राजस्व विभाग ने इरुला आदिवासियों के घर तोड़े, न दी पहले ख़बर, न पुनर्वास का कोई प्लान

टीएनयूईएफ के ज़िला सचिव सेल्वम त्रिवन्नामली ने न्यूज़क्लिक को बताया, “हमें पता चला कि गोविंदराजन नाम के एक आदमी की नज़र ज़मीन पर है. उन्होंने यह कहते राजस्व विभाग पर दबाव बनाया कि मंदिर के बगल में रहने वाले इरुला मांस खाते हैं, और ज़मीन का इस्तेमाल मंदिर से संबंधित गतिविधियों के लिए ही किया जाना चाहिए.”

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तमिलनाडु के तिरुवन्नामलई ज़िले में एक मंदिर के पास बसे इरुला आदिवासियों की झोपड़ियों को राजस्व विभाग ने बिना कोई सूचना दिए और पुनर्वास किए बिना तोड़ दिया. पेरनमल्लूर नगरपालिका में एक मंदिर के पास इरुला आदिवासियों के 11 परिवार रहते थे. घटना 1 अक्टूबर का है.

जाने के लिए किसी और जगह के अभाव में, इन आदिवासियों ने अपना कुछ सामान बांधा, और तत्काल आवास की मांग करते हुए तहसीलदार के कार्यालय पर कब्ज़ा कर लिया. भारी बारिश की परवाह किए बगैर सैकड़ों की संख्या में आदिवासी अपने परिजनों के साथ देर रात तक प्रदर्शन करते रहे.

उन्होंने तब तक अपना विरोध प्रदर्शन जारी रखा, जब तक उन्हें घर के पट्टे की गारंटी नहीं दी गई. यह आदिवासी दावा करते हैं कि तहसीलदार ने महज़ चार महीने पहले इन 11 परिवारों को ज़मीन के पट्टे जारी किए जाने तक एक अस्थायी व्यवस्था के तौर पर ज़मीन मुहैया कराई थी. लेकिन राजस्व विभाग ने यह कहते हुए उन्हें बेघर कर दिया कि दूसरे कार्यों के लिए उस ज़मीन की ज़रूरत है.

आदिवासी अधिकारों के लिए लड़ने वाले दो संगठनों (Tamil Nadu Untouchability Eradication Front – TNUEF, Tamil Nadu Malaival Makkal Sangam – TNMMS) ने आरोप लगाया है कि इस इलाक़े के एक प्रभावशाली आदमी ने राजस्व विभाग पर आदिवासियों को यहां से हटान का दबाव बनाया क्योंकि उसे लगता था कि मंदिर के पास इनका रहना अशुभ है.

टीएनयूईएफ के ज़िला सचिव सेल्वम त्रिवन्नामली ने न्यूज़क्लिक को बताया, “हमें पता चला कि गोविंदराजन नाम के एक आदमी की नज़र ज़मीन पर है. उन्होंने यह कहते राजस्व विभाग पर दबाव बनाया कि मंदिर के बगल में रहने वाले इरुला मांस खाते हैं, और ज़मीन का इस्तेमाल मंदिर से संबंधित गतिविधियों के लिए ही किया जाना चाहिए.”

इरुला आदिवासी चूहों और सांपों को पकड़ने, और उन्हें खाने के लिए जाने जाते हैं. इस प्रथा को नीची दृष्टि से देखा जाता है.

सीपीआईएम नेताओं की मदद से पेरनमल्लूर पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई गई है, लेकिन कोई कार्रवाई अब तक नहीं की गई है. दूसरी तरफ़ पुलिस ने गोविंदराजन पर विश्वास किया, जिसने यह दावा किया कि इरुला आदिवासियों ने अवैध रूप से ज़मीन पर कब्ज़ा कर रखा है.

इरुला आमतौर पर फूस की छत वाली झोपड़ियों में 10-15 परिवारों के छोटे समूहों में रहते हैं. वो लंबे समय से कंक्रीट के घरों और ज़मीन के पट्टों की मांग कर रहे हैं.

अब तक आठ परिवारों को पट्टा मिला है. भारी बारिश ने प्रक्रिया में कुछ दिनों की देरी की है.

इरुला तमिलनाडु की सबसे गरीब जनजातियों में से एक हैं. ये पारंपरिक तैर पर जंगलों में रहने वाले लोग पिछली कुछ पीढ़ियों से शहरों और कस्बों की तरफ़ चले गए.

शहरी इलाक़ों में बिजली और शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं के बिना वो झोपड़ियों में जर्जर हालत में रहते हैं. आज भी उनकी आजीविका का मुख्य स्रोत लकड़ी काटना और छोटे जानवरों का शिकार करना है.

(Photo Courtesy: Sun Network)

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