोग, नवजात और चिकित्सा में कोई वरिष्ठ डॉक्टर नहीं हैं.”

आर प्रभुदास ने कहा कि जब जूनियर डॉक्टरों को कुछ संदेह होता है तो वे क्षेत्र के बाहर के अस्पतालों से वरिष्ठ डॉक्टरों को बुलाते हैं और उनकी सलाह के आधार पर मरीज को रेफर करते हैं। प्रभुदास ने कहा कि गर्भवती महिलाओं की स्कैनिंग तभी की जाती है जब बाहर से कोई डॉक्टर हर दो हफ्ते में अस्पताल आता है. सीटी स्कैन की भी सुविधा नहीं है.

जनजातीय अस्पताल में ओपी में हर दिन करीब 200 आदिवासियों और आईपी में 80 फीसदी की भीड़ देखी जाती है. ज्यादातर मामले एनीमिया और कुपोषण से संबंधित हैं. यह हर महीने आदिवासी महिलाओं की 50-60 प्रसव भी देखता है. इनमें से करीब 15 का वजन जन्म के समय कम है.

प्रभुदास ने कहा, “पहले 50 फीसदी नवजात शिशुओं का जन्म के समय कम वजन था. सरकार के दखल से अब इसमें कमी आई है. लेकिन सरकार को दीर्घकालिक प्रभावों के लिए और अधिक करने की जरूरत है. हम पिछले 10 सालों से सरकार को लिख रहे हैं, सीटी स्कैन सुविधाओं की कमी सहित विभिन्न मुद्दों को उठा रहे हैं, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ.”

एक एनजीओ थंपू के राजेंद्रप्रसाद ने कहा कि सरकार सिर्फ अधिकारियों, एससी प्रमोटरों और पंचायत सदस्यों की सुनती है.

उन्होंने कहा, “सरकार को आदिवासियों की भी बात सुननी चाहिए और जानना चाहिए कि वे क्या चाहते हैं. उनकी आवश्यकताएं बहुत कम हैं. इसे जमीनी स्तर पर आना चाहिए. सरकार को आदिवासियों को आत्मनिर्भर दृष्टिकोण के लिए उनकी पारंपरिक कृषि में लाना चाहिए.”

(तस्वीर प्रतिकात्मक है)

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