कोडवा आदिवासियों के त्यौहार का मौसम

कोडवा आदिवासी अपने 276 'केरी' या गांवों में अक्टूबर और जून के बीच त्यौहार मनाते हैं, और यह त्यौहार समय और आधुनिकीकरण की लहरों से अभी तक बचे हुए हैं.

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अक्टूबर के महीने में कर्नाटक के कोडागु में मनाया जाने वाला कावेरी संक्रमण त्यौहार, जिले भर में आदिवासी त्योहारों के मौसम की शुरुआत का प्रतीक है. इन त्यौहारों में हर गांव अपने अनुष्ठानों और परंपराओं का अनूठा प्रदर्शन करता है.

ये त्यौहार यहां की आदिवासी संस्कृति को दुनिया के सामने लाते हैं, और कोडवा आदिवासियों की समृद्ध लोककथाओं को प्रदर्शित करते हैं. कोडवा आदिवासी अपने 276 ‘केरी’ या गांवों में अक्टूबर और जून के बीच त्यौहार मनाते हैं, और यह त्यौहार समय और आधुनिकीकरण की लहरों से अभी तक बचे हुए हैं.

एक कोडवा आदिवासी कहते हैं कि हर कोडवा इलाके के लिए एक महादेव, लिए पोववाड़ी (पार्वती), हर गांव के लिए अयप्पा, हर गली के लिए नाथ (सांप देवता) और हर परिवार के लिए पुडा (आदिवासी मिट्टी के स्वामी) होता है. यह कई त्यौहारों में दिखाई देता है, और इस भूमि के लोगों को जोड़ता है.

“कोडागु प्रांत पर कई राज्यों का शासन था. हर गाँव में आज तक मनाया जाने वाला उत्सव हलेरी साम्राज्य के शासन से चला आ रहा है,” कोडवा इतिहासकार बछरणियांद अपन्ना ने द न्यू इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए कहा.

हर गांव के मेले की जड़ें लोककथाओं में है, जिसमें सम्मोहक कहानियां हैं, जिनका संबंध भूमि के महत्व और प्रकृति पूजा की अवधारणा के साथ है.

चमकीले रंग, आदिवासी संगीत और पारंपरिक नृत्य इन त्यौहारों का प्रतीक है. पारंपरिक ढोल और झांझ की ताल पर लोक गीत इन त्यौहारों के पौराणिक महत्व का संदेश देते हैं. उत्सव के इस मौसम के लिए पुरुष और महिलाएं अपने पारंपरिक कपड़े पहनते हैं, और अनुष्ठान सभी गांवों में एक समान पैटर्न पर होते हैं.

माना जाता है कि पौराणिक भारत के 56 राज्यों में से एक राज्य कोडागु है, जो सुई की नोक जितना छोटा और हीरे के टुकड़ों जैसा चमकीला है. इस राज्य में 35 प्रांत हैं और इन प्रांतों में 276 गांव हैं. प्रांतों में फिलहाल 882 ओक्का (परिवार) हैं और हर गांव में परिवारों द्वारा आदिवासी त्यौहार मनाए जाते हैं.

देवी की पूजा

एकता की दास्तां सुनाने के साथ-साथ, इन उत्सवों में कड़े मानदंडों का पालन भी किया जाता है. हर गाँव का त्यौहार लगभग 15 दिनों तक मनाया जाता है, और अनुष्ठानों में मांस के सेवन पर पाबंदी, सूर्यास्त से पहले गाँव में अनिवार्य वापसी और पेड़ों या खरपतवारों को काटने की मनाही जैसे नियम शामिल हैं.

इन पाबंदियों को पीढ़ि दर पीढ़ी ‘तप्पदक’ गीत के माध्यम से आगे बढ़ाया जाता है. यह गीत ‘ठक्कस’ (धार्मिक प्रमुखों) द्वारा गाए जाते हैं, जो इन उत्सवों का नेतृत्व भी करते हैं.चूंकि आदिवासी कोडवा प्रकृति और पूर्वजों के उपासक हैं, इसलिए इस उत्सव में प्रकृति के लिए एक विशेष श्रद्धा होती है. पारंपरिक नृत्य प्रकृति से प्रेरणा लेते हैं और कुछ गाँवों के उत्सवों के दौरान मोर पंख नृत्य भी किए जाते हैं.

देवता ‘काड अयप्पा’ भगवान महादेव की अभिव्यक्ति है, और उत्सव के दौरान पूजी जाने वाली देवी प्रकृति का प्रतीक है. दिलचस्प बात यह है कि ये त्यौहार खेत में कृषि गतिविधियों के समाप्त होने के बाद मनाए जाते हैं.

ये त्यौहार एक और बड़ा का करते हैं कि ग्रामीणों को एकजुट करते हैं. पिछले तीन सालों में, इन उत्सवों में युवाओं की भागीदारी भी बढ़ी है. इसके अलावा, समुदाय के कई धार्मिक प्रमुख और संगठन इन आदिवासी त्यौहारों का दस्तावेजीकरण करने में लगे हैं.

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